धूमकेतू पर दिखा चमकीला पराबैंगनी Aurora, इसके बनने की वजह ने किया हैरान

धूमकेतू (Comet) पर ऑरोर (Aurora) पहली बार देखने को मिला है. (तस्वीर: Pixabay)
धूमकेतू (Comet) पर ऑरोर (Aurora) पहली बार देखने को मिला है. (तस्वीर: Pixabay)

ऑरोर (Aurora) जैसी घटना पृथ्वी के अलावा कई ग्रहों (Planets) और उनके कुछ चंद्रमाओं (Moons) पर भी होती है, लेकिन धूमकेतू (Comet) पर यह पहली बार होती देखी गई है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 23, 2020, 9:44 PM IST
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ऑरोर (Aurora) पृथ्वी के उच्च वायुमंडल (High Atmosphere) में होने वाली बहुत ही दिलचस्प घटना है. इस घटना की वजह  से वायुमंडल में आयनीकृत कण (Ionised particles) एक चमकीला नाच (Dance) दिखाते हैं. यह घटना पृथ्वी की ध्रुवों (Poles) के पास देखी जा सकती है. ऐसा नहीं है कि यह केवल पृथ्वी में ही होने वाली घटना है.

सौरमंडल पर इन ग्रहों पर भी होती है यह घटना
इस तरह कि परिघटनाओं हमारे सौरमंडल के हर ग्रह पर होती है, केवल बुध ग्रह को छोड़कर. यहां तक कि गुरू ग्रह के चंद्रमा गैनीमीड और यूरोपा में इसे देखा जा सकता है. अब तक इससे पहले कभी किसी धूमकेतू पर इस तरह की घटना होती नहीं देखी गई थी.

कैसे पता चला इस घटना का
नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित इस अध्ययन में बताया गया है कि रोसेटा अंतरिक्ष यान से मिला आकंड़ों के विश्लेषण करने का बाद का चला है कि 67P चुर्युमोव गेरासिमेन्कोव (67P/C-G) नाम के धूमकेतु में पराबैंगनी ऑरोर विकिरण की घटना हुई है. साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के भौतिकविद जिम बुर्च ने बताया कि वे पृथ्वी के ऑरोर का अवलोकन पिछले पांच साल से कर रहे हैं जिम ने कहा, “ 67P के आसपास ऑरोर का पाया जाना जिसके पास खुद की मौग्नेटिक फील्ड नहीं है, हैरान करने के साथ ही रोचक भी है.”



कैसे बनता है यह ऑरोर
आमतौर पर ऑरोर वायुमंडल में आवेशित कणों की उत्तेजना के कारण पैदा होते हैं. पृथ्वी पर सौर पवनों जब हमारे मैग्नेटोस्फियर में आती हैं और आवेशित कणों से अंतरक्रियाएं करती हैं, तो वायुमंडल के ऊपरी हिस्से में इन कणों की बारिश होती है. ये कण मैग्नेटिक लाइन्स के जरिए ध्रुवों की ओर जाते हैं जहां वे प्रकाश का अद्भुद नजारे के तौर पर दिखाई देते हैं.
अलग जगह पर अलग वजहअरोर की खास बात यह होती है कि ये अलग-अलग पिंडों में अलग तरह से काम करता है. गैनीमीड और यूरोपा में यह गुरू ग्रह के मैग्नेटिक फील्ड से होने वाली अंतरक्रिया के कारण पैदा होता है. वहीं शुक्र ग्रह की मैग्नेटिक फील्ड नहीं है, लेकिन वहां सूर्य की सौर पवनों का इतना ज्यादा असर होता है कि उसी से शुक्र ग्रह पर यह परिघटना होती है.जानिए हमारे सौरमंडल में कहां-कहां है जीवन की संभावनाएं     मंगल, गुरू और शनि पर यह कारणमंगल ग्रह पर वायुमंडल बहुत ही पतला है लेकिन उसका कमजोर मैग्नेटिक फील्ड ऑरोर का समर्थन करता है. गुरू ग्रह पर स्थायी ऑरोर का सौर पवनों के कारण पैदा होता है, लेकिन वहां इसकी प्रक्रिया के रहस्य को पूरी तरह से समझना बाकी है. शनिग्रह पर ऑरोर का छल्ला सौर पवनों से बना होता है. इनकी व्याख्या भी अभी तक सही तौर पर नहीं हो सकी है.और धूमकेतू पर67P/C-G धूमकेतू का भी कोई मैग्नेटिक फील्ड नहीं है, लेकिन उसका अपना एक वायुमंडल है.  उसके गैस के वातावरण को कोमा कहते हैं जो उसके केंद्र के आसपास होता है. जब यह सूर्य के पास जाता है तब इसकी कुछ बर्फ भी सीधे भाप बनने लगती है.


क्या खास बात
इसी कोमा मे होने वाली घटना को रोसेटा अंतरिक्ष यान के फर अल्ट्रावॉयलेट स्पैक्ट्रोग्राफ (FUV) एलिस उपकरण ने पैराबैंगनी प्रकाश को कैद कर लिया. एलिस के आयन और इलेक्ट्रॉन सेंसर ने इससे भी एक बड़ी हैरान करने वाली बात पकड़ी. वह थी सौरपवनों से आने वाले इलेक्ट्रॉन.

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साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के खगोलविद जोएल पार्कर ने बताया, “शुरू में हमने सोचा कि धूमकेतु 67P से निकलने वाले पराबैंगनी उत्सर्जन एक डेग्लो नाम की परिघटना है. यह प्रक्रिया सूर्य के फोटोन की धूमकेतू की गैस से होने वाली अंतरक्रिया के कारण है. लेकिन हमें  यह जानकर हैरानी हुई की फोटोन के कारण नहीं बल्कि इलेक्ट्रॉन के कारण यह परिघटना हुई. इलेक्ट्रॉन से ही पानी के अणु अलग हुए और उन आवेशित अणुओं से विशेष तरह का प्रकाश पैदा हुआ.”
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