Black Hole से शुरू होकर आवाज पर हुए प्रयोग से सिद्ध हुआ 50 साल पुराना सिद्धांत

Black Hole से शुरू होकर आवाज पर हुए प्रयोग से सिद्ध हुआ 50 साल पुराना सिद्धांत
50 साल पहले एक वैज्ञानिक ने कहा था कि ब्लैकहोल से ऊर्जा पैदा की जा सकती है, लेकिन शोधकर्ताओं ने उस सिद्धांत को दूसरी परिस्थिति वाले प्रयोग से सिद्ध कर दिया. (फोटो: रायटर्स)

पचास साल पहले जो सिद्धांत (Theory) ब्लैकहोल (Black hole) या धरती पर प्रकाश (Light) के साथ सोचा गया था वह वैज्ञानिकों ने ध्वनि (Sound) के साथ कर उसे सिद्ध कर दिया.

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नई दिल्ली: अंतरिक्ष विज्ञान (Space Science) में कई खोजें चौंकाने वाली होती हैं. कई बार दशकों पुराने मत (Theory) को सिद्ध करने वाली घटना हो जाती है तो कभी नामुमकिन लगने वाले सिद्धांत (Theory) की प्रयोग से पुष्टि हो जाती है. हाल ही में एक प्रयोग से 50 साल पुराना सिद्धांत सिद्ध हो गया जिसकी शुरुआत इस अटकल से हुई थी कि अगर दूसरे ग्रह की सभ्यता ब्लैकहोल (Black hole) का उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिए करेगी तो कैसे करेगी.

ऊर्जा उत्पादन लेकिन ब्लैकहोल के पास
इस 50 साल पुराने सिद्धांत की पहली बार ग्लासगो रिसर्च लैब में पुष्टि हुई है. यह शोध नेचर फिजिक्स में प्रकाशित हुआ है. साल 1969 में ब्रिटिश भैतिकविद रोजर पेनरोज ने सुझाया कि ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है अगर किसी वस्तु को ब्लैकहोल के इर्गोस्फियर तक नीचे ले जाया जाए. इर्गोस्फियर ब्लैकहोल के इवेंट होराइजन की सबसे ऊपरी परत होती है. जहां वस्तु को स्थिर रहने के लिए प्रकाश से भी तेज गति से चलायमान होना पड़ता है.

तो क्या होगा अगर यह किया जाए तो
पेनरोजन इस बात का पूर्वानुमान लगाया कि ऐसी अवस्था में वह वस्तु नकारात्मक ऊर्जा हासिल कर लेगी जो कि अंतरिक्ष में बहुत असामान्य बात होगी. इस वस्तु के गिरने और इसके दो भागों में बंटने से एक हिस्सा ब्लैकहोल में गिरेगा जबकि दूसरा नहीं. इस पूरी घटना का नतीजा यह होगा कि बचे हुए हिस्से को ब्लैकहोल के घूर्णन से ऊर्जा मिल जाएगी.



यह बहुत ही मुश्किल था, धरती पर हो सकता था ऐसा प्रयोग
यह कार्य इतना ज्यादा मुश्किल है कि पेनरोज ने कहा कि यह एलियंस जैसी अतिविकसित सभ्यता से ही संभव हो सकता है. लेकिन दो साल बाद इस कहानी में एक मोड़ तब आया जब याकोव जेलदोविच नाम के एक अन्य भौतिकविद ने इसी सिद्धांत को दूसरे तरह से सुझाया. उन्होंने कहा कि अगर मुड़ी हुई प्रकाश तरंगें  अगर घूमते हुए धातु के बेलन से टकराएं जो सही गति से घूम रहा हो, तो इसके नतीजे में बेलन से अतिरिक्त ऊर्जा निकल आएगी.

Black Hole
ब्लैकहोल के स्तर पर वह प्रयोग करना संभव नहीं था इसलिए पेनरोज ने कहा कि यह केवल अतिविकसित एलियन्स ही कर सकते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


लेकिन इस प्रयोग में भी थी यह व्यवहारिक परेशानी
लेकिन जेलदोविच का यह विचार 1971 से केवल एक सिद्धांत ही रहा क्योंकि इस प्रयोग के लिए बेलन की गति कम से एक अरब घुमाव प्रति सेकंड के होने की जरूरत थी जो एक बार फिर व्यवहारिक तौर पर कर पाना लगभग नामुमकिन था.

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लैब में किया जा सकने वाला तरीका
अब ग्लासगो यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फिजिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी के शोधकर्ताओं ने इस तरह का प्रयोग करने का एक दूसरा तरीका निकाल लिया जिससे वही प्रभाव आया जो पेनरोज और जेलडोविच ने सोचा था. लेकिन इस बार शोध कर्ताओं ने प्रकाश के बजाए ध्वनि पर यह प्रयोग किया.  जो एक बहुत कम फ्रीक्वेंसी का स्रोत है और उसे लैब में प्रदर्शित करना आसान है.

क्या किया शोधकर्ताओं ने
इस शोध में वैज्ञानिकों ने यह दर्शाया कि कैसे उन्होंने एक सिस्टम बनाया जो स्पीकर्स के एक छल्ले का उपयोग ध्वनि तरंगों को मोड़ने के लिए किया जा सकता है बिलकुल वैसे ही जैसा कि जेलडोविच ने प्रकाश की तरंगों को मोड़ने के लिए प्रस्तावित किया था. इन मुड़ी हुई तरंगों को फोम डिस्क के बने घूमने वाले ध्वनि अवशोषक (Sound Absorber) की ओर भेजा गया. इस डिस्क की घूर्णन गति (Spin) लगातार बढ़ रही थी.

Solar
एक अन्य सुझाव में कहा गया कि यह प्रयोग प्रकाश का उपयोग कर पृथ्वी पर ही किया जा सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


क्या जानना चाहा शोधकर्ताओं ने
इस टीम ने यह जानने की कोशिश की कि क्या इस प्रक्रिया से ध्वनि तरंगों की फ्रीक्वेंसी और आयाम (Amplitude)  परिवर्तन आता है. यानि कि तब जब ध्वनि तरंगें डिस्क से गुजर रही हों यह डॉप्लर प्रभाव के तेज असर कारण होता. डॉप्लर प्रभाव में स्रोत और अवलोकनकर्ता के पास या दूर जाने से ध्वनि या अन्य  तरंगों की फ्रीक्वेंसी यानि आवृत्ति में बदलाव हो जाता है.

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शोधकर्ताओं ने पाया कि मुड़ी हुई ध्वनि तरंगें एक अजीब बर्ताव करती हैं जब घूमने वाली सतह बहुत ज्यादा तेजी से घूमती हो.  ऐसे में वह घूमती सतह से कुछ ऊर्जा ले लेती है. यह उसी तरह का नतीजा था जैसा कि जेलडिविच अपने प्रयोग से उम्मीद कर रहे थे.
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