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भारत से 26 साल पहले ही आजादी पाने के बाद कैसे इस हाल में आया अफगानिस्तान

60 के देशक में अफगानिस्तान की महिलाएं.

60 के देशक में अफगानिस्तान की महिलाएं.

अफगानिस्तान (Afghanistan) को भारत से 26 साल पहले ब्रिटेन से आजादी मिल गई थी. तब ये देश जिस तरह बदल रहा था, उसे देखते हुए कहा जाता था कि आने वाले समय में ये देश एशिया का सबसे आधुनिक देश होगा. यहां की महिलाएं तेजी से मुख्यधारा में शामिल हो रही थीं. फिर कैसे बदल गया इस देश का भाग्य.

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अफगानिस्तान भारत से 26 पहले अंग्रेजों की पकड़ से आजाद हुआ था. ब्रिटेन के साथ हुए तीसरे युद्ध में उन्होंने ब्रिटेन को हराया और पूरी तरह खुद को आजाद कर लिया. उसके बाद अफगानिस्तान में जिस तेजी से सुधार के कार्यक्रम और औद्योगिकरण शुरू हुआ तो ये कहा जाने लगा कि ये देश आने वाले समय एशिया का सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाला देश होगा. तब अफगानिस्तान तेजी से शिक्षा और आधुनिकता की ओर कदम बढ़ा रहा था. महिलाएं फैशनपसंद थीं. वो डॉक्टरी से लेकर इंजीनियरिंग तक की पढ़ाई कर रही थीं. फिर इस देश को क्या हो गया. ये कैसे इस हाल में पहुंच गया कि कट्टर इस्लामी संगठन तालिबान के कब्जे में आ गया.

अमीर अमानुल्ला खान वहां के सबसे बडे़ नेता थे. उन्होंने देश के सामाजिक आर्थिक सुधारों के लिए जोरशोर से अभियान चलाया. 1926 में अमानुल्ला ने खुद को राजा घोषित कर दिया. इसके बाद उन्होंने लोया जिरगा, राष्ट्रीय परिषद के अधिकार सीमित किए तो उनके विरोध होने लगा. विद्रोह होने लगे. अंत्वोगत्वा अमानुल्ला देश छोड़कर भाग गया. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि उन्होंने अफगानिस्तान में सुधार के बहुत से कार्यक्रम शुरू किए. वो इस देश को आधुनिक देश बनाना चाहते थे. इसी दौरान शिक्षा और औद्योगिकरण के कई काम शुरू हुए.

अफगानिस्तान की फौजों ने तीसरे युद्ध में ब्रिटेन को हराकर 1921 में आजादी हासिल कर ली.

1933 में जहीर शाह राजा बने
1933 में जहीर शाह इस देश के राजा बने. उन्होंने अगले 40 सालों तक देश में शासन किया. वहां स्थिरता ला दी. इसी दौरान अफगानिस्तान की दोस्ती अमेरिका से बढ़ी. उन्होंने इस देश को मान्यता दे दी. जब भारत आजाद हुआ और बंटवारा हुआ तो पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान का एक बड़ा बॉर्डर लगता था, जो बहुत अशांत भी था.

50 के दशक में सोवियत संघ से नजदीकियां शुरू हुईं
1953 में सोवियत समर्थक जनरल मोहम्मद दाऊद खान देश के प्रधानमंत्री बने. वो राजा के कजन भी थे. उन्होंने सोवियत संघ से नजदीकियां बढ़ानी शुरू कीं ताकि उससे देश के लिए आर्थिक और सैन्य मदद मिल सके.

महिलाओं को मुख्यधारा में लाया गया
इसी दौरान दाऊद ने देश में तमाम सुधार के कार्यक्रम शुरू किए. जिसमें महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में लाना और नौकरियां भी थीं. महिलाओं के लिए शिक्षा का प्रोग्राम देश में बहुत पहले से चलाया जा रहा था. तब सोवियत संघ के राष्ट्रपति निकिता ख्रुश्चेव थे, जो अफगानिस्तान की मदद के लिए राजी थे. दोनों देश नजदीकी मित्र बन गए.

50 के दशक में अफगानिस्तान की दोस्ती सोवियत संघ के साथ काफी बेहतर स्थिति में आ गई.

तब अफगान महिलाएं एशिया में सबसे आधुनिक मानी जाने लगीं
दाऊद के प्रधानमंत्री काल के दौरान 50 और 60 के दशक में बहुत काम हुए. सुधार संबंधी कई कार्यक्रम चलाए गए. महिलाएं देश की मुख्यधारा में आ गईं. वो मेडिकल और टैक्निकल यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने लगीं. उच्च शिक्षा हासिल करने लगीं. तब ये कहा जाने लगा था कि अफगानिस्तान की महिलाएं एशिया में सबसे बेहतर स्थिति की ओर जा रही हैं. उन्हें आधुनिक भी माने जाने लगा.

विद्रोह में राजा को गद्दी से उतारा गया
1965 में मोहम्मद दाऊद खान ने सैन्य विद्रोह के जरिए अफगानिस्तान के आखिरी राजा मोहम्मद जहीर शाह को गद्दी से उतार फेंका. इसके बाद खान की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ अफगानिस्तान पूरी तरह सत्ता में आ गई. खान ने राजशाही खत्म कर दी. उन्होंने खुद को राष्ट्रपति घोषित किया. अब अफगानिस्तान गणतांत्रिक देश बन गया.

60 के दशक में काबुल के मेडिकल कॉलेज की दो स्टूडेंट अपनी टीचर के साथ

नए संविधान में महिलाओं को व्यापक अधिकार
1975 में खान ने नया संविधान प्रस्तावित किया, जिसमें महिलाओं को व्यापक अधिकार दिए और देश के आधुनिकीकरण के लिए बड़ा कदम उठाया. लेकिन इस दौरान उन्होंने विपक्षी नेताओं का जमकर दमन भी किया.

प्रधानमंत्री दाऊद की हत्या 
बाद में एक कम्युनिस्ट विद्रोह में खान की हत्या कर दी गई. देश पर अब अफगान कम्युनिस्ट पार्टी का राज हो गया. मोहम्मद तराकी राष्ट्रपति बने. उ्न्होंने घोषित किया कि देश अब इस्लामी सिद्धांतों, अफगानी राष्ट्रवाद और सामाजिक-आर्थिक न्याय के आधार पर चलेगा. सोवियत संघ के साथ दोस्ती की नई संधि हुई. लेकिन तराकी और एक प्रभावशाली कम्युनिस्ट नेता हफीजुल्लाह अमीन के बीच अदावत शुरू हो गई.

कट्टर इस्लामी सियासत उभार लेने लगी
इसी दौरान अफगानिस्तान में कट्टर इस्लामी सियासत भी उभार ले रही थी. उसको सामाजिक बदलावों से इतराज था. उसने देश में सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिए. जून 1978 में मुजाहिदीन गौरिल्ला आंदोलन शुरू हुआ, जिसे सोवियत सरकार का समर्थन हासिल था. 1979 में जब अमेरिकी राजदूत एडोल्फ डब्स की हत्या हो गई तो अमेरिका ने अफगानिस्तान से सारे संबंध तोड़ लिए. तराकी और हफीजुल्लाह अमीन के बीच संघर्ष शुरू हो गया. तराकी को अमीन समर्थकों ने 14 सितंबर 1979 को मार दिया.

70 के दशक में काबुल की इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी की छात्राएं.

1979 में सोवियत फौजें अफगानिस्तान में घुस आईं
सोवियत संघ ने 24 दिसंबर को अफगानिस्तान पर चढ़ाई कर दी. अमीन और उनके समर्थकों को फांसी पर लटका दिया गया. तब उप प्रधानमंत्री बाबरक कमाल को प्रधानमंत्री बनाया गया लेकिन इसके खिलाफ पूरे देश में हिंसक प्रदर्शन होने लगे. लोगों को सोवियत फौजों की मौजूदगी से भी एतराज था. 1980 तक मुजाहिदीन विद्रोह सोवियत फौजों के खिलाफ एकजुट होने लगे तो अफगान आर्मी को सोवियत समर्थन शुरू हुआ.

पाकिस्तान के रास्ते विद्रोहियों को पहुंचने लगे हथियार
1982 तक अफगानिस्तान में गृह युद्ध की जैसी स्थिति आ गई. बडे़ पैमाने पर लोग पाकिस्तान और ईरान की ओर भागने लगे. ग्रामीण इलाकों में मुजाहिदीन का नियंत्रण हो गया जबकि शहरी इलाकों में सोवियत फौजें मौजूद थीं. अमेरिका से मुजाहिदीन को हथियार मिलने लगे. साथ ही ब्रिटेन और चीन से भी पाकिस्तान के रास्ते ये हथियार विद्रोहियों तक पहुंचने लगे.

लादेन ने सोवियत मौजूदगी के खिलाफ जेहाद छेड़ा
1984 में ओसामा बिन लादेन और 15 इस्लामी नेताओं ने मिलकर अल कायदा संगठन खड़ा किया. जिनका उद्देश्य अफगानिस्तान में सोवियत मौजूदगी के खिलाफ जेहाद था. इसमें उन्हें जीत मिलने लगी. सोवियत फौजें वापस लौटने लगीं. अब इसके बाद अमेरिका ही उनके निशाने पर आ गया. उन्हें लगने लगा कि अफगानिस्तान को इस्लामी राष्ट्र बनाने में सबसे बड़ा रोड़ा अमेरिका ही है. वैसे अमेरिका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और सोवियत संघ के बीच जिनेवा में एक संधि के बाद एक लाख सोवियत फौजों की पूरी तरह वापसी हो गई.

विद्रोहियों में भी दोफाड़ हो गई 
लेकिन अफगानिस्तान में अब भी सोवियत समर्थन वाले कम्युनिस्ट राष्ट्रपति डॉ. मोहम्मद नजीबुल्लाह गद्दी पर बने हुए थे. मुजाहिदीन लगातार उनका विरोध कर रहे थे. वो निर्वाचित जरूर थे लेकिन उन्हें सोवियत संघ की कठपुतली कहा जाता था.

1992 में मुजाहिदीन और दूसरे विद्रोही ग्रुप ने काबुल पर हमला करके नजीबुल्लाह को गद्दी से उतार फेंका. गौरिल्ला नेता अहमद शाह मसूद इन विद्रोहियों की अगुवाई कर रहा था लेकिन विद्रोहियों के ही इस्लामी पैरोकार ग्रुप ने खुद को अलग करके अफगानिस्तान को इस्लामी देश घोषित कर दिया. प्रोफेसर बुरहानुद्दीन रब्बानी राष्ट्रपति बनाए गए.

तालिबान जैसा ताकतवर संगठन खड़ा हुआ
1994 में एक ताकतवर इस्लामी सैन्य संगठन तालिबान का उदय हुआ. जो जल्दी ही अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो गया. ये बेहद निर्मम शासक थे, तालिबान ने तुरंत कट्टर इस्लामी शासन लागू किया और अत्याचार शुरू कर दिए. महिलाएं खासतौर पर उनका निशाना बनीं. महिलाओं के घर से बाहर निकलने, नौकरियों, पढ़ने समेत तमाम गतिविधियों पर रोक लगा दी गई.

अमेरिका ने तालिबानी शासन को मान्यता देने से मना किया 
वर्ष 1998 में तालिबान को अमेरिका ने मान्यता देने से मना कर दिया. तालिबान के जुल्म देशभर में शुरू हो गए. हालांकि देश में उत्तरी प्रांतों पर मसूद के गठबंधन का नियंत्रण था तो दक्षिण की ओर कुछ हिस्से हामिद करजई के कंट्रोल में. तालिबान की इनसे झड़प चलती रहती थी. इसी बीच ओसामा बिन लादेन का प्रभाव अफगानिस्तान पर बढ़ गया. ओसामा लगातार अफगानिस्तान में बैठकर दुनियाभर में आतंकी गतिविधियों को जामा पहना रहा था. अमेरिका ने वर्ष 2000 में तालिबान से ओसामा को सौंपने को कहा. तालिबान ने साफ मना कर दिया.

वर्ल्ड ट्रेड टॉवर को उड़ाया गया
वर्ष 2001 में तालिबान ने बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं को बम से उड़ा दिया. इस बीच तालिबान ने उत्तरी प्रांत के दिग्गज विद्रोही नेता मसूद को मरवा दिया. 11 सिंतबर 2001 को अलकायदा ने विमान हाईजैक करके न्यूयार्क में वर्ल्ड ट्रेड टॉवर को उड़ा दिया. इससे सारी दुनिया दहल गई. अमेरिका ने इसके पीछे लादेन और अफगानिस्तान की सत्ता पर बैठे तालिबान को जिम्मेदार माना.

अमेरिका और मित्र देशों ने अफगानिस्तान में कार्रवाई की
अक्टूबर 2001 में अमेरिका और ब्रिटेन की सेनाओं ने अफगानिस्तान पर आक्रमण शुरू किया. इसके निशाने पर थे तालिबान और अलकायदा के अड्डे. इसके बाद उत्तरी प्रांतों के विद्रोहियों ने काबुल में प्रवेश किया. तालिबान दक्षिण की ओर भाग गए. हालांकि उन्हें चुन चुनकर पकड़ा गया.

करजई की अंतरिम सरकार बनी
अमेरिका के समर्थन से हामिद करजई की अंतरिम सरकार बनाई गई. बाद में उन्होंने चुनी हुई सरकार भी बनाई. ये सरकार 2004 तक चली. इस बार बड़े पैमाने की वोटिंग हुई और करजई फिर राष्ट्रपति बने.
लेकिन अफगानिस्तान में अल कायदा और तालिबान विद्रोही फिर पैर जमाने लगे. बेशक नाटो सैन्य संगठन ने वहां शांति सेना को और बढ़ाया लेकिन तालिबान हमलों में कमी नहीं आई.

2014 में अशरफ गनी राष्ट्रपति बने
2014 में अशरफ गनी राष्ट्रपति बने. लेकिन इन चुनावों में व्यापक तौर पर धांधली के आरोप लगी. दिसंबर में नाटो ने अफगानिस्तान में अपना आपरेशन खत्म कर दिया. अब उनकी भूमिका केवल अफगान फौजों की ट्रेनिंग तक सीमित रह गई. अमरिका ने भी अपनी फौजों की वापसी की बात कह दी. 2021 में अमेरिका ने पूरी तरह से अपनी सेनाएं हटा लीं. लेकिन इसके हटते ही अफगानिस्तान में देखते देखते ही तालिबान लड़ाकों ने सबकुछ फिर अपने कब्जे में ले लिया

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