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एक रामायण जो 'ऊं' से नहीं 'बिस्मिल्‍लाह' से होती है शुरू, जानें कहां है और किसने लिखा सोने से जड़ा ये महाकाव्‍य

Amrit Chandra | News18Hindi
Updated: March 2, 2020, 5:24 PM IST
एक रामायण जो 'ऊं' से नहीं 'बिस्मिल्‍लाह' से होती है शुरू, जानें कहां है और किसने लिखा सोने से जड़ा ये महाकाव्‍य
उत्‍तर प्रदेश के रामपुर की रज़ा लाइब्रेरी में रखी वाल्‍मीकि रामायण का फारसी में अनुवाद सुमेर चंद ने किया था. (सभी फोटो: अमृत चंद्र)

उत्‍तर प्रदेश के जिला रामपुर की रजा लाइब्रेरी (Raza Library) में फारसी भाषा में लिखी वाल्‍मीकि रामायण रखी है. सुमेर चंद ने 1713 में मुगल शासक फर्रुखसियर के शासनकाल में इसका संस्‍कृत से फारसी में अनुवाद किया था. इसके हर पन्‍ने को खालिस सोने और कीमती पत्‍थरों से सजाया गया है. इसमें 258 तस्‍वीरें भी हैं.

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रामपुर. देश की राजधानी में हिंदू-मुस्लिम फसाद को लेकर अफवाहों का बाजार बार-बार गरम हो रहा है. दिल्‍ली (Delhi) में दोनों समुदायों के जिम्‍मेदार लोग अफवाहों को खारिज कर गरम मिजाज लोगों को अमन की राह पर लौटाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं. दोनों ही समुदायों के लोग आपसी भाईचारे को बनाए रखने के लिए शांति की बातें बार-बार दोहरा रहे हैं. हम सब जानते हैं कि भारत हमेशा से गंगा-जमुनी तहजीब का पैरोकार रहा है. उत्‍तर प्रदेश के जिला रामपुर की रजा लाइब्रेरी में रखी फारसी भाषा में अनुवाद की गई वाल्मीकि रामायण (Valmiki Ramayana) इस बात की गवाही देने के लिए काफी है.

सुमेर चंद ने 1713 में पारसी में किया था अनुवाद
संस्‍कृत से फारसी भाषा में अनुवाद की गई इस रामायण की सबसे बड़ी खूबी है कि ये ऊं (Aum) के बजाय 'बिस्मिल्लाह-अर्रहमान-अर्रहीम' से शुरू होती है. इसके मायने हैं, 'शुरू करता हूं अल्‍लाह के नाम से, जो बेहद रहम वाला है. उस वहदूद लाशरीक यानी अद्वितीय ईश्वर के उपकार के बाद मैं यह रामायण लिख रहा हूं.' रामपुर (Rampur) की रजा लाइब्रेरी (Raza Library) में मौजूद इस रामायण का संस्‍कृत (Sanskrit) से फारसी (Persian) में अनुवाद सुमेर चंद (Sumer Chand) ने 1713 में किया था. सुमेर चंद ने मुगल शासक फर्रुखसियर के शासनकाल में पारसी वाल्‍मीकि रामायण लिखी थी.

हर पन्‍ना सोने और कीमती पत्‍थरों से सजाया है



फारसी भाषा में अनुवाद की गई इस रामायण के हर पन्‍ने को खालिस सोने (Gold) और कीमती पत्‍थरों (Precious Stones) से सजाया गया है. इसमें प्रसंगों के मुताबिक मुग़ल शैली (Mughal Style) में 258 चित्र (Pictures) बनाए गए हैं. उन तस्वीरों में राम, सीता और रावण बिल्कुल अलग दिखते हैं. पारसी रामायण के रावण के दस सिर तो हैं, लेकिन उसका 11वां सिर गधे का है, जो सबसे ऊपर दिखाया गया है. इसके अलावा चित्रों में दिखाए गए पात्रों के आभूषणों, कला, वास्तुकला, वेशभूषा मध्ययुगीन काल (Medieval Times) में भारत की संस्कृति पर रोशनी डालते हैं.



पारसी रामायण में रावण के दस सिर के साथ 11वां सिर भी दिखाया गया है, जो गधे का है.


सभी पात्र मुग़ल शैली के वस्‍त्रों में दिखाए गए हैं
रामायण की शुरुआत में लिखा है कि 4,000 रुपये में इस किताब को खरीदा जा सकता है. वहीं, इसकी शुरुआत बिस्मिल्‍लाह से होती है. फारसी रामायण के राम-लक्ष्मण और सीता मुग़ल शैली के राजसी वस्‍त्रों में हैं. पात्रों के सिर पर सजी पगड़ी और टोपी मुग़लिया दौर की हैं. कुछ तस्वीरों में पात्रों के हाथों में धनुष की जगह तलवारें (Swords) दिखाई गई हैं. ऋषियों के बीच दिखाए गए राम धोती और जनेऊ धारण किए हुए हैं. एक चित्र में विश्वामित्र, राम और राजा दशरथ किे सामने रखे बर्तनों में हीरे (Diamonds) जड़े हुए दिखाए गए हैं.

पारसी रामायण का हिंदी में भी हुआ अनुवाद
रज़ा लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन अबु साद इस्‍लाही बताते हैं कि बाद में फारसी रामायण का हिंदी में अनुवाद (Hindi Translation) प्रो. शाह अब्दुस्सलाम और डॉ. वकारुल हसल सिद्दीकी ने किया है. ये हिंदी अनुवाद भी रज़ा लाइब्रेरी में मौजूद है. वह कहते हैं, ये मिसाल ही है कि वाल्‍मीकि रामायण का संस्कृत से परसी में अनुवाद एक हिंदू सुमेर चंद ने किया और फिर पारसी से हिंदी में अनुवाद दो मुस्लिमों ने किया है. उन्‍होंने बताया कि वक़ारुल हसन तो अपने अनुवाद को पुस्तक के तौर पर देख भी नहीं सके. उससे पहले ही उनका निधन हो गया.

रज़ा लाइब्रेरी में मौजूद हैं 17,000 पांडुलिपियां
रज़ा लाइब्रेरी के रिसर्च इंचार्ज इस्‍बाह खान बताते हैं कि यहां कई भाषाओं और लिपियों की 60,000 से ज्‍यादा किताबें हैं. इनमें भी 17,000 पांडुलिपियां (Manuscripts) हैं. उन्‍होंने बताया कि यहां मक्का (Mecca) से लाई गई कुरान (Quran) की पांडुलिपि भी है. इसके अलावा 17वीं सदी की रामायण की पांडुलिपि भी है. उनके मुताबिक, लाइब्रेरी में 7वीं सदी का हाथ से लिखा हुआ क़ुरान भी मौजूद है. वह बताते हैं कि यहां रखी इन अमूल्‍य धरोहरों को सहेजने के लिए 6-7 विशेषज्ञ लाइब्रेरी की लैब में दिन-रात मेहनत करते हैं.

रज़ा लाइब्रेरी में कई भाषाओं और लिपियों की 60,000 से ज्‍यादा किताबें हैं. इनमें भी 17,000 पांडुलिपियां हैं.


नवाब फैज़ उल्‍ला खान ने स्‍थापित की थी लाइब्रेरी
रामपुर के नवाब फैज़ उल्ला खान ने 1774 में रज़ा लाइब्रेरी स्थापित की थी. उन्होंने राज्य पर 1794 तक शासन किया. रामपुर के किले में मौजूद जामा मस्जिद के पीछे हामिद मंजिल में मौजूद रज़ा लाइब्रेरी को एशिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी माना जाता है. इसे आज का स्‍वरूप रामपुर के नवाब हामिद अली खान ने दिया. इसीलिए लाइब्रेरी को हामिद मंजिल भी कहा जाता है. नवाब हामिद अली खान ने रामपुर रियासत पर 1889 से 1930 तक शासन किया. इस्‍बाह खान बताते हैं कि रज़ा लाइब्रेरी आज के स्‍वरूप में 1907 में पूरी हुई थी.

'नवाबों की शायरी में होता था राधा-कृष्‍ण का जिक्र'
रामपुर के डीएम और रज़ा लाइब्रेरी के डायरेक्‍टर इंचार्ज आंजनेय कुमार सिंह ने बताया कि यहां संस्‍कृत, फ़ारसी के अलावा ऊर्दू, हिंदी, तुर्की, तमिल में लिखी गई कई किताबों की पांडुलिपियां मौजूद हैं. उनका कहना है कि रज़ा लाइब्रेरी में किताबों के रूप में देश का अमूल्‍य खजाना मौजूद है. हालांकि, उनको अफसोस है कि रामपुर को जिस रूप में पहचाना जाना चाहिए था, लोग इस शहर के बारे में ठीक उलटा सोचते हैं. उन्‍होंने बताया कि यहां के नवाबों ने शिक्षा के क्षेत्र में शानदार काम किया है. उनके मुताबिक, रामपुर के हर स्‍कूल-कॉलेज के नाम में अलग ही कहानी है. वह बताते हैं कि यहां के नवाबों की शायरी में राधा और कृष्‍ण का जिक्र होता था, जो यहां की शानदार संस्‍कृति और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है.

बेगम नूर बानो निकाह में लाई थीं लोहारू साहित्‍य समेत 4,000 किताबें
रामपुर की कवि-शायर परंपरा को आगे बढ़ाने वाले हिंदी के सेवानिवृत्‍त प्रवक्‍ता (Rtrd Lecturer) डॉ. चंद्र प्रकाश शर्मा ने बताया कि कांग्रेस सांसद रहीं बेगम नूरबानो (Begum Noor Bano) निकाह के वक्‍त 4,000 किताबें अपने साथ लाई थीं. इनमें लोहारू साहित्‍य की काफी किताबें थीं. इससे साफ होता है कि नवाब परिवार के लोगों को पढ़ने-पढ़ाने का काफी शौक था. उन्‍होंने बताया कि रामपुर को दिल्ली और लखनऊ के बाद कविता-शायरी के तीसरे स्कूल के रूप में माना जाता है. रामपुर के नवाब कविता और शायरी के बहुत शौकीन थे. वह बताते हैं कि दुनिया भर में प्रसिद्ध शायर मिर्जा असद उल्ला खां गालिब का रामपुर से गहरा नाता रहा है. वह रामपुर के दो नवाबों के उस्ताद रहे. उन्हें रामपुर रियासत से हर महीने 100 रुपये वजीफा मिलता था.

पारसी में अनुवाद की गई रामायण के पात्र मुगलकालीन परिधानों में नजर आते हैं. इसमें प्रसंगों के मुताबिक 258 चित्र बनाए गए हैं.


'मिर्जा ग़ालिब रहे नवाबों के उस्‍ताद, 1857 के बाद रामपुर में रहे'
डॉ. चंद्र प्रकाश शर्मा बताते हैं, '1857 की क्रांति के बाद ऐसे हालात पैदा हुए कि मिर्जा गालिब रामपुर पहुंच गए. वह 1860 में रामपुर रियासत के नवाब यूसुफ अली खां के उस्‍ताद बने. इसके बाद वह नवाब कल्बे अली के भी उस्‍ताद रहे. उन्हें वजीफा के अलावा रामपुर में रहने के लिए एक मकान भी दिया गया था. कई बार रामपुर आने पर वह शाही महल कोठी खासबाग के मेहमान भी बने. हालांकि, वह कुछ साल बाद दिल्ली चले गए, लेकिन रामपुर के नवाबों से चिट्ठियों का सिलसिला बदस्‍तूर जारी रहा. गालिब के नवाबों को लिखे 150 पत्र अभी भी रज़ा लाइब्रेरी में मौजूद हैं. वह कहते हैं कि रामपुर की संस्‍कृति आज के युवाओं के लिए हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए मिसाल है, जरूरत है तो बस उसे फिर जिंदा कर इसका प्रचार-प्रसार करने की.

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First published: March 2, 2020, 5:18 PM IST
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