लाइव टीवी

अजित पवार: 37 साल का राजनीतिक करियर, को-ऑपरेटिव चुनाव से शुरू किया था सफर

News18Hindi
Updated: December 30, 2019, 7:20 PM IST
अजित पवार: 37 साल का राजनीतिक करियर, को-ऑपरेटिव चुनाव से शुरू किया था सफर
अजित पवार ने उद्धव सरकार में डिप्टी सीएम पद की शपथ ली है.

शरद पवार (Sharad Pawar) के बड़े भाई के बेटे अजित पवार के राजनीतिक जीवन की शुरुआत वर्ष 1982 में को-ऑपरेटिव चुनाव से हुई थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 30, 2019, 7:20 PM IST
  • Share this:
अजित पवार (Ajit Pawar) ने सोमवार को उद्धव सरकार (Uddhav Thackeray Government) में डिप्टी सीएम पद की शपथ ली. इससे पहले उन्होंने देवेंद्र फडणवीस के साथ डिप्टी सीएम पद की शपथ लेकर राज्य की राजनीति में तलहका मचा दिया था. लंबी उठा-पटक के बाद उनकी घरवापसी हो गई थी. अब वो उद्धव सरकार में अपनी भूमिका निभाएंगे.

1982 में हुई थी राजनीतिक जीवन की शुरुआत
शरद पवार के बड़े भाई के बेटे अजित पवार के राजनीतिक जीवन की शुरुआत वर्ष 1982 में को-ऑपरेटिव चुनाव से हुई थी. महाराष्ट्र की राजनीति में को-ऑपरेटिव पर वर्चस्व को सीधे सफलता की सीढ़ी से जोड़कर देखा जाता है. साल 1982 के बाद बड़ा मोड़ तब आया है, जब 1991 में अजित पवार पुणे डिस्ट्रिक्ट को-ऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन चुने गए. फिर अजित पवार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. साल 1991 में ही उन्होंने पवार परिवार का गढ़ माने जाने वाली बारामाती सीट से लोकसभा का चुनाव जीता. हालांकि, कुछ ही समय बाद अपने चाचा शरद पवार के लिए उन्होंने यह सीट छोड़ दी. बाद में हुए उपचुनाव में मिली जीत के बाद शरद पवार पीवी नरसिम्हा राव सरकार में देश के रक्षा मंत्री बने थे.



20 हजार करोड़ के स्कैम का लगा आरोप
बारामाती की सीट छोड़ने के एवज में अजित पवार को विधानसभा चुनाव में मौका दिया गया और राज्य सरकार में मंत्री बन गए. इसके बाद उन्होंने लगातार 1995, 99, 2004, 09 और 2014 में विधानसभा चुनाव जीते और राज्य के कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाला. इसी बीच दो साल के लिए वह महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री भी बने, लेकिन विवादों से बच नहीं पाए. वर्ष 1999 से 2009 तक सिंचाई मंत्रालय का जिम्मा संभालने वाले अजित पवार पर 20 हजार करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगा. इस मामले ने खूब तूल पकड़ा और बड़ा मुद्दा बन गया.

सितंबर में दिया था विधायकी से इस्तीफाइस साल हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सितंबर में अजित पवार के लिए खतरे की घंटी उस समय बजी जब उनका और शरद पवार का नाम महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले में आया. इसके तुरंत बाद अजित पवार ने विधायकी से इस्तीफा दे दिया. खबरें यहां तक आईं कि अजित के इस कदम से शरद पवार काफी नाराज हैं, लेकिन अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि आखिर चुनाव से एक महीने पहले इस्तीफा देने का मकसद क्या था?



अजित ही संभालते हैं पार्टी का काम
अजित पवार लंबे समय से महाराष्ट्र एनसीपी में संगठन को संभालते रहे हैं. पार्टी से जुड़े निर्णयों से लेकर प्रत्याशी चुनने तक में उनकी अहम भूमिका होती है. देवेंद्र फडणवीस के साथ जाने के दौरान भी बताया जा रहा था कि अजित ऐसा कदम पार्टी पर पकड़ के कारण ही उठा सके. दरअसल वो ही एक तरह से एनसीपी के कर्ताधर्ता बन गए थे. माना यह भी जाता है कि पार्टी में उन्होंने एक ऐसी फौज तैयार कर ली थी जो चाचा शरद पवार के बजाय उनके प्रति ज्यादा वफादार थी. लेकिन बाद में शरद पवार ने अजित को मनाकर साबित किया राजनीति के खेल में असली उस्ताद वही हैं. शरद ने पार्टी भी बचाई और शिवसेना के साथ मिलकर राज्य में सरकार भी बना ली.
ये भी पढ़ें: 

जब हेमंत सोरेन पर लगा था अवैध तरीके से जमीन हासिल करने का आरोप
हाथी और साइकिल को छोड़कर इंदिरा गांधी ने चुना था ‘हाथ’ का चुनाव चिन्ह
असम में तरुण गोगोई की कांग्रेस सरकार में कैसे बना था पहला डिटेंशन सेंटर

 

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए नॉलेज से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: December 30, 2019, 7:18 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर