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प्रदूषण का खतरनाक असर, इतने साल कम हो गई लोगों की उम्र

इस प्रदूषण के वजह से शुरुआत में तो सिर्फ खांसी होती है लेकिन आगे चलकर यह एक गंभीर बीमारी बन सकती है.

इस प्रदूषण के वजह से शुरुआत में तो सिर्फ खांसी होती है लेकिन आगे चलकर यह एक गंभीर बीमारी बन सकती है.

बढ़ते प्रदूषण (pollution) की वजह से औसत उम्र (average age) में कमी दर्ज की जा रही है. एक स्टडी से पता चला है कि गंगा के किनारे वाले इलाकों में लोगों की औसत उम्र 7 साल तक कम हो गई है...

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    दिल्ली-एनसीआर (Delhi NCR) का प्रदूषण (Pollution) की वजह से बुरा हाल है. प्रदूषण का स्तर लगातार खतरनाक बना हुआ है. हर तरफ स्मॉग (smog) की चादर बिछी नजर आ रही है. ये प्रदूषण कितना खतरनाक है, इसका पता हाल की एक स्टडी से चलता है.

    एक स्टडी में पाया गया है कि प्रदूषण की वजह से उत्तर और पूर्वी (North and Eastern) भारत के लोगों की उम्र (age) 7 साल तक कम हो गई है. बढ़ते पॉल्यूशन की वजह से इन इलाकों के लोग 7 साल कम जिंदा रह पाएंगे. ये 1998 से लेकर 2016 के बीच बढ़ते प्रदूषण की वजह से होगा.

    यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट ने इन इलाकों में प्रदूषण के बढ़ते स्तर को देखते हुए लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर की एनालिसिस की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इन इलाकों में प्रदूषण की वजह से यहां के लोगों की जिंदगी 7 साल कम हो गई है.

    1998 से लेकर 2016 के बीच 72 फीसदी बढ़ा प्रदूषण

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन के मुताबिक अगर प्रदूषण को बढ़ाने वाले पार्टिकुलेट मैटर 10 क्यूबिक मीटर हर साल कम होते हैं तो लोग ज्यादा वक्त तक जिंदा रहेंगे. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है. खासकर गंगा के किनारे लगते मैदानी इलाकों में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है. 1998 से लेकर 2016 के बीच उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में प्रदूषण 72 फीसदी बढ़ा है.

    विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रदूषण के स्तर को दर्शाने के लिए पार्टिकुलेट मैटर (pm 2.5) की मात्रा तय की है. इसमें पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक में भारी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है. बंगाल में ये 49 क्यूबिक मीटर से लेकर दिल्ली में 114 क्यूबिक मीटर तक है.

    air pollution will Kill People in affected area up to 7 years earlier
    प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है


    पीएम 2.5 के बढ़ते स्तर की वजह से खतरनाक हुआ प्रदूषण

    रिपोर्ट में बताया गया है कि 1998 में हवा में PM 2.5 के बढ़ते स्तर की वजह से गंगा के मैदानी इलाके में रहने वाले लोगों की उम्र 3.7 साल तक कम हो गई थी. साल दर साल PM 2.5 में होती बढ़ोत्तरी की वजह से लोगों की जिंदगी अब 7.1 साल तक कम हो गई है. स्टडी में प्रदूषण की वजह से लोगों की कम होते उम्र का निर्धारण विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिए गाइडलाइंस के मुताबिक किया गया है.

    पीएम 2.5 वायु प्रदूषण फैलाने वाला सबसे खतरनाक कण होता है. इन कणों को नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता है. हवा में इसके घुले होने की वजह से सांस लेते ही ये हमारे शरीर में चला जाता है. इसकी वजह से हार्ट अटैक और फेफड़ों की बीमारी से लेकर सांस की दूसरी बीमारियां होती हैं. इसकी वजह से प्रदूषित इलाकों में रहने वाले लोगों की उम्रसीमा पर असर पड़ता है.

    कम प्रदूषण वाली जगहों पर औसत उम्र ज्यादा

    इसको ज्यादा अच्छे तरीके से इस तरह से समझा जा सकता है कि 1998 में पीएम 2.5 का स्तर इतना अधिक था कि इससे प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों की औसत उम्र 3.7 साल तक कम हो गई. उसी तरह से 2016 में पीएम 2.5 का स्तर इन इलाकों में इतना अधिक था कि लोगों की औसत उम्र 7.1 साल तक कम हो गई.

    air pollution will Kill People in affected area up to 7 years earlier
    प्रदूषण की वजह से औसत उम्र 7 साल तक कम हुई है


    स्टडी में बताया गया है कि देश के बाकी इलाकों में, जहां प्रदूषण का स्तर अधिक नहीं था, वहां के लोग गंगा के मैदानी इलाकों की तुलना में लंबी जिंदगी जिएंगे. 1998 में जिस स्तर का प्रदूषण गंगा के किनारे वाले इलाकों में था, वैसा स्तर अगर लाइफ टाइम भी बना रहता है तो औसत उम्र 1.2 साल तक कम हो जाती है.

    प्रदूषण का स्तर सुधरा तो बढ़ सकती है औसत उम्र

    हालांकि हालात इतने भी बुरे नहीं है. अगर प्रदूषण के स्तर को सुधारा जाए तो लोगों की औसत उम्र बढ़ भी सकती है. केंद्र सरकार प्रदूषण से निपटने के लिए नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) चला रही है. इसका मकसद अगले 5 वर्षों में प्रदूषण को कम से कम 20 से 30 फीसदी तक कम करना है. अगर सरकार ऐसा करने में कामयाब हो जाती है तो लोगों की औसत उम्र कम से कम 1.3 साल तक बढ़ जाएगी. इसी तरह से गंगा के मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों की औसत उम्र 2 साल तक बढ़ जाएगी.

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