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जमीन से उठने और सियासत में छा जाने की कहानी के नायक हैं मुलायम सिंह यादव

आज केंद्रीय मंत्री एसपी स‍िंह बघेल के अलावा श‍िवपाल स‍िंह यादव भी उनका हालचाल पूछने मेदांता अस्‍पताल पहुंचे. (फाइल फोटो)

आज केंद्रीय मंत्री एसपी स‍िंह बघेल के अलावा श‍िवपाल स‍िंह यादव भी उनका हालचाल पूछने मेदांता अस्‍पताल पहुंचे. (फाइल फोटो)

मुलायम सिंह यादव नहीं रहे. मेदांता अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांसें लीं लेकिन उनकी जीवन यात्रा और सियासी यात्रा बहुत क ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

मुलायम ने पहला विधानसभा चुनाव 1967 में लड़ा और जीता, तब वह सबसे कम उम्र के विधायक बने
1992 में लोकदल से अलग होकर अपनी खुद की पार्टी बनाई और उसे मजबूती से खड़ा किया
मुलायम को हर विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं और नेताओं का नाम जुबानी याद रहता था

अपने 83 वें जन्मदिन से ठीक 42 दिन पहले मुलायम सिंह यादव ने गुड़गांव के मेदांता हास्पिटल में आखिरी सांसें लीं. पिछले करीब एक पखवाड़े से उनकी हालत गंभीर थी. धीरे धीरे उनके शरीर के मेटाबोलिक सिस्टम ने जवाब देना शुरू कर दिया था. वह असल में जमीन के नेता थे. जमीनी संघर्ष करके उठे थे. इसीलिए उन्होंने राजनीति में इतनी लंबी पारी खेली, जो आमतौर पर सियासी नेताओं के लिए आसान नहीं होता. उनकी कहानी एक साधारण कार्यकर्ता से लेकर सियासी शिखर तक पहुंचने और खुद अपनी मजबूत पार्टी खड़ी कर लेने की कहानी भी है.

पहलवानी करने वाले और फिर उसके बाद टीचिंग पेशे में आने वाले मुलायम सिंह ने जीवन में हर धूप छांव देखे . कई दलों में रहे. कई बड़े नेताओं की शागिर्दी की. उसके बाद अपना दल बनाया. यूपी पर एक दो बार नहीं बल्कि तीन बार राज किया. यूपी की पॉलिटिक्स जिन धर्म और जाति के मुकामों की प्रयोगशाला से गुजरी, उसके एक अहम भूमिका उन्होंने भी निभाई.

पुराने लोगों को अब भी याद है कि किस तरह लखनऊ में मुलायम 80 के दशक में साइकिल से सवारी करते भी नजर आ जाते थे. साइकिल से बहुत घूमे. कई बार साइकल चलाते हुए अखबारों के आफिस और पत्रकारों के पास भी पहुंच जाया करते थे. तब उन्हें खांटी सादगी पसंद और जमीन से जुड़ा ऐसा नेता माना जाता था, जो लोहियावादी था, समाजवादी था, धर्मनिरपेक्षता की बातें करता था. हालांकि 80 के दशक में वह यादवों के नेता माने जाने लगे थे. किसान और गांव की बैकग्राउंड उन्हें किसानों से भी जोड़ रही थी. मुस्लिमों के पसंदीदा वह राम मंदिर आंदोलन के शुरुआती दिनों में बने.

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कभी खुद वंशवाद को कोसते थे
हालांकि बहुत कम लोगों को याद होगा कि 80 के दशक तक अपने राजनीतिक आका चरण सिंह के साथ मिलकर वह इंदिरा गांधी को वंशवाद के लिए कोसने का कोई मौका छोड़ते भी नहीं थे. हालांकि बाद में धीरे धीरे वंशवाद को इतने लचीले होते गए कि खुद अपने बेटे और कुनबे को राजनीति में बडे़ पैमाने पर आगे बढ़ाने के लिए भी जाने गए.

चौधरी चरण सिंह से तब क्षुब्ध हो गए
चौधरी चरण सिंह से तब वह क्षुब्ध हो गए थे जबकि उन्होंने राष्ट्रीय लोकदल में मुलायम सिंह के यादव के जबरदस्त असर और पकड़ के बाद भी अमेरिका से लौटे अपने बेटे अजित सिंह को पार्टी की कमान देनी शुरू कर दी.

अपनी खुद की पार्टी बनाई
बाद में इसी बिना पर चरण सिंह के निधन के बाद पार्टी टूटी और उसके एक धड़े की अगुवाई मुलायम सिंह करने लगे. 1992 में उन्होंने नई पार्टी बनाई, जिसे हम समाजवादी पार्टी के तौर पर जानते हैं, जिसका प्रतीक चिन्ह उन्होंने उसी साइकल को बनाया, जिस पर कभी उन्होंने खूब सवारी की.

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मुलायम सिंह यादव 60 के दशक मध्य के बाद राममनोहर लोहिया के संपर्क में आए. लोहिया ने उन्हें अपनी पार्टी से इटावा की जसवंतनगर सीट से विधानसभा चुनाव लड़ने का पहला मौका दिया. यहां मुलायम ने अपनी जिंदगी का पहला चुनाव जीता (फाइल फोटो)

हवा को भांपने की गजब क्षमता
इसमें कोई शक नहीं कि वह जिस बैकग्राउंड से राजनीति में आए और मजबूत होते गए, उसमें उनकी सूझबूझ थी और हवा को भांपकर अक्सर पलट जाने की प्रवृत्ति भी. कई बार उन्होंने अपने फैसलों और बयानों से खुद ही अलग कर लिया. राजनीति में कई सियासी दलों और नेताओं ने उन्हें गैरभरोसेमंद माना लेकिन हकीकत ये है कि यूपी की राजनीति में वह जब तक सक्रिय रहे, तब तक किसी ना किसी रूप में अपरिहार्य बने रहे.

राजनीति के दांवपेच लोहिया और चरण सिंह से सीखे
राजनीति के दांवपेंच उन्होंने 60 के दशक में राममनोहर लोहिया और चरण सिंह से सीखने शुरू किए. लोहिया ही उन्हें राजनीति में लेकर आए. लोहिया की ही संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने उन्हें 1967 में टिकट दिया और वह पहली बार चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचे. उसके बाद वह लगातार प्रदेश के चुनावों में जीतते रहे. विधानसभा तो कभी विधानपरिषद के सदस्य बनते रहे.

उनकी पहली पार्टी अगर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी थी तो दूसरी पार्टी बनी चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली भारतीय क्रांति दल. जिसमें वह 1968 में शामिल हुए. हालांकि चरण सिंह की पार्टी के साथ जब संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का विलय हुआ तो भारतीय लोकदल बन गया. ये मुलायम के सियासी पारी की तीसरी पार्टी बनी.

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1992 में मुलायम सिंह यादव ने जब समाजवादी पार्टी बनाई, तब तक उनकी इमेज मुस्लिम, किसान और यादवों के बीच बड़े नेता की बन चुकी थी (विकी कामंस)

इमर्जेंसी के बाद की सियासत
मुलायम सिंह की पकड़ लगातार जमीनी तौर पर मजबूत हो रही थी. इमर्जेंसी के बाद देश में सियासत का माहौल भी बदल गया. आपातकाल में मुलायम भी जेल में भेजे गए और चरण सिंह भी. साथ में देश में विपक्षी राजनीति से जुड़ा हर छोटा बड़ा नेता गिरफ्तार हुआ. नतीजा ये हुआ कि अलग थलग छिटकी रहने वाली पार्टियों ने इमर्जेंसी खत्म होने के बाद एक होकर कांग्रेस का मुकाबला करने का प्लान बनाया. इस तर्ज पर भारतीय लोकदल का विलय अब नई बनी जनता पार्टी में हो गया. मुलायम सिंह मंत्री बन गए.

अजित सिंह से कभी नहीं बनी
चरण सिंह की मृत्यु के बाद उन्होंने उनके बेटे अजित सिंह का नेतृत्व स्वीकार करने से इनकार कर दिया. भारतीय लोकदल को तोड़ दिया.1989 के चुनावों में जब एक बार फिर कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी एकता परवान चढ़ रही थी तब विश्वनाथ सिंह कांग्रेस से बगावत करके बाहर निकले, तब फिर विपक्षी एकता में एक नए दल का गठन हुआ, वो था जनता दल. हालांकि इस दल में जितने नेता थे, उतने प्रधानमंत्री के दावेदार भी.

जब चंद्रशेखर उनसे खफा हो गए
मुलायम को तब चंद्रशेखर का करीबी माना जाता था. वह उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की बात करते थे लेकिन ऐन टाइम पर जब वह पलटे और विश्वनाथ प्रताप सिंह के पीएम बनाने पर सहमति जाहिर कर दी तो चंद्रशेखर गुस्से में भर उठे थे. वैसे उनकी अब तक की राजनीतिक यात्रा में वह कांग्रेस के साथ भी गए. कांग्रेस की मनमोहन सरकार को बचाया. वामपंथियों के पसंदीदा भी बने लेकिन दोनों ने अक्सर कहा कि वह मुलायम पर विश्वास नहीं करते.

हां, मुलायम का एक स्टैंड उनके राजनीतिक करियर से आज तक कायम है, वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति उनका खिलाफत भरा दृष्टिकोण. हालांकि उन पर कई बार ये आरोप लगे हैं कि वह भारतीय जनता पार्टी के प्रति कई बार साफ्ट हो जाते हैं. लेकिन वह जब तक सक्रिय राजनीति में रहे, जमीन से जुड़े रहे.

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80 के दशक में जब वीपी सिंह की यूपी सरकार के खिलाफ मुलायम सिंह यादव ने खुलकर बिगुल बजा दिया था और वह पिछड़ों के नेता के तौर पर उभऱ रहे थे, तब उन पर कई बार हमले हुए. कई साजिश हुई, तब उनके छोटे भाई शिवपाल साये की तरह उनके साथ रहते थे और उन्हें जान की बाजी लगाकर बचाते थे.

तब भाई शिवपाल उनके बहुत काम आए
मुलायम सिंह यादव 80 के दशक में राजनीति के बेहद मुश्किल दौर से भी गुजरे. उन पर हमले हुए. साजिश रची गई लेकिन हर बार उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने उन्हें बचाने में जान की बाजी भी लगा दी.इसी वजह से शिवपाल यादव हमेशा उनके करीबी सियासी सलाहकार बने रहे.

08 बार विधायक और 07 बार सांसद
मुलायम सिंह यादव 1967 से लेकर 1996 तक 08 बार उत्तर प्रदेश में विधानसभा के लिए चुने गए. एक बार 1982 से 87 तक विधान परिषद के सदस्य रहे. 1996 में ही उन्होंने लोकसभा का पहला चुनाव लड़ा और चुने गए. इसके बाद से अब तक 07 बार लोकसभा में पहुंच चुके हैं. अब भी लोकसभा सदस्य हैं. 1977 में वह पहली बार यूपी में पहली बार मंत्री बने. तब उन्हें कॉ-ऑपरेटिव और पशुपालन विभाग दिया गया.

1980 में लोकदल का अध्यक्ष पद संभाला. 1985-87 में उत्तर प्रदेश में जनता दल के अध्यक्ष रहे. पहली बार 1989 में यूपी के मुख्यमंत्री बने. 1993-95 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने. 2003 में तीसरी बार सीएम बने और चार साल तक गद्दी पर रहे. 1996 में जब देवगौडा सरकार बनी, तब मुलायम उसमें रक्षा मंत्री बने.

विवादों और पारिवारिक कलह से सामना
कई बार वह अपने विवादित बयानों को लेकर भी चर्चा में आए. हालांकि पिछले कुछ सालों में उनके व्यक्तिगत जीवन में बहुत कुछ ऐसा हुआ, जिससे भी वह पारिवारिक तौर पर उलझते रहे, परिवार से लेकर कुनबे तक तमाम अंतर्कलह के हालात का उन्हें पिछले कुछ सालों में खूब सामना करना पड़ा. इस बीच कई बार उनकी तबीयत गंभीर तौर खराब हुई.

छोटे कद के मुलायम सिंह वैसे भारतीय पॉलिटिक्स में ऐसे राजनीतिज्ञ भी रहे जो सियासी दलों और विचारधाराओं से परे जाकर सबके काम आते रहे, सब उन्हें पसंद करते थे. हर पार्टी में उनके मित्र थे. उन्हें चाहने वाले थे. उन्होंने सभी को सहयोगी दिया और बदले में पाया भी. हां हो सकता है कि उन्हें इस बात का मलाल रह गया हो कि चाहने के बाद भी वह कभी प्रधानमंत्री की गद्दी तक क्यों नहीं पहुंच सके. हालांकि ये तय है कि मुलायम के सियासी कद, काम और सियासी यात्रा को दोहरा पाना किसी के लिए आसान नहीं होगा. उस दौर में तो बिल्कुल नहीं जबकि सियासत एक अलग मोड में पहुंच चुकी हो और काफी हद तक सोशल मीडिया भी उसको प्रभावित करने लगा हो.

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