लाहौर तो हिंदुओं का शहर था, फिर सर रेडक्लिफ इसे ने पाकिस्तान को क्यों दे दिया

लाहौर तो हिंदुओं का शहर था, फिर सर रेडक्लिफ इसे ने पाकिस्तान को क्यों दे दिया
लाहौर जहां अब भी ना जाने कितने मंदिर हैं.

जब जुलाई 1947 में एक बड़े भारत को दो देशों में बांटा जाने लगा तो इंग्लंड में वकील सिरील रेडक्लिफ को ये जिम्मेदारी दी गई. जबकि इससे पहले उन्होंने ऐसा कोई काम किया ही नहीं था. वो चाहते थे कि लाहौर को भारत के पास जाना चाहिए लेकिन उनके सामने एक मजबूरी आ गई

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भारत की आजादी तय हो गई थी लेकिन बंटवारे के साथ. 04 जुलाई 1947 को ब्रिटेन की संसद ने भारत को बांटकर एक और देश पाकिस्तान बनाने पर मुहर लगा दी. इसके बाद जिस शख्स को इस काम पर लगाया गया उसे ना तो भारत की कोई जानकारी थी और ना ही उन्होंने इससे पहले ये काम किया था. उन्हें भारत का मैप दिया गया. कहा गया कि अगले 10-12 दिनों में वो इसको कर डालें.  कई शहर क्यों पाकिस्तान को दिए गए और कई को लेकर क्या तर्क दिए गए. ये काफी रोचक भी है

आजादी ने भारत को दो देशों में बांटा लेकिन अब ये तीन देशों में बंट चुका है. भारत और पाकिस्तान को मैप में बांटने का काम सर सिरील रेडक्लिफ को दिया गया. वो पेशे से वकील थे.  1947 में आनन-फानन में बैरिस्टर रेडक्लिफ को भारत बुलाया गया.

उन्हें भारत और पाकिस्तान के बीच सीमारेखा खींचने का काम सौंपा गया. रेडक्लिफ ना पहले कभी भारत आये थे. ना ही उन्हें भारत के बारे में कोई खास जानकारी थी. ऐसे में रेडक्लिफ ने इस काम में असमर्थता भी जताई,फिर उन्होंने लकीरें खींचनी शुरू कर दीं.



इसी वजह से बंटवारे में कई गलतियां हुईं
यही कारण रहा कि बंटवारे के दौरान ऐसी कई गलतियां हुईं कि भारत और पाकिस्तान बंटवारे के दौरान कुछ जगहें इधर से उधर गईं और वहां होने वाले भूभाग इधर आ गए. फिर बंटवारे के बाद लाखों लोगों को जान गंवानी पड़ी. कहा जाता है कि रेडक्लिफ खुद अपने काम से बहुत खुश नहीं थे. भारत से वापस लंदन जाने के बाद विभाजन से जुड़े सारे दस्तावेज और नक्शे जला दिए थे. बाद में भी उन्होंने इस बारे में ज्यादा बातें नहीं कीं.

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क्या थी हिंदू शहर लाहौर को पाकिस्तान को देने की कहानी
कुलदीप नैय्यर एक ऐसे भारतीय पत्रकार हैं जो रेडक्लिफ़ से आजादी के बाद लंदन जाकर मिले थे. कुलदीप नैय्यर ने एक बार बीबीसी से इस बारे में बातचीत की थी. उन्होंने रेडक्लिफ की आपबीती सुनाते हुए कहा था, "मुझे 10-11 दिन मिले थे सीमा रेखा खींचने के लिए. उस वक़्त मैंने बस एक बार हवाई जहाज़ के ज़रिए दौरा किया. न ही ज़िलों के नक्शे थे मेरे पास. मैंने देखा लाहौर में हिंदुओं की संपत्ति ज़्यादा है. वहां हिंदू बहुत ज्यादा रहते हैं. वो वाकई हिंदुओं का ही शहर था."

रेडक्लिफ ने आगे कहा, " मैंने ये भी पाया कि पाकिस्तान के हिस्से में कोई बड़ा शहर नहीं था. मैंने लाहौर को भारत से निकालकर पाकिस्तान को दे दिया. अब इसे सही कहिए या गलत, लेकिन ये मेरी मजबूरी थी. पाकिस्तान के लोग मुझसे नाराज़ हैं लेकिन उन्हें ख़ुश होना चाहिए कि मैने उन्हें लाहौर दे दिया."

सर रेडक्लिफ को आनन-फानन में भारत बुलाया गया. फिर उन्हें भारत का मैप देकर कहा गया कि इसे 10 दिनों के अंदर दो देशो में बांट दें. रेडक्फिल ना तो इससे पहले कभी भारत आए थे और ना ही उन्हें भारत के बारे कुछ पता था


रेडक्लिफ ने कहा-लाहौर को भारत में होना चाहिए था
कुलदीप नैय्यर ने रेडक्लिफ को एक संवेदनशील इंसान भी बताया.  उन्होंने ये कहा कि रेडक्लिफ को बंटवारे से हुई त्रासदी का बहुत अफसोस रहा. चूंकि रेडक्लिफ को भारत की तत्कालीन स्थिति का अंदाजा नहीं था तो हो सकता है कि उन्हें बंटवारे के चलते आने वाली मानवीय त्रासदी का अंदाजा ही न रहा हो.

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वैसे एक बार रेडक्लिफ ने ये भी कहा था कि मैंने तर्कों से हटकर पाकिस्तान को लाहौर दे दिया. जो भारत का हिस्सा होने वाला था. बंटवारा करने के दौरान मैंने मुस्लिमों का पक्ष लिया. पाकिस्तान को मेरा शुक्रगुजार होना चाहिए.

 फिरोजपुर और गुरुदासपुर चले गये थे पाकिस्तान
सिरील रेडक्लिफ ने जो बॉर्डर तय किया. उसके हिसाब से पंजाब के दो शहर फिरोजपुर और गुरुदासपुर पाकिस्तान के हिस्से में चले गये थे. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस बारे में अटारी-वाघा बॉर्डर को चूने से लकीर खींच कर अलग-अलग करने वाले ब्रिगेडियर महिंदर सिंह चोपड़ा के बेटे पुष्पिंदर चोपड़ा ने बताया, "लॉर्ड माउंटबेटन ने सर सिरील रेडक्लिफ को भारत-पाकिस्तान के बीच बॉर्डर बनाने का काम सौंपा था, लेकिन रेडक्लिफ को बॉर्डर के बारे में बिल्कुल जानकारी नहीं थी."

सर रेडक्लिफ बंटवारे के बाद कई बार कहा कि दरअसल लाहौर को भारत में जाना चाहिए था लेकिन दिक्कत ये थी कि पाकिस्तान के पास कोई बड़ा शहर नहीं था


फिर ये दोनों शहर भारत को लौटाए गए
ऐसे में गलती होना लाजिमी था. माउंटबेटन के दबाव में काम कर रहे रेडक्लिफ ने गुरुदासपुर और फिरोजपुर पाकिस्तान के हिस्से कर दिए. और कुछ दिन बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने रेडक्लिफ से दोनों शहरों को वापस भारत में शामिल करने का आदेश दे दिया. माउंटबेटन के इस आदेश से दोनों शहरों में बहुत मार-काट हुई.

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दार्जिलिंग को लेकर ये अजीब तर्क भी दिया गया
दार्जिलिंग आज भी भारत के मशहूर टूरिस्ट प्लेस में से एक है. इसका भी एक किस्सा सिरील रेडक्लिफ ने बताया था. उन्होंने बताया कि बाउंड्री कमीशन में ही उनके साथ रहे एक बंगाल के शख्स ने उन्हें अकेले में ले जाकर बोला था, "मैं और मेरी फैमिली हर साल गर्मियों में छुट्टियां मनाने दार्जिलिंग जाते हैं. ऐसे में अगर दार्जिलिंग भारत के हिस्से में चला गया, तो वहां जाना बड़ा मुश्किल हो जाएगा."
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