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Coronavirus: बीमारी से बचाव ही नहीं, इसलिए भी जरूरी है करीब 2 मीटर की दूरी बनाकर रखना

News18Hindi
Updated: March 17, 2020, 2:43 PM IST
Coronavirus: बीमारी से बचाव ही नहीं, इसलिए भी जरूरी है करीब 2 मीटर की दूरी बनाकर रखना
दुनिया भर के स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल डिस्‍टेंसिंग बीमारी से बचाव के मुकाबले कोरोना वायरस के प्रसार की गति को घटाने के लिए जरूरी है. इससे लोगों के बीमार पड़ने की दर तेजी नहीं बढ़ पाएगी.

स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल डिस्‍टेंसिंग (Social Distancing) के जरिये कोरोना वायरस (Coronavirus) के फैलने की रफ्तार को घटाया जा सकता है. इससे देश के हेल्‍थकेयर सिस्‍टम पर अचानक पड़ने वाले बोझ से भी बचा सकता है.

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  • Last Updated: March 17, 2020, 2:43 PM IST
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नई दिल्‍ली. चीन के वुहान (Wuhan) शहर से फैलना शुरू हुआ कोरोना वायरस (Coronavirus) दुनिया भर में 1.83 लाख लोगों को चपेट में ले चुका है. इनमें 7,174 लोगों की मौत हो चुकी है. ऐसे में इससे बचाव के तमाम उपाय किए जा रहे हैं. इनमें एक उपाय आपस में करीब 2 मीटर की दूरी बनाए रखना भी है ताकि संक्रमण (Infection) फैलने की रफ्तार को कम किया जा सके. मेडिकल एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि एक निश्चित दूरी से ही लोगों के संपर्क में आएं. दूसरे शब्‍दों में कहें तो सोशल डिस्‍टेंसिंग (Social Distancing) इस वायरस के खिलाफ कारगर हथियार साबित हो सकता है. इससे किसी को खांसी या छींक आने पर ड्रॉपलेट दूसरे व्‍यक्ति तक नहीं पहुंचेगी और वह वायरस की चपेट में आने से बच सकता है. जानकारों का कहना है कि ये दूरी बनाए रखना इस वैश्विक महामारी (Pandemic) से बचाव के साथ ही कई दूसरे कारणों से भी अहम है.

सोशल डिस्‍टेंसिंग से पाया जा सकता है फैलने की रफ्तार पर काबू
स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों (Health Experts) का कहना है कि संक्रमण को फैलने से रोकना हर व्‍यक्ति की जिम्‍मेदारी है. उनके मुताबिक, ऐसी महामारी के खिलाफ ओवर-रिएक्‍शन (Overreaction) से अंडर-रिएक्‍शन (Under-reaction) ज्‍यादा खतरनाक है. विशेषज्ञों के मुताबिक, सोशल डिस्‍टेंसिंग के जरिये कोरोना वायरस के प्रसार की रफ्तार पर काबू पाया जा सकता है. इसी रणनीति के मद्देनजर भारत में स्‍कूल (Schools), ऑफिस (Offices), सिनेमा (Cinemas) और सार्वजनिक कार्यक्रमों (Public Gathering) को बंद कर दिया गया है. COVID-19 का सबसे ज्‍यादा खतरा 60 साल से ज्‍यादा उम्र के बुजुर्गों और लंबे समय से किसी बीमारी का इलाज करा रहे लोगों को है. ऐसे लोगों को भीड़ वाले इलाकों और सार्वजनिक वाहनों से यात्रा करने से बचना चाहिए.





अचानक पढ़ने वाले बोझ से बचा रहेगा देश का हेल्‍थकेयर सिस्‍टम


सोशल डिस्‍टेंसिंग के जरिये न सिर्फ इस वैश्विक महामारी के प्रसार की रफ्तार को थामा जा सकता है, बल्कि देश के हेल्‍थकेयर सिस्‍टम (Healthcare System) को अचानक पड़ने वाले बोझ से भी बचाया जा सकता है. स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल डिस्‍टेंसिंग बीमारी से बचाव के मुकाबले इस वायरस के प्रसार की गति को घटाने के लिए जरूरी है. इससे लोगों के बीमार पड़ने की दर तेजी नहीं बढ़ पाएगी. संक्रामक बीमारियों की विशेषज्ञ एमिली लंदन का कहना है कि अगर युवा ज्‍यादा बीमार पड़ने लगेंगे तो बुजुर्गों के बीमार पड़ने की दर बहुत तेजी से बढ़ जाएगी. इससे हेल्‍थकेयर सिस्‍टम पर दबाव बढ़ेगा. सोशल डिस्‍टेंसिंग अस्‍पतालों को कोविड-19 के मरीजों से भरने से बचाएगी. अगर अस्‍पातलों में कोरोना वायरस के बीमारों की संख्‍या बढ़ी तो पहला स्‍वास्‍थ्‍य कर्मियों पर काम का बोझ बढ़ जाएगा, दूसरा डॉक्‍टरों को बाकी मरीजों को छोड़कर प्राथमिकता के आधार पर उनका इलाज करना पड़ेगा.

नहीं रुका तो दुनियाभर में बड़ा हो सकता है मरने वालों का आंकड़ा
कोरोना वायरस दुनिया भर के हेल्‍थ सिस्‍टम के लिए बड़ी और वास्‍तविक चुनौती की तरह है. जर्मनी (Germany) की चांसलर एंजेला मर्केल (Angela Merkel) ने पिछले सप्‍ताह कहा था कि कोरोना वायरस देश की 70 फीसदी आबादी को अपनी चपेट में ले सकता है. टाइम्‍स ऑफ इं‍डिया की रिपोर्ट के मुताबिक, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (Harvard University) के महामारी विशेषज्ञ मार्क लिपसिच का कहना है कि आने वाले समय में पूरी दुनिया के 20 से 60 फीसदी युवा (Youth Population) इस वायरस की चपेट में होंगे. इसमें 80 फीसदी मामले ऐसे होंगे, जिन्‍हें इलाज से ठीक कर लिया जाएगा. अब अगर इस वायरस की जद में आने वालों की मृत्‍यु दर 1 फीसदी भी रहती है तो भी दुनिया भर में COVID-19 से मरने वालों का आंकड़ा बहुत बड़ा होगा.

अमेरिका और जर्मनी भी कोरोना वायरस के मरीजों के संभावित आंकड़ों को देखते हुए स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं जुटाने के लिए ज्‍यादा समय की जरूरत की बात कर रहे हैं.


विकसित देश भी स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं जुटाने को मांग रहे ज्‍यादा समय
जर्मनी और अमेरिका (America) जैसे देश भी इस वायरस की चपेट में आकर बीमार पड़ने वाले संभावित लोगों को सभी स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं उपलब्‍ध कराने के लिए वक्‍त की कमी का हवाला दे रहे हैं. उनका कहना है कि उन्‍हें भी लोगों को पूरी स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं उपलब्‍ध कराने के लिए और समय की दरकार है. ऐसे में समझा जा सकता है कि अगर भारत जैसे देशों में ये वायरस फैला तो खराब स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यवस्‍थाओं के चलते हालात बहुत खराब होंगे. ऐसे में भारत इस बीमारी को फैलने से रोकने के लिए ही हरसंभव उपाय कर रहा है. भारत में इस समय 1,000 लोगों पर 1.8 हॉस्पिटल बेड और 0.8 डॉक्‍टर ही उपलब्‍ध है. ऐसे में हर व्‍यक्ति की जिम्‍मेदारी है कि वो वायरस को फैलने से रोकने के लिए सोशल डिस्‍टेंसिंग का सहारा ले. ब्रिटेन के 200 वैज्ञानिकों और मेडिकल प्रोफेशनल्‍स ने सोशल डिस्‍टेंसिंग की वकालत की है.

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First published: March 17, 2020, 2:43 PM IST
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