16 साल अमेरिका में कंप्युटर इंजीनियर रहे अजित सिंह सियासत के लिए स्वदेश तो लौटे लेकिन...

अजित सिंह आईआईटी करने के बाद अमेरिका चले गए थे. वो वहीं पर रहना चाहते थे. लेकिन पिता चरण सिंह के कहने पर उन्हें वापस भारत लौटना पड़ा. (फाइल फोटो)

अजित सिंह आईआईटी करने के बाद अमेरिका चले गए थे. वो वहीं पर रहना चाहते थे. लेकिन पिता चरण सिंह के कहने पर उन्हें वापस भारत लौटना पड़ा. (फाइल फोटो)

88 साल की उम्र में राष्ट्रीय लोकदल के नेता अजित सिंह की कोविड संक्रमण से मेदांता अस्पताल में मृत्यु हो गई. वो फिलहाल अपनी सियासी पारी के सबसे न्यूनतम बिंदू पर थे. एक जमाने में वो अमेरिका में कंप्युटर इंजीनियर की बढ़िया नौकरी कर रहे थे. भारत नहीं आना चाहते थे लेकिन पिता की इच्छा के चलते वापस आए.

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60 के दशक में दुनिया की सबसे बड़ी कंप्युटर कंपनी माने जाने वाली आईबीएम के अमेरिका मुख्यालय में जब शायद गिने-चुने भारतीय काम करते रहे होंगे तो अजित सिंह उसमें आला स्थिति में थे. अमेरिका में उन्होंने कंप्युटर इंजीनियर के तौर पर अपनी जगह बना ली थी. अगर 80 के दशक में अखबारों में प्रकाशित होने वाली खबरों की बात मानें तो वो भारत लौटने में बहुत इच्छुक नहीं थे. लेकिन पिता चरण सिंह की इच्छा पर स्वदेश लौटे और राजनीति में कूद गए.

अजित सिंह ने लखनऊ विश्व विद्यालय से बी.एस-सी की थी. इसके बाद वो आईआईटी खड़गपुर में सलेक्ट हो गए. पढ़ाई में बहुत शार्प माने जाते थे. ये चीज उन्होंने पढ़ाई के दौरान लगातार साबित भी की. उस दौरान भारत में आईआईटी से निकलने बी.टेक ग्रेजुएट अमेरिका का रुख कर लेते थे. 60 के दशक में वो अमेरिका चले गए.

हालांकि अमेरिका जाने का उनका उद्देश्य कंप्युटर साइंस में उच्च शिक्षा हासिल करना था. शिकागो के इलिनोइस इंस्टीट्यूट से उन्होंने पोस्ट ग्रेजुएट किया. 60 के दशक में ही आईबीएम में शामिल हो गए. अजित सिंह करीब 16-17 वर्षों तक अमेरिका में रहे. काम में तरक्की हो रही थी. अच्छा वेतन पा रहे थे. अलग तरह का जीवन था.

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तब चरण सिंह की इच्छा थी कि वो वापस लौट आएं

80 के दशक के आखिर में जब चौधरी चरण सिंह ने पार्टी में अपना सियासी वारिस तलाशना शुरू किया तो उनकी इच्छा थी कि बेटे अजित वापस भारत आकर राजनीति में उनका हाथ बटाएं. चरण सिंह के अनुयायियों ने भी अजित से वापस लौटने की गुहार लगानी शुरू की. माना जाता है कि अजित का बहुत ज्यादा मन नहीं था लेकिन पिता की इच्छा के आगे उन्हें झुकना पड़ा.

वो भारत लौटे और राजनीति में कूदे



80 के दशक के आखिर में वो भारत आ गए. राजनीति में कूद गए. 1986 में जब उनके पिता चरण सिंह बीमार रहने लगे तो वो राज्यसभा के रास्ते संसद में पहुंचे. इसी दौरान लोकदल में दोफाड़ हो गई. उन्होंने लोकदल का अपना गुट बनाया, इसका नाम पड़ा लोकदल (ए) .

अजित सिंह फिलहाल अपनी सियासी पारी के न्यूनतम बिंदू थे. हालांकि पिछले 02-03 दशक से वो हर सरकार में मंत्री थे.

कभी दल बदला तो दल को समाहित किया

वर्ष 1987 में बने लोकदल (ए) के वो अध्यक्ष बने. इसके बाद उनकी पार्टी जनता पार्टी में समाहित हुई और वो 1988 में उसके अध्यक्ष बने. लेकिन इस दौरान ही वो पार्टियां बदलने लगे थे. 1989 में वो जनता दल में आ गए. वहां पार्टी के महासचिव बने.

पश्चिम उप्र से ताकत मिली लेकिन सियासी जमीन कमजोर भी करते गए

अजित सिंह को अपने सारे राजनीतिक करियर में पिता की विरासत के कार्यक्षेत्र पश्चिम उत्तर प्रदेश के ताकत मिलती रही. जब ये इलाका उनसे नाराज होता गया तो वो सियासत में कमजोर भी पड़ते गए. उनकी सियासी ताकत लगातार कमजोर पड़ने लगी.उनके बारे में कहा जाता था कि वो कब किस पार्टी से गठजोड़ करेंगे और कब इसे तोड़ेंगे-कहना मुश्किल है. हालांकि ये सब उन्होंने अपनी सुविधा और हितों को देखते हुए ज्यादा किया.

पहली बार बागपत से लोकसभा पहुंचे

पहली बार वो बागपत से 1989 में लोकसभा के लिए चुने गए. वीपी सिंह की सरकार में वो कैबिनेट मंत्री बने. 1991 में वो फिर लोकसभा के लिए चुने गए. अबकी बार वो पीवी नरसिंहराव की सरकार में मंत्री बने. 96 के चुनाव में वो कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में थे लेकिन जल्दी ही पार्टी और लोकसभा से इस्तीफा दे दिया. 1998 के चुनाव में उन्हें पहली बार हार का सामना करना पड़ा. हालांकि इसके बाद वो 1999, 2004 औऱ 2009 में फिर चुने जाते रहे. वर्ष 2001 से 2003 में वो अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार में भी.

अजित सिंह के पिता और पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह ने एक मजबूत सियासी जमीन तैयार की थी लेकिन अजित ने उसे लगातार कमजोर जरूर किया. उस विरासत को संभाल नहीं पाए.

तकरीबन हर सरकार में मंत्री रहे

कहा जा सकता है कि वो पिछले 02-03 दशकों में तकरीबन केंद्र में हर सरकार में मंत्री रहे. वर्ष 2011 में वो यूपीए में शामिल हुए और केंद्रीय उड्डयन मंत्री बने. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में उन्हें मुजफ्फरनगर में बीजेपी के संजीव बालियान के हाथों हार का सामना करना पड़ा. हालांकि ये केवल 6526 वोटों से ही था. इससे पहले 2014 में बागपत में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा. तब मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह ने उन्हें हराया था.

चरण सिंह की मजबूत विरासत संभाल नहीं पाए

कहा जा सकता है कि उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह ने सियासत की जो मजबूत विरासत और जमीन उन्हें दी थी, उसको वो बनाकर नहीं रख पाए, जो धीरे धीरे कमजोर होती चली गई. चरण सिंह ने जाटों के साथ मुसलमान, गुर्जर और राजपूतों का समर्थन जुटाकर 'मजगर' का चुनावी समीकरण बनाया था, अजित ने उस समीकरण को बनाए रखने का कमज़ोर प्रयास किया.

जाटों को नाराज भी किया

अजित जाटों के नेता तो रहे लेकिन उन्हें नाराज़ भी जमकर किया. उनके रिश्तों को लेकर इस इलाक़े में बहुत सी किंवदंतियां प्रचलित हैं. जैसे हर चुनाव में जाट अजित को हराने की क़समें खाते हैं, लेकिन वोट भी उन्हीं को देकर आते हैं. कहा जाता है कि मतदान से पहले की रात चौधरी चरण सिंह बुज़ुर्ग जाटों के सपने में आते हैं, उन्हें याद दिलाते हैं कि चौधरी साहब के बाद अजित का ख़्याल उन्हें ही रखना है. और अजित जीत जाते हैं.

आज ना विधानसभा में सदस्य और ना ही लोकसभा में

1987 में जब चरण सिंह की मृत्यु हुई तब उत्तर प्रदेश विधानसभा में लोकदल के 84 विधायक थे. लेकिन अजित निजी फ़ायदे के लिए राजनीतिक समझौते करते रहे और पार्टी कमज़ोर होती गई.आज ना तो यूपी विधानसभा में रालोद का कोई सदस्य है और ना ही लोकसभा और राज्यसभा में.

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