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7वां राष्ट्रपति चुनाव : कांग्रेस ने भूल सुधारते हुए नीलम संजीव रेड्डी का विरोध नहीं किया

 नीलम संजीव रेड्डी (फाइल फोटो)

नीलम संजीव रेड्डी (फाइल फोटो)

जब सातवें राष्ट्रपति का चुनाव हुआ तो 1969 में इसी पद के चुनाव में शिकस्त खा चुके नीलम संजीव रेड्डी को जनता पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया. सरकर भी जनता पार्टी की ही थी. कांग्रेस ने तब उनका विरोध नहीं करने का फैसला किया. रेड्डी निर्विरोध निर्वाचित हुए.

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भारत के छठे राष्ट्रपति फखरूद्दीन का कार्यकाल 1979 तक था लेकिन बीच में उनके निधन के बाद जब फिर देश के शीर्ष पद के लिए चुनाव कराया गया तो कहना चाहिए कि कांग्रेस ने वो गलती सुधारने का काम किया जो इंदिरा गांधी ने 08 साल पहले की थी. नीलम संजीव रेड्डी तब कांग्रेस के ही राष्ट्रपति पद के आधिकारिक उम्मीदवार थे लेकिन तब इंदिरा ने अंतरात्मक के नाम पर वोट की अपील करके रेड्डी को हराने का काम किया था. अब कांग्रेस ने उनके फिर प्रेसीडेंट प्रत्याशी बनने पर उनका कोई विरोध नहीं करना चाहती थी.

11 फरवरी 1977 को सुबह 8.52 बजे के आसपास एक के बाद एक दो तगड़े हार्टअटैक हुए. जिसके बाद मिनटों में देखते ही देखते उनकी मृत्यु हो गई. डॉक्टरी की सारी फुर्ती भी कोई काम नहीं आई. डॉ. जाकिर हुसैन के बाद वह देश के दूसरे राष्ट्रपति थे, जिनका निधन कार्यकाल के बीच में ही हो गया.

फखरुद्दीन अली अहमद के निधन के बाद उपराष्ट्रपति बीडी जत्ती ने कार्यभार संभाला. आपको बता दें कि जब उपराष्ट्रपति को कार्यकारी के तौर पर राष्ट्रपति का पद संभालने का मौका मिलता है तो उसके पास सारी वही शक्तियां आ जाती हैं, जो राष्ट्रपति के पास होती है बल्कि उसका वेतन भी उन दिनों राष्ट्रपति के वेतन के बराबर ही हो जाता है.

तब जत्ती ने कार्यवाहक राष्ट्रपति का दायित्व संभाला

बीडी जत्ती ने बड़ी कुशलता से ये काम संभाला लेकिन किसी भी संवैधानिक पद को 06 महीने के अंदर ही भरना भी होता है, लिहाजा चुनाव आयोग ने नए राष्ट्रपति के चुनाव की घोषणा की. 04 जुलाई 1977 को राष्ट्रपति के चुनाव की अभिसूचना जारी हुई.

इस वजह से हार गए थे नीलम संजीव

नीलम संजीव रेड्डी ने 1969 में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा था लेकिन इंदिरा गांधी और कांग्रेस सिंडिकेट के नेताओं के बीच की खींचतान की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी थी. तब इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के नेताओं से अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने को कहा था,. इसके बाद इंदिरा गांधी के नजदीक समझे जाने वाले सांसदों, विधायकों ने वीवी गिरी के पक्ष में वोट डाला और रेड्डी चुनाव हार गए.

जनता पार्टी ने उम्मीदवार बनाया

इसके बाद नीलम संजीव रेड्डी आंध्र प्रदेश में अपने पैतृक गांव चले गए. उ्न्होंने राजनीति छोड़ने की घोषणा कर दी. जब जनता पार्टी जीतकर सत्ता में आई तो उसने राष्ट्रपति पद के लिए रेड्डी को फिर खड़े होने के लिए मना लिया. वह जनता पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिए गए.

कांग्रेस ने भी समर्थन किया

इंदिरा गांधी ने तय कर लिया था कि वो इस बार नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ कांग्रेस का कोई उम्मीदवार नहीं उतारेंगी. हालांकि कांग्रेस सांसद प्यारेलाल कुरील ये चुनाव लड़ना चाहते थे. उन्होंने इंदिरा से अनुरोध किया कि अगर वह कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार नहीं बन सकते तो उन्हें निर्दलीय ही लड़ने दिया जाए लेकिन इंदिरा ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया.

36 निर्दलियों के नामांकन खारिज हो गए थे

देश की अन्य पार्टियों ने भी नीलम संजीव रेड्डी के समर्थन का फैसला किया. हालांकि रेड्डी के साथ 36 निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी नामांकन किया था लेकिन पात्रता पूरी नहीं करने के चलते सभी का नामांकन रद्द हो गया.

ऐसे में नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ मुकाबले में कोई नहीं था. जब 06 अगस्त 1977 को राष्ट्रपति पद के चुनाव में वोटिंग होनी थी तब रेड्डी के खिलाफ कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं था. रेड्डी सर्वसम्मति से राष्ट्रपति बन गए.

वो चाहते थे राष्ट्रपति भवन के कमरे खाली कर दिए जाएं

उन्हें देश के ऐसे राष्ट्रपति के तौर पर भी याद किया जाता है जो इस विशाल परिसर वाले आलीशान भवन के केवल एक कमरे में रहते थे. वो ये भी चाहते थे कि राष्ट्रपति भवन के बाकी कमरे खाली कर दिए जाएं. बाद में उन्हें काफी समझाया बुझाया गया, तो राष्ट्रपति भवन में रहने आए, लेकिन यहां उनका जीवन काफी सादगी वाला था.

70 फीसदी वेतन सरकारी निधि में देते थे

वो देश के ऐसे राष्ट्रपति भी थे, जो अपनी सैलरी का 70 फीसदी हिस्सा सरकारी निधि में दे देते थे. उन्होंने अन्य राष्ट्रपतियों की तरह नौकर-चाकरों का अमला अपने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए नहीं रखा था. वो कोशिश करते थे कि आम आदमी भी उनसे मिलने के लिए राष्ट्रपति भवन में आ सके.

नेहरू के करीबी नेताओं में थे

नीलम संजीव रेड्डी आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के इल्लूर गांव में संपन्न घर में पैदा हुए थे. काफी जमीनें थीं. बड़ी खेती थी. पिता का रूतबा था. लेकिन नीलम संजीव रेड्डी अलग रास्ते ही चल पड़े. पहले वो आजादी की लड़ाई में कूदे. महात्मा गांधी से प्रभावित हुए. आजादी के बाद वो नेहरू के करीबी नेताओं में थे.

आंध्र के पहले मुख्यमंत्री बने थे

जब 1962 में आंध्र प्रदेश नया राज्य बना तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें वहां का पहला मुख्यमंत्री बनाया. इसके बाद वो केंद्र में कैबिनेट मिनिस्टर बनकर आ गए. पहले लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में शामिल हुए फिर इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के दौरान भी कैबिनेट मंत्री रहे. तब कांग्रेस पर सिंडिकेट का प्रभाव था.

Tags: President of India, Rashtrapati bhawan, Rashtrapati Chunav

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