क्या और कितनी तरह के होते हैं गोत्र, जातियों से इनका कैसा रिश्ता

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फाइल फोटो)

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फाइल फोटो)

पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपना गोत्र शांडिल्य क्या बता दिया, उसी पर नया विवाद छिड़ गया है. हालांकि इससे इतर ये जरूर जानिए कि भारतीय प्राचीन पद्धति में गोत्र परंपरा कैसे शुरू हुई और जातियों से उनका क्या रिश्ता रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 31, 2021, 11:36 AM IST
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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के दौरान तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने अपना गोत्र क्या बता दिया, पूरे चुनाव परिदृश्य में एक नया मुद्दा ही उछल गया.  बीजेपी अगर ममता द्वारा अपना गोत्र शांडिल्य बताने को चुनावी कार्ड से जोड़कर देख रही है और इसके लिए उनकी आलोचना कर रही है तो ममता ने भी इसके जरिए चुनावों में अक्सर खेली जाने वाली जातिवादी राजनीति में अपना एक खास संदेश तो दे ही दिया है. हालांकि ममता द्वारा गोत्र बताए जाने के बाद ये कौतुहल और सवाल भी लोगों के मन में पैदा हो रहा है कि गोत्र क्या होते हैं और उनकी शुरुआत कैसे हुई. उनका हमारी जाति व्यवस्था से क्या रिश्ता है.

भारत में गोत्र पद्धति के जरिए आपके वंश का पता चलता है. ये बहुत प्राचीन भारतीय पद्धति है. इससे मूलपिता और मूल परिवार, जिससे आप ताल्लुक रखते हैं, उसका पता चलता है. हमारे देश में चार वर्ण माने जाते हैं- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - इनकी जातियों में गोत्र समान रूप से पाए जाते हैं. ये ऐतिहासिक वंश-परपरा का सबसे पुष्ट प्रमाण है, जो बताते हैं कि चाहे हम किसी भी जाति या वर्ण में हों लेकिन प्राचीन काल में एक पिता के वंश से ताल्लुक रखते थे.

वैसे गोत्र का अर्थ, गौ, गोरक्षा और गोरक्षक से भी संबंध रखता है. शायद जब इसकी शुरुआत हुई होगी तो सभी वो ऋषि, जिनके लिए गाय का विशेष महत्व रहा होगा और जो उनकी रक्षा करते रहे होंगे, उनके गोत्र से जोड़कर अलग खास पहचान देने की कोशिश कई गई होगी.

गोत्र और वर्ण अलग क्यों है
गोत्र पहले आया फिर कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था तय हुई. वर्णव्यवस्था में जिसने गुण-कर्म-योग्यता के आधार पर जिस वर्ण का चयन किया, वे उस वर्ण के कहलाने लगे. बाद में विभिन्न कारणों के आधार पर उनका ऊंचा-नीचा वर्ण बदलता रहा. किसी क्षेत्र में किसी गोत्र-विशेष का व्यक्ति ब्राह्मण वर्ण में रह गया, तो कहीं क्षत्रिय, तो कहीं शूद्र कहलाया.बाद में जन्म के आधार पर जाति स्थिर हो गयी.

क्यों सभी जातियों और वर्णों में हैं एक जैसे गोत्र 

यही वजह है कि सभी गोत्र सभी जातियों और वर्णों में हैं. कौशिक ब्राह्मण भी हैं, क्षत्रिय भी. कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण भी हैं, राजपूत भी, पिछड़ी जाति वाले भी. वशिष्‍ठ ब्राह्मण भी हैं, दलित भी. दलितों में राजपूतों और जाटों के अनेक गोत्र हैं. सिंहल-गोत्रीय क्षत्रिय भी हैं, बनिए भी. राणा, तंवर, गहलोत-गोत्रीय जाट हैं, राजपूत भी. राठी-गोत्रीय जन जाट भी हैं, बनिये भी.



गोत्र का इस्तेमाल किन कामों में होता है

गोत्र का इस्तेमाल आमतौर पर पर विवाह संबंधों और धार्मिक कार्यों में होता है. माना जाता है कि एक ही गोत्र में विवाह नहीं किया जाना चाहिए. क्योंकि मान्यतानुसार इसके सारे सदस्य एक ही मिथकीय पूर्वज की संतान होते हैं. हालांकि मौजूदा दौर में ये शर्त औऱ परंपरा शिथिल हुई है लेकिन कई जातियां अब भी इसका कड़ाई से पालन करती हैं. गोत्र को एक तरह से रक्त संबंध भी माना जाता है.



कैसे शुरू हुआ गोत्र

गोत्र मूल रूप से ब्राह्मणों के उन सात वंशों से संबंधित होता है, जो अपनी उत्पत्ति सात ऋषियों से मानते हैं। ये सात ऋषि थे- 1.अत्रि, 2. भारद्वाज, 3. भृगु, 4. गौतम, 5.कश्यप, 6. वशिष्ठ, 7.विश्वामित्र.

बाद में इसमें एक आठवां गोत्र अगस्त्य भी जोड़ा गया और गोत्रों की संख्या बढ़ती चली गई. जैन ग्रंथों में 7 गोत्रों का उल्लेख है- कश्यप, गौतम, वत्स्य, कुत्स, कौशिक, मंडव्य और वशिष्ठ. लेकिन छोटे स्तर पर साधुओं से जोड़कर हमारे देश में कुल 115 गोत्र पाए जाते हैं.

शुरुआत में सात ऋषियों के आधार पर सात गोत्र बने. फिर इसमें एक गोत्र और जुड़ा


क्या सारे गोत्र एक ही समय पैदा हुए

एक समय और एक स्‍थान पर गोत्रों की उत्‍पत्ति नहीं हुई है. महाभारत के शान्‍तिपर्व (296-17, 18) में वर्णन है कि मूल चार गोत्र थे- अंग्रिश, कश्‍यप, वशिष्‍ठ तथा भृगु. बाद में आठ हो गए जब जमदन्गि, अत्रि, विश्‍वामित्र तथा अगस्‍त्‍य के नाम जुड़ गए. गोत्रों की प्रमुखता उस समय और बढ़ गई जब जाति व्‍यवस्‍था कठोर हो गई. लोगों को यह विश्‍वास हो गया कि सभी ऋषि ब्राह्मण थे.

गोत्रों में वैवाहिक स्थिति

एक ही गोत्र के सदस्यों के बीच विवाह निषेध का उद्देश्य निहित दोषों को दूर रखने के अलावा ये भी था कि अन्य प्रभावशाली गोत्रों के साथ संबंध स्थापित कर अपना प्रभाव बढ़ा सकें.

बाद में ग़ैर ब्राह्मण समुदायों ने भी इसी प्रथा को अपनाया. बाद में क्षत्रियों और वैश्यों ने भी इसे अपनाया. इसके लिए उन्होंने अपने निकट के ब्राह्मणों या अपने गुरुओं के गोत्रों को अपना गोत्र बना लिया.

विवाह में आमतौर पर गोत्र को किस तरह देखा जाता है

एक लड़का-लड़की की शादी के लिए सिर्फ विवाह के लायक लड़के-लड़की का गोत्र ही नहीं मिलाया जाता, बल्कि मां और दादी का भी गोत्र मिलाते हैं. इसका अर्थ है कि तीन पीढ़ियों में कोई भी गोत्र समान नहीं होना चाहिए तभी शादी तय की जाती है.

यदि गोत्र समान हैं तो विवाह न करने की सलाह दी जाती है. हिन्दू शास्त्रों में एक गोत्र में विवाह करने पर प्रतिबंध इसलिए लगाया गया क्योंकि यह मान्यता है कि एक ही गोत्र या कुल में विवाह होने पर दंपत्ति की संतान अनुवांशिक दोष के साथ उत्पन्न होती है. ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता.



क्या गोत्र हमेशा एक ही रहता है

मनुस्मृति के अनुसार, सात पीढ़ी बाद सगापन खत्म हो जाता है अर्थात सात पीढ़ी बाद गोत्र का मान बदल जाता है. आठवी पीढ़ी के पुरुष के नाम से नया गोत्र शुरू होता है. लेकिन गोत्र की सही गणना का पता न होने के कारण हिंदू लोग लाखों हजारो वर्ष पहले पैदा हुए पूर्वजों के नाम से अपना गोत्र चला रहे हैं, जिससे वैवाहिक जटिलताएं भी पैदा हो रही हैं.

राहुल गांधी के गोत्र को लेकर भी कुछ समय हुई थी चर्चा

कुछ साल पहले राहुल गांधी ने जब पुष्कर में पूजा के दौरान अपना गोत्र दत्तात्रेय बताया, तब उनके गोत्र को लेकर काफी चर्चाएं शुरू हो गईं थीं. नेहरू-गांधी परिवार का लंबा इतिहास राजस्थान के पुष्कर के बीचों-बीच बनी झील के किनारे से भी जुड़ा है. साल 1921 यानी क़रीब 100 साल पहले मोतीलाल नेहरू पुष्कर आए थे. उस वक़्त पुरोहितों के एक पराशर परिवार ने उनके लिए यहां के मशहूर ब्रह्मा मंदिर में पूजा की थी.

राहुल गांधी ने जब वर्ष 2018 के आसपास पुष्कर में पूजा के दौरान अपना गोत्र बताया था, तब भी बीजेपी ने इस पर सवाल खड़ा किया था. (File Photo)


तब कांग्रेस के कुछ लोगों का कहना था कि राहुल और उनका परिवार हमेशा से ख़ुद को कश्मीरी ब्राह्मण बताता रहा है. मोतीलाल-जवाहरलाल नेहरू भी यही थे. पुष्कर में मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल, इंदिरा गांधी सब बतौर कश्मीरी बनकर ही पहुंचे.

अगर दत्तक हो तो गोत्र बदल सकता है

प्रयागराज के धार्मिक विद्वान राम नरेश त्रिपाठी कहते हैं कि अगर हिंदू परंपरा और मान्यताओं के अनुसार पिता का गोत्र ही पुत्र को मिलता है. वही उसका गोत्र माना जाता है. इसकी मातृ परंपरा नहीं रही है. हां, अगर किसी ने किसी को दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार किया हो तो उसे उसका गोत्र मिल जाता है.

अगर जवाहरलाल नेहरू ने राजीव गांधी को एडाप्ट किया होता, तो राहुल बेशक हिंदू धर्म के गोत्र का दावा कर सकते थे लेकिन मान्यताओं के अनुसार ये उचित नहीं है. हालांकि बहुत से विद्वान शास्त्रों के अनुसार ये तर्क भी दे रहे हैं कि सिर्फ पुत्री संतान होने पर दौहित्र का गोत्र नाना के समान हो जाता है.
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