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Birthday Rajendra Prasad : राजेंद्र प्रसाद के बाद परिवार का क्या हुआ. क्या बेटे भी राजनीति में आए

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद (फाइल फोटो)
डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद (फाइल फोटो)

देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद (Rajendra Prasad) के निधन के बाद उनके परिवार और बेटों का क्या हुआ. क्या वो पिता की तरह राजनीति में आए या अलग पेशा चुना. क्या है अब परिवार की हालत क्या है

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 3, 2020, 2:25 PM IST
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डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति थे. आज उनका जन्मदिन है. वो 03 दिसंबर 1884 के दिन बंगाल प्रेसीडेंसी में जरादेई में पैदा हुए थे, जो अब बिहार में है. राजेंद्र प्रसाद ने कई मिसालें देश के सामने रखी थीं. राजेंद्र प्रसाद जब तक पद पर रहे, तब तक उन्होंने कोशिश की कि उनका परिवार साधारण जिंदगी ही जिए. अपने पद का फायदा उन्होंने शायद ही कभी अपने परिवार को लेने दिया.

ये उत्सुकता बहुत से लोगों को हो सकती है कि कांग्रेस के इस दिग्गज नेता के परिवार का उनके बाद क्या हुआ. उनके परिवार में कितने लोग थे. वो उनके निधन के बाद किस हाल में रहे. क्या उनके परिवार के लोगों ने भी सियासत की ओर रुख किया. कोई चुनाव लड़ा.

राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति रहते हुए कभी धन नहीं जोड़ा. उन्हें राष्ट्रपति के रूप में जितना वेतन मिलता था, उसका आधा वो राष्ट्रीय कोष में दान कर देते थे.



कितने बेटे थे
राजेंद्र प्रसाद के तीन बेटे थे. आजादी की लड़ाई में उतरने से वो बिहार के शीर्ष वकीलों में थे. पटना में बड़ा घर था. नौकर चाकर थे. उस जमाने में उनकी फीस भी कम नहीं थी. गांधीजी के अनुरोध पर वो आजादी की लड़ाई में कूदे. फिर ताजिंदगी साधारण तरीके से जीते रहे.

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हमेशा सादगी से रहे
राष्ट्रपति भवन में जाने के बाद भी उन्होंने वहां हमेशा सादगी को सर्वोपरी रखा. वह पहले राष्ट्रपति थे, जो जमीन पर आसन बिछाकर भोजन करते थे. उन्होंने राष्ट्रपति भवन में अंग्रेजी तौर-तरीकों को अपनाने से इनकार कर दिया था. वो लंबे चौड़े राष्ट्रपति भवन में अपने लिए महज दो-तीन कमरों का इस्तेमाल करते थे.

उनके बड़े बेटे
डॉ. प्रसाद के परिवार से कोई भी कभी बहुत ज्यादा सक्रिय राजनीति में नहीं रहा. डॉ. प्रसाद तीन बेटे थे. बड़े बेटे मृत्युंजय प्रसाद ने पटना स्थित जीवन बीमा निगम से संभागीय प्रबंधक के रूप में अवकाश प्राप्त किया.

पिता के निधन के बाद ना तो कभी कांग्रेस ने उन्हें राजनीति में लाने का प्रयास किया और ना ही उन्होंने इसके लिए कोई दिलचस्पी दिखाई. अलबत्ता वो एक बार चुनाव जरूर लड़े. ये समय आपातकाल के बाद का था.

1977 में आपातकाल के बाद घोषित चुनाव में अवश्य वो जनता पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़े. वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे. जयप्रकाश नारायण के अनुरोध पर चुनाव में खड़े हुए. जीते भी लेकिन इसके बाद फिर कभी सियासत में सक्रिय नहीं रहे.

बाकी दो बेटे कहां रहे
दूसरे एवं तीसरे बेटे धनंजय प्रसाद व जनार्दन प्रसाद छपरा में लाइमलाइट से दूर लगभग साधारण जिंदगी जीते रहे. उनके पास थोड़ी-बहुत खेती बाड़ी थी. एक स्थानीय बस परमिट था. इसी से आजीविका चलती थी.

राजेंद्र प्रसाद के परिवार तथा किसी भी रिश्तेदार ने उनके पद का लाभ नहीं उठाया. वह खुद नहीं चाहते थे कि उनका कोई नजदीकी रिश्तेदार राष्ट्रपति पद की गरिमा पर कोई आंच आने दे.



डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की दो पोतियां झारखंड में रहती हैं. एक पोती जमशेदपुर और दूसरी रांची में रहती हैं. एक अन्य पोती पटना में रहती हैं. वो सभी आमतौर पर प्रचार से दूर रहती हैं.

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आखिरी दिन
उनके आखिरी दिन जिस तरह से बीते वो भी दुखद है. वह पटना के सदाकत आश्रम में रहते थे. वहां ढंग से इलाज की व्यवस्था भी नहीं थी. एक राष्ट्रपति की आखिरी दिनों में ये हालत होगी, सोचा भी नहीं जा सकता. उन्होंने अपना सबकुछ तकरीबन देश को दे दिया था.

अगर वह चाहते तो एक वकील के रूप में खासा कमा सकते थे. वह वर्ष 1910 के आसपास पटना के जाने माने वकील बन चुके थे. अपनी सत्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता और वकालत के अपने अकूत ज्ञान के लिए विख्यात थे. 28 फरवरी 1963 के दिन पटना में जब राजेंद्र बाबू का निधन हुआ तो उनकी उम्र 78 वर्ष थी. इसके कुछ समय बाद ही उनकी पत्नी राजवंशी देवी की मृत्यु इससे कुछ समय पहले ही 1962 में हो गई थी.
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