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बात नेताओं की : उदयभान के हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष बनते ही क्यों याद आने लगे आयाराम-गयाराम

भारतीय राजनीति में आयाराम-गयाराम मुहावरा इस समय क्यों फिर चर्चा में है (ShutterStock)

भारतीय राजनीति में आयाराम-गयाराम मुहावरा इस समय क्यों फिर चर्चा में है (ShutterStock)

हरियाणा में उदयभान सिंह के प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनते ही आयाराम-गयाराम का मुहावरा फिर उछलने लगा है. ये मुहावरा हरियाणा की राजनीति से ही निकला था, जो अब राष्ट्रीय राजनीति में पालाबदल का प्रतीक बन चुका है. आखिर क्यों गयाराम को लोग फिर याद करने लगे हैं. उनका नए हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष उदयभान से क्या रिश्ता है.

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चौधरी उदयभान सिंह को हरियाणा में प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर राज्य में कांग्रेस को चुनावों के लिए मजबूत करने की कमान सौंपी गई है. उदयभान हरियाणा की राजनीति में दलितों का मजबूत चेहरा हैं. उनका परिवार हरियाणा की असरदार पॉलिटिकल फैमिली में शुमार किया जाता है. वो नोडल से कांग्रेस के विधायक हैं.

लेकिन ये बात भी सही है कि भारतीय राजनीति में आयाराम गयाराम जैसा मुहावरा हरियाणा की ही देन है. हालांकि ये मुख्य तौर पर 1967 की एक सियासी घटना के बाद निकला और फिर 1979 में भजनलाल के पालाबदल के बाद और मजबूत हो गया. अब देश में जहां भी नेता पालाबदल करते हैं, तुरंत उन्हें आयाराम-गयाराम के तौर पर देखा जाने लगता है.

हरियाणा से सियासत को देन इस मुहावरे का एक खास कनेक्शन उदयभान से भी है. इसलिए नहीं कि उन्होंने राजनीति में पाला बदला हो बल्कि ये इस मुहावरे के नायक उनके पिता गया लाल थे. कैसे ये मुहावरा उनके साथ जुड़ा या यों मानिए कि इस मुहावरे की उत्पत्ति किस तरह उनके नाम से जुड़ी, इसका रोचक किस्सा है.

उदयभान के दादा चौधरी धर्म सिंह तब हरियाणा की राजनीति में सक्रिय थे जब अंग्रेजों का राज था. तब वो 1928 से 1942 के बीच कई बार नोडल नगरपालिका के चेयरमैन थे. इलाके में उनका जबरदस्त दबदबा था. इसके बाद उनके बेटे गया लाल ने 60 के दशक में सियासी सफर शुरू किया.

किस्सा 1967 से जुड़ा है
दरअसल ये किस्सा 1967 की एक घटना से ही जुड़ा है, जिसने राजनीतिक स्तर तक हलचल पैदा कर दी थी. हरियाणा के नया राज्य बनने के बाद 1967 में राज्य में पहली बार विधानसभा चुनाव हुए. कांग्रेस, जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी चुनाव मैदान में थीं. साथ में बहुत से निर्दलीय भी.

हरियाणा में पहला विधानसभा चुनाव हुआ था
गया लाल नोडल से विधानसभा का चुनाव बतौर निर्दलीय लड़ रहे थे. इलाके में उनकी अच्छी खासी पकड़ थी. वो चुनाव जीत गए. तब हरियाणा विधानसभा में 81 सीटें थीं. उसमें 45 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार जीते. 12 जनसंघ प्रत्याशी और 03 सीटों पर स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार जीतकर विधानसभा में पहुंचे. सबसे खास बात ये थी कि चुनाव में 16 निर्दलीय प्रत्याशी थे.

कांग्रेस की सरकार गिराने की कोशिश शुरू हुई
हालांकि कांग्रेस के पास इतनी सीटें थीं कि उसने पूरे बहुमत के साथ सरकार बनाई. भगवत दयाल शर्मा मुख्यमंत्री बने. ये वही भगवत दयाल थे जो बाद में ओडिशा और मध्य प्रदेश के राज्यपाल भी बने. उन्हें पंडितजी के तौर पर संबोधित किया जाता था. सियासत में वो दमदार नेता थे. बंसीलाल और भजन लाल जैसे नेताओं ने उन्हीं की शागिर्दी में सियासी ककहरा सीखा.

हरियाणा में भगवत दयाल के मुख्यमंत्री बनते ही कांग्रेस के ही एक दिग्गज नेता राव वीरेंद्र सिंह नाराज हो गए. पार्टी छोड़कर उन्होंने संयुक्त मोर्चा बनाया और कांग्रेस के नेताओं को तोड़कर सरकार गिराने के काम में लग गए.

गया लाल ने एक दिन में तीन बार पाला बदला
उन दिनों जब वो कांग्रेस से लेकर निर्दलीय उम्मीदवारों को संयुक्त मोर्चा में शामिल कर रहे थे. तब उन्होंने गया लाल से बात की. गया लाल तुरंत कांग्रेस में शामिल हुए थे. लेकिन राव वीरेंद्र सिंह से मिलने के बाद वो संयुक्त मोर्चा में आ गये. लेकिन कुछ ही घंटे बाद उन्होंने फिर पाला बदला और कांग्रेस में दोबारा जा पहुंचे. लोगों को लगा कि बस अब तो गया लाल कांग्रेस से नहीं आने वाले, लेकिन कुछ ही घंटे में फिर पार्टी बदल ली. वह अब फिर संयुक्त मोर्चा में पहुंच गए. ये काम उन्होंने केवल एक दिन के भीतर किया.

ये हमारे गयाराम जो अब आयाराम हो गए
ये मामला इतना चर्चित हो गया कि राव वीरेंद्र सिंह को गया लाल को मीडिया के सामने पेश करना पड़ा. उन्होंने जब गया लाल को पेश किया तो रोचक अंदाज में कहा, ये हमारे गयाराम थे जो अब आयाराम हो गए हैं. बस इसके बाद तो लोगों ने आयाराम-गयाराम कह-कहकर चटखारे लेने शुरू कर दिए. ये कहकर फब्तियां कसी जाने लगीं. ये बात इतनी लोकप्रिय हो गई कि मुहावरा बन गया.

गया लाल जी कुछ समय बाद फिर चर्चा में आए. बात करीब 40 साल पहले की है, जब 1979 में हरियाणा में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल था. जनता पार्टी से जुड़े चौधरी देवीलाल की हरियाणा में सरकार  थी, लेकिन राजनीतिक संकट था. राज्य सरकार में मंत्री रहे भजनलाल ने देवीलाल की आंखों से सुरमा चुराते हुए न केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी हथिया ली थी, बल्कि पार्टियों और विधायकों की ऐसी उठापटक की थी, जो इतिहास में दर्ज हो गई.

भजनलाल ने तोड़े थे नज़रबंद विधायक
चौधरी देवीलाल को अपनी सरकार संकट में नज़र आ रही थी, इसलिए उन्होंने अपने 40 विधायकों को नज़रबंद कर लिया था और घर को किला बना दिया था. विधायकों को बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी और बंदूक की नोक पर बंद विधायकों से उनके परिवार को मिलने के लिए भी खास इजाज़त लेना होती थी. ऐसे में भजनलाल चूंकि मंत्री थे, तो उनका वहां आना जाना रोका नहीं जा सका. भजनलाल ने कैद विधायकों के परिवारों से खुसर फुसर कर अपने प्रपोज़ल विधायकों तक पहुंचाए.

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भजनलाल सिर्फ 8 साल के राजनीतिक करियर में सीएम बन गए थे.

दो खेमे बन चुके थे, भजनलाल और देवीलाल. बताया जाता है कि उस किले में कैद विधायक रात भर जागते और टहलते रहते थे, यही सोचकर कि किस खेमे में जाएं. आखिर भजनलाल के प्रस्ताव ज़्यादा लालच देने वाले थे. 40 विधायक कुछ ही समय में उनके साथ हो गए. भजनलाल ने देवीलाल की सरकार गिरा दी और खुद सीएम बन बैठे.

घूस के तौर पर घी और ऊंट
भजनलाल के बारे में कहा जाता है कि उनके पास खास कला थी कि वो जल्दी भांप जाते थे कि किसी की ज़रूरत क्या है. देवीलाल की लोकप्रियता के आगे भजनलाल की यही कला बीस साबित हुई थी कि वो लोगों को लालच देना खूब जानते थे. किसी को सरकारी नौकरी, तो किसी को प्लॉट तो किसी को कैश, सबकी ज़रूरत के मुताबिक भजनलाल के पास हर रास्ता था. राजनीति में आने से पहले वो घी बेचने के धंधे से जुड़े थे. उनकी कुशलता इसी से साबित होती है कि वो सिर्फ 8 साल के राजनीतिक करियर में सीएम बन गए थे.

‘बड़े लोगों’ को घूस देने के भजनलाल के तरीके अनोखे थे. कभी उन्होंने मोरारजी देसाई के पास घी के पीपे भिजवाए तो कभी वरुण गांधी के जन्म पर संजय गांधी के पास सोने का पत्तर चढ़ा ऊंट भिजवाया. इसी तरह बनाए संबंधों से भजनलाल ने आगे भी उठापटक जारी रखी.

ऐसे हुआ था ऐतिहासिक दलबदल
भजनलाल जनता पार्टी से जुड़े थे और इमरजेंसी के बाद जब 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी, तो वो देवीलाल सरकार का तख्तापलट कर खुद मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हुए थे. इसके बाद 1980 में केंद्र में तख्तापलट हुआ और फिर इंदिरा गांधी सरकार बनी. भजनलाल ने फौरन समझ लिया कि जनता पार्टी का जहाज़ डूब गया. वह फौरन अपने 40 विधायकों को लेकर कांग्रेस में शामिल हो गए थे. देश ने पहली बार इतना बड़ा दलबदल देखा था.

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देवीलाल लोकप्रियता और भाषण कला में भजनलाल से आगे माने जाते थे.

इस दलबदल के बाद भी हरियाणा में राजनीतिक अस्थिरता जारी रही और 90 के दशक के अंत तक यही चलता रहा कि कभी देवीलाल की सरकार बनती, कभी भजनलाल की. दूसरे नेताओं और मीडिया ने बाद में इसे दोनों लालों के बीच पॉलिटिकल फिक्सिंग भी करार दिया गया.

‘आया राम गया राम’ कहावत ऐसे चली
जब पहली बार भजनलाल ने हरियाणा में तख्तापलट किया था, उस दौरान एक विधायक थे गया लाल, जो भजनलाल खेमे के करीबी माने जाते रहे. तब आरोप लगे थे कि कई विधायकों, जजों और सरकारी अधिकारियों को दिल्ली, चंडीगढ़ और पंचकूला में प्लॉट बांटे जाने के आरोप लग रहे थे. गया लाल को भी दो प्लॉट दिए जाने के आरोप थे. ये वही गया लाल थे, जिन्होंने 1967 में राजनीतिक उठापटक के दौरान एक दिन में तीन बार पार्टी बदल ली थी.

इस विधायक के दलबदल के चलते ये कहावत राजनीतिक गलियारों में फिर जोरशोर से गूंजने लगी. भजनलाल के कारनामे चर्चित होने लगे थे.


Tags: Congress, Haryana news, Haryana politics

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