होम /न्यूज /नॉलेज /तब इतने दुखी थे अंबेडकर कि भगवा धारण कर साधु की तरह रहने लगे

तब इतने दुखी थे अंबेडकर कि भगवा धारण कर साधु की तरह रहने लगे

डॉ. भीमराव अंबेडकर (फाइल फोटो)

डॉ. भीमराव अंबेडकर (फाइल फोटो)

डॉ. भीमराव अंबेडकर का शुरुआती जीवन शादी के बाद अभावों और कष्टों वाला था. उनकी कई संतानें अस्वस्थ होकर मर गईं. इसके बाद ...अधिक पढ़ें

    डॉ. भीमराव अंबेडकर की पहली पत्नी रमाबाई का आज जन्मदिन है. उनका जन्म 07 फरवरी 1898 में हुआ था. उन्होंने बहुत संघर्ष के समय में अंबेडकर का साथ दिया. उस समय वो दिन अंबेडकर के लिए कई तरह से मुश्किलों से भरे हुए थे. बाद में वो बीमारियों का शिकार हो गईं. जब उनकी 37 साल की उम्र में मृत्यु हुई तो अंबेडकर इतने दुखी हो गए कि साधुओं की तरह लगे.

    रमाबाई को माता रमाबाई, माता रमाई और ‘रमाताई’ के नाम से भी जाना जाता है. जब भीमराव अंबेडकर 14 वर्ष के थे, तभी रमाबाई का विवाह उनसे हो गया था. वह कर्तव्यपरायण, स्वाभिमानी, गंभीर और बुद्धिजीवी महिला थीं, जिन्होंने आर्थिक कठिनाइयों का सामना सुनियोजित तरीके से किया. कम साधनों और पैसे में घर-गृहस्थी को चलाया.

    रमाबाई का घर चलाने और जिम्मेदारियां पूरी करने में पति की मदद करती थीं. चूंकि भीमराव ने विदेश में तालिम लेने जाने की योजना बना रखी थी, लिहाजा कुछ पैसा हमेशा इसके लिए बचाया जाता था. वह परेल, मुंबई में इम्प्रूवमेन्ट ट्रस्ट की चाल में एक मजदूर मौहल्ले में दो कमरों में के घर में रहते थे. वह वेतन का एक निश्चित भाग घर के खर्चे के लिए पत्नी को देते थे.

    तब रमाबाई ने कठिनाइयों और संकट का बखूबी सामना किया. तब रमाबाई अपने परिवार के अतिरिक्त जेठ के परिवार की भी देखभाल किया करती थीं. भीमराव अंबेडकर घर से बाहर रहते थे.

    धार्मिक प्रवृत्ति की थीं
    हालांकि रमाबाई की धार्मिक प्रवृत्ति से वह असहमत भी रहते थे. उन्हें पंढरपुर जाने की बहुत इच्छा रही. महाराष्ट्र के पंढरपुर में विठ्ठल-रुक्मणी का प्रसिद्ध मंदिर है, किंतु तब हिन्दू मंदिरों में अछूतों के प्रवेश की मनाही थी. तब अंबेडकर रमाबाई को समझाते थे कि ऐसे मन्दिरों में जाने से उनका उद्धार नहीं हो सकता, जहां उन्हें अन्दर जाने की मनाही हो. कभी-कभी रमाबाई धार्मिक रीतियों को संपन्न करने पर हठ कर बैठती थीं.

    पति की कोशिश से लिखना पढ़ना सीखा
    जब भीमराव अंबेडकर उच्च शिक्षा हेतु अमेरिका गए तो रमाबाई गर्भवती थीं. किंतु ये पुत्र जन्म देने के बाद चल बसा. वह इसका ख्याल रखती थीं कि डॉ. अंबेडकर के कामों में कोई बाधा नहीं पहुंचे. उनकी पढ़ाई खराब न हो. वह पति की कोशिश के चलते कुछ पढ़ना लिखना भी सीख गईं.

    बच्चों के निधन ने भी उन्हें आघात पहुंचाया
    बच्चों के जन्म रमाबाई का स्वास्थ्य खराब रहने लगा. बच्चों का भी स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था. जब एक बेटे की मृत्यु हुई तो अंबेडकर बहुत दुखी भी हुए. उन्होंने अपने एक दोस्त को पत्र लिखा,
    “हम चार सुन्दर रूपवान और शुभ बच्चे दफन कर चुके हैं. इनमें से तीन पुत्र थे और एक पुत्री. यदि वे जीवित रहते तो भविष्य उनका होता. उनकी मृत्यु का विचार करके हृदय बैठ जाता है. हम बस अब जीवन ही गुजार रहे हैं. जिस प्रकार सिर से बादल निकल जाता है, उसी प्रकार हमारे दिन झटपट बीतते जा रहे हैं. बच्चों के निधन से हमारे जीवन का आनंद ही जाता रहा और जिस प्रकार बाइबल में लिखा है, “तुम धरती का आनंद हो. यदि वह धरती को त्याग जाये तो फिर धरती आनंदपूर्ण कैसे रहेगी?” मैं अपने जीवन में खालीपन बार-बार अनुभव करता हूं. पुत्र की मृत्यु से जीवन बस ऐसे ही रह गया है, जैसे तृणकांटों से भरा हुआ कोई उपवन. बस अब मेरा मन इतना भर आया है कि और अधिक नहीं लिख सकता.”

    पत्नी को किताब समर्पित की
    दिसम्बर, 1940 में भीमराव आम्बेडकर ने जो पुस्तक “थॉट्स ऑफ़ पाकिस्तान” लिखी, वह उन्होंने अपनी पत्नी को भेंट की. भेंट के शब्द इस प्रकार थे-
    मैं यह पुस्तक रमो को उसके मन की सात्विकता, मानसिक सदवृत्ति, सदाचार की पवित्रता और मेरे साथ दुःख झेलने में, अभाव व परेशानी के दिनों में जब कि हमारा कोई सहायक न था, अतीव सहनशीलता और सहमति दिखाने की प्रशंसा स्वरूप भेंट करता हूं.
    इन शब्दों से जाहिर है कि रमाबाई ने भीमराव अंबेडकर का किस प्रकार संकटों के दिनों में साथ दिया. डॉ. अंबेडकर के मन में उनके लिए कितना आदर-सत्कार और प्रेम था.

    पत्नी के निधन पर साधु बनने की सोचने लगे थे
    27 मई, 1935 को तो बीमारी के बाद उनकी पत्नी का निधन हो गया. 10,000 से ज्यादा लोगों ने अंतिम यात्रा में हिस्सा लिया. से अधिक लोग रमाबाई की अर्थी पत्नी ने निधन ने वाकई डॉ. अंबेडकर को तोड़ दिया. उन्हें रमाबाई के निधन का इतना धक्का पहुंचा कि बाल मुंडवा लिये. भगवा वस्त्र धारण कर लिये. गृह त्याग के लिए साधुओं का सा व्यवहार अपनाने लगे. वह बहुत उदास, दुःखी और परेशान रहते थे.

    Tags: Ambedkar, Dr. Bhim Rao Ambedkar

    टॉप स्टोरीज
    अधिक पढ़ें