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अन्न की पैदावार बढ़ाने के खेत हुए हाई-टेक, ड्रोन्स का भी हो रहा इस्तेमाल

नागर विमानन मंत्रालय के संयुक्त सचिव अंबर दुबे ने बताया, 'हमारे देश में ‘ड्रोन इकोसिस्टम’ का तेजी से विस्तार हो रहा है. कृषि, खनन, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन से लेकर खेल और मनोरंजन क्षेत्र में इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है.'(pixabay)

नागर विमानन मंत्रालय के संयुक्त सचिव अंबर दुबे ने बताया, 'हमारे देश में ‘ड्रोन इकोसिस्टम’ का तेजी से विस्तार हो रहा है. कृषि, खनन, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन से लेकर खेल और मनोरंजन क्षेत्र में इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है.'(pixabay)

चालू वित्त वर्ष के लिए सरकार ने लगभग 30.1 करोड़ टन अनाज की पैदावार का लक्ष्य रखा है. इतना बड़ा टारगेट तय करने में थोड़ा हाथ खेती में काम आ रही तकनीकों का भी है.

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    एक समय था, जब भारत अनाज के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भर था. हरित क्रांति के बाद हालात तेजी से बदले. आज देश की तुलना दुनिया के बड़े अन्न उत्पादक देशों से हो रही है. इसमें काफी हद तक हाई टेक मशीनों का भी योगदान है. बता दें कि खेतों में उन्नत पैदावार के लिए अब किसान ड्रोन्स से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का भी इस्तेमाल कर रहे हैं.

    बढ़ाया गया उत्पादन का टारगेट 
    साल 2020 में कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था चरमराई तो लेकिन इस दौरान कृषि के क्षेत्र में कई फायदे दिखे. बेहतर मानसून के कारण सरकार ने फसल वर्ष 2020-21 (जुलाई-जून) के दौरान 30.1 करोड़ टन अनाज की पैदावार का लक्ष्य रखा. ये काफी बड़ा टारगेट है, जो पिछले साल के उत्पादन से करीब 1.5 प्रतिशत ज्यादा है.

    अनाज की पैदावार के लिए लक्ष्य बढ़ाने का फैसला यूं ही नहीं लिया गया, बल्कि इसके पीछे एक कारण उन्नत तकनीक भी है. अब किसान पूरी तरह से पारंपरिक तरीकों पर निर्भर नहीं रहे, बल्कि वे तकनीक के मेल से पैदावार बढ़ा रहे हैं.

    आज देश की तुलना दुनिया के बड़े अन्न उत्पादक देशों से हो रही है- सांकेतिक फोटो

    इसमें पहला जिक्र आता है मोबाइल एप्लिकेशन का
    जैसे पंजाब की ही बात करें तो वहां की सरकार ने पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर (PRSC) तैयार किया है. ये मोबाइल फोन के जरिए किसानों को मिट्टी की उर्वरता से लेकर हवा की गुणवत्ता तक के बारे में बताता है ताकि किसान उसके मुताबिक फैसला ले सकें. इसके तहत तीन एप्लिकेशन हैं, I-खेत मशीन, e-पहल और e-प्रिवेंट.

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    खेती में अब ड्रोन्स का उपयोग भी आम हो चुका है. ये केवल यहीं तक सीमित नहीं कि ड्रोन्स खेतों पर उड़ते हुए फसल की निगरानी करें या डाटा जमा करें. ड्रोन्स का काम इससे काफी आगे निकल चुका है. वो अलग-अलग श्रेणियों के तहत डाटा जमा करते हैं ताकि स्मार्ट खेती हो सके.

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    ड्रोन के मामले में आंध्रप्रदेश आगे
    सही सेंसर इस्तेमाल करने से किसानों को रियल-टाइम डाटा मिल पाता है कि फसल कैसी तैयार हो रही है, कहां पर किसी तरह की खरपतवार पैदा हो रही है और कहां मिट्टी का उपजाऊपन घट रहा है. इससे किसानों को समझने में मदद होती है कि खेत के किस एरिया में बेहतर सिंचाई या गुड़ाई की जरूरत है. इसके अलावा ड्रोन के जरिए पानी का या खाद का छिड़काव भी किया जाता है. देश में आंध्रप्रदेश ड्रोन के उपयोग में काफी आगे निकल चुका है, वहां मकई की खेती में इसका जमकर उपयोग हो रहा है.

    देश में आंध्रप्रदेश ड्रोन के उपयोग में काफी आगे निकल चुका है-सांकेतिक फोटो (pixabay)

    एक और तरीका है, जिसे बिग डाटा एनालिटिक्स कहते हैं
    पहले जमीन का रिकॉर्ड रखने का काम भारी मेहनत मांगता था और मैनुअल होने के कारण इसमें गड़बड़ूी का डर भी बना रहता था. अब बिग डाटा की मदद से विशाल डाटा को एक जगह जमा करके रखा जाता है. इससे तुलना में मदद मिलती है.

    इसके अलावा एनालिटिक्स से रियल टाइम डाटा भी मिलता है. साथ ही किसानों को तुरंत ही ये पता चलता है कि वे खेती में जो तकनीक अपना रहे हैं, वो कितनी कारगर है. इसके लिए दूसरी खेती से तुलना भी होती है और उनकी तकनीकों का भी ब्यौरा रहता है. इससे भविष्य में खेती के लिए तय करने में किसान को मदद होती है. मौसम में बदलाव के बारे में भी किसान इससे जानकारी ले पाते हैं. इससे होता ये है कि वे समय पर खेती के बचाव के निर्णय ले पाते हैं. या फिर वक्त रहते खेती की किस्म बदल पाते हैं.

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    सिंचाई की तकनीकें भी उन्नत
    इसके अलावा सिंचाई तकनीकों में भी काफी बदलाव हुए हैं. अब किसान टपक सिंचाई और सूक्ष्म बूंद सिंचाई जैसी तकनीक को अपना रहे हैं. सिंचाई की इन तकनीकों से पैदावार में बढ़ोत्तरी, पानी का सही मात्रा में उपयोग और पौधों को संतुलित रूप से पोषक तत्वों की पूर्ति करने जैसे लाभ हो रहे हैं. फिलहाल भारत में यह इंडस्ट्री लगभग 4 बिलियन डॉलर का कारोबार कर रही है. साल 2022 तक इसके बढ़कर 6.54 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है.

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