जानिए क्या है 3 जून का प्लान और भारतीय इतिहास में कितनी है इसकी अहमियत

यही प्लान भारत (India) और पाकिस्तान के विभाजन की अंतिम रूपरेखा बना. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

यही प्लान भारत (India) और पाकिस्तान के विभाजन की अंतिम रूपरेखा बना. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

3 जून 1947 को भारत के अंतिम गर्वनर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन (Lord Mountbatten) ने भारत (India) को आजादी देने की अपनी योजना (3 June Plan) की घोषणा की थी.

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भारत (India)  को आजादी (Independence of India) मिलने का काम एक ही रात में नहीं हो गया था. इसकी पूरी प्रक्रिया कुछ दिन या महीनों तक नहीं बल्कि कुछ सालों का प्रक्रिया थी जो अंततः 1947 में 15 अगस्त की तारीख के बाद भी चलती रही थी. इससे पहले कई योजनाएं बनीं जिसमें भारत की आजादी का ताना बाना बताया गया है. इनमें से 3 जून का प्लान (3 June Plan) बहुत महत्वपूर्ण है.

पहले से चल रही थी तैयारी

वैसे तो भारत को आजादी देने के फैसले पर विचार द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही शुरू हो गया था. 1946 में कैबिनेट मिशन भी ब्रिटेन से भारत इसी उद्देश्य से आया था कि अंग्रेज भारत को किस तरह से आजादी दें. इसी बीच मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पाकिस्तान की मांग भी जोर पकड़ने लगी थी. लेकिन कैबिनेट प्लान का बहुत विरोध हुआ. और इसे लागू करने के तमाम प्रयास नाकाम साबित हुए.

माउंटबेटन की थी ये योजना
इस पर औपचारिक फैसला 20 फरवरी 1947 को ब्रिटेन ने घोषणा कर दी थी. चाहे कुछ भी हो जून 1948 तक अंग्रेज भारत को हर हाल में छोड़ कर चले जाएंगे भले ही सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया तय हो या ना हो. इसके बाद उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने अपने योजना 3 जून 1947 को पेश की जिसे 3 जून की योजना कहा जाता है. दिलचस्प बात यह है कि यह पहले ही तय हो गया था कि माउंटबेटन भारत के आखिरी वायसराय होंगे.

उस समय ठीक नहीं थे हालात

माउंटबेटन की इस 3 जून की योजना से काफी पहले ही पूरा देश साम्प्रदायिक दंगों में उलझ चुका था. पहले से जारी राजनैतिक और तेज हो गईं. पाकिस्तान की मांग के जोर पकड़ने और हिंदू मुस्लिम दंगों के कारण माउंटबेटन ने अपनी योजना में दो देशों के बनाने का प्रस्ताव दिया था. झगड़ा इसको मानने को लेकर था.



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नेहरू सहित कई भारतीय नेताओं को उस समय के हालात के मुताबिक 3 जून का प्लान (3 june Plan) ही सही लगा था. (फाइल फोटो)

ये थी रूपरेखा

3 जून की योजना में कहा गया कि भारत को देशों के बंटवारे को ब्रिटेन की संसद मानेगी और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता भी देगी. दोनों देशों की सरकारों को डोमिनियन दर्जे के साथ ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का सदस्य बनने के फैसला का अधिकार भी दिया जाएगा. प्लान में तय किया गया कि हिंदु बहुल इलाके भारत को और मुस्लिम बहुत इलाके पाकिस्तान को दे दिए जाएगे. जबकि देशके 565 रियासतों को यह आजादी दी गई कि वे भारत या पाकिस्तान में से किसी में भी शामिल हो सकते हैं.

भारत में जब स्वतंत्र भारत की संसद का हुआ था सबसे पहला सत्र

विरोध भी हुआ था इसका

ब्रिटिश संसद ने 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित किया और विभाजन की प्रक्रिया को अंतिम स्वीकृति दे दी. इस पूरे प्लान का देश में बहुत विरोध भी हुआ, लेकिन उससे पहले ही माउंटबेटन नेहरु और अन्य प्रमुख नेताओं को इसे मानने के लिए मना चुके थे. नेहरू सहित सभी नेताओं ने तात्कालिक हालातों में 3 जून का प्लान मानना ही ज्यादा बेहतर विकल्प माना.

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3 जून का प्लान (3 june Plan) के लागू होने के बाद भारत 26 जनवरी 1950 तक ही पूर्ण गणतंत्र बना.

जनमत संग्रह और देश में शामिल होने के फैसले

इस योजना के मुताबिक कई इलकों में जनमत संग्रह कराना पड़ा जिसकी वजह से पंजाब और बंगाल का विभाजन हुआ. वहीं कई रियासतों ने इस प्लान को मानने से भी इनकार कर दिया जिसमें हैदराबाद का नाम सबसे प्रमुख था. लेकिन बाद में हैदराबाद को भारत का हिस्सा बना लिया गया. वहीं कश्मीर ने भी भारत में शामिल होने का फैसला तब लिया जब कबाइलियों ने कश्मीर पर हमला किया.

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आज भारत और पाकिस्तान के स्वरूप के लिए माउंटबेटन का यह तीन जून का प्लान ही जिम्मेदार है. इसी को आधार बना कर ब्रिटिश हुकूमत ने भारत को आजादी दी लेकिन आजादी के बाद भी सभी रियासतों को भारत में शामिल करने कठिन कार्य  पूरा करने में कुछ समय लगा. इसके साथ ही 26 जनवरी 1950 को देश में नया संविधान लागू हुआ.

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