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6 फुट की सोशल डिस्टेंसिंग नहीं है काफी, 18 फीट दूर तक ऐसे जा सकता है कोरोना

Vikas Sharma | News18Hindi
Updated: May 20, 2020, 3:47 PM IST
6 फुट की सोशल डिस्टेंसिंग नहीं है काफी, 18 फीट दूर तक ऐसे जा सकता है कोरोना
अगर हवा चल रही हो तो खांसने या छींकने पर कोरोना के कण बहुत दूर तक जा सकते हैं.

नए अध्ययन से पता चला है कि कोरोना वायरस (Corona virus) के कण (Droplets) हवा में 18 फीट तक जा सकते हैं.

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नई दिल्ली: कोरोना वायरस (Corona virus) से जूझते हुए काफी समय हो गया है. अब दुनिया के कई देश लंबे समय से अपने देश में लगे लॉकडाउन हटाने की तैयारी कर रहे हैं. इसमें भारत भी शामिल है. भारत में अभी लॉकडाउन में कई तरह की रियायत दी  जा रही है, लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग पर सख्ती कायम है. एक शोध से पता चला है कि अगर हलकी हवा भी चल रही हो, तो छह फीट की सोशल डिस्टेंसिंग (Social distancing) वासरस का प्रसार रोकने के लिए काफी नहीं है.‘

छह फीट नहीं इतनी दूरी तक जा सकते हैं कण
फिलहाल कई देशों में सोशल डिस्टेंसिंग की मानक दूरी छह फीट ही है, लेकिन एक ताजा अध्ययन में पता चला है कि अगर हलकी हवा बह रही हो तो हलकी खांसी से भी वायरस के ड्रॉपलेट्स 18 फीट तक हवा में रह सकते हैं. साइप्रस में निकोसिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओ का कहना है कि इस महामारी की वायरस के हवा में प्रसार को समझने के लिए जरूरी है कि यह गहराई से समझा जाए कि जब लोग खांसते हैं तब कण हवा में कैसे फैलते हैं.

हलकी हवा के कारण ही आ जाएगा ये बदलाव



यह शोध फिजिक्स ऑफ फ्ल्यूड जर्नल में प्रकाशित हुआ है. अध्ययन के अनुसार शोधकर्ताओं का कहना है कि पांच किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चल रही हल्की हवा के दौरान भी इंसान के सलाइवा (Saliva) या लार  के कण पांच सेकेंड में 18 फीट तक जा सकते हैं.  शोध के सह लेखक डिमिट्रिस ड्रिकाकिस का कहना है कि यह ड्रॉपलेट्स क्लाउड अलग-अलग ऊंचाइयों वाले व्यस्कों और बच्चों दोनों पर प्रभाव डाल सकते हैं. छोटी ऊंचाई वाले लोगों के लिए ज्यादा जोखिम हैं यदि वे इन सालाइवा ड्रॉपलेट्स की जद में आ रहे हों तो.



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भारत सहित कई देशों में सोशल डिस्टेंसिंग कूी दूरी छह फीट ही है.


इतने सारे कारक डालते हैं प्रभाव
शोध के अनुसार के इंसान का सलाइवा यानि कि लार एक जटिल द्रव्य (Fluid) होता है. यह एक खांसी से आसपास की हवा में बड़ी मात्रा में आगे तक सफर कर सकता है. इसके हवा में सफर पर बहुत से कारक असर करते हैं. इसमें ड्रॉपलेट्स का आकार और संख्या, उनकी एक दूसरे से अंतरक्रिया, आस पास की हवा में उनका प्रसार (Dispersion) या वाष्पीकरण (Evapouration), हवा में ऊष्मा का प्रसारण, उसमें नमी और तापमान शामिल हैं.

कम्प्यूटर से ली मदद
शोध में वैज्ञानिकों ने एक कम्प्यूटर सिम्यूलेशन मॉडल तैयार किया जिससे वे खांसी से पैदा हुए सालाइवा के कणों की हवा में गतिविधियों का अध्ययन कर सकें. इस मॉडल में आर्द्रता, प्रसारण बल (Dispersion force) सालाइवा के अणुओं की हवा से अंतरक्रिया, ड्रॉपलेट्स का तरल से वाष्प में बदलने की क्रिया, छींकने वाले के आगे की जगह जैसे कई कारकों को शामिल किया गया. शोधकर्ताओं ने इस मॉडल के आधारपर 1008 सिम्यूलेटेड सालाइवा ड्रॉपलेट्स का अध्ययन किया गया और उसके आधार पर 37 लाख समीकरणों का हल निकाला गया.

लेकिन यह यह अध्ययन भी किए जाने की जरूरत
शोधकर्ताओं ने माना कि फिलहाल इस बात का विस्तार से अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है कि सालाइवा के बर्ताव पर जमीन की सतह के तापमान का प्रभाव पड़ेगा. इसके अलावा शोधकर्ताओं का मानना है कि घर के अंदर के वातावरण का एक अलग भी प्रभाव होगा जिसमें एयर कंडीशन की अहम भूमिका होगी जो कणों की गतिविधियों पर गहरा प्रभाव डालेंगे.

Coronavirus
सोशल डिस्टेंसिग के साथ ही मास्क एक कारगर उपाय है.


शोधकर्ताओं का मानना है कि इस अध्ययन का सुरक्षा दिशा निर्देशों पर बहुत असर पड़ेगा, लेकिन वायुजनित रोगों के प्रसार को समझने में यह बहुत उपयोगी सिद्ध होगा. फिर भी यह है कि सोशल डिस्टेंसिंग अकेले ही कोरोना के खिलाफ कारगर नहीं हो सकती. ऐसे में जब इसका इलाज या वैक्सीन नहीं निकला है. मास्क की अनिवार्यता बहुत ही प्रभावकारी सिद्ध हो सकती है.

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First published: May 20, 2020, 3:47 PM IST
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