अक्षय तृतीया (Akshay Tritiya) 2018:जब दुनिया मंदी से कराह रही थी, तब भारत खरीद रहा था सोना

Akshay Tritiya 2018: जानिए कितना पुराना है भारत का स्वर्ण से प्यार और क्यों इस देश में कभी फीकी नहीं पड़ी सोने की चमक

Sanjay Srivastava
Updated: April 18, 2018, 9:34 AM IST
अक्षय तृतीया (Akshay Tritiya) 2018:जब दुनिया मंदी से कराह रही थी, तब भारत खरीद रहा था सोना
Akshay Tritiya 2018: जानिए कितना पुराना है भारत का स्वर्ण से प्यार और क्यों इस देश में कभी फीकी नहीं पड़ी सोने की चमक
Sanjay Srivastava
Updated: April 18, 2018, 9:34 AM IST
बात करीब 25 साल पहले की है. नब्बे के दशक का शुरुआती दौर. स्वर्गीय पीवी नरसिंहराव ने देश की प्रधानमंत्री पद की बागडोर संभाली थी. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया गया. खजाने की हालत खस्ता थी. विदेशी मुद्रा का भंडार करीब करीब खत्म हो चुका था. हमारे पास विदेशी मुद्रा विनिमय के लिए मुश्किल से दो सप्ताह के लिए धन बचा था. खाद्य तेलों, सामानों और ईंधन के आयात के लिए इतना धन भी नहीं था कि काम चलाया जा पाता. ऐसी स्थिति इस देश में पहले कभी नहीं आई थी. लग रहा था कि कहीं देश दीवालिया तो नहीं हो जायेगा. ऐसे में सरकार को एक कड़ा फैसला करना पड़ा. लेकिन ऐसा फैसला जिसने इंटरनेशनल स्तर पर उसका सिर शर्म से झुका दिया. भारत ने तब अपना 67 टन सोना रिजर्व इंग्लैंड को बेच दिया, वो भी खासे कम दामों में. सोने की सिल्लियां मुंबई से रिजर्व बैंक आफ इंडिया के जरिए लंदन के बैंक आफ इंग्लैंड को भेजी गईं थीं.
इसके बाद नवंबर 2009 में रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने घोषणा की कि वो 200 टन सोना 6.7 बिलियन (31,654 करोड़ रुपये) में खरीद रहा है. देश के समाचार पत्रों में तो इस खबर को ज्यादा प्रमुखता नहीं मिली लेकिन विदेशी अखबारों ने इसे बहुत बढ़ा चढ़ाकर छापा. लंदन और न्यूयार्क के ज्यादातर अखबारों ने भारत के इंटरनेशनल मानेटरी फंड से सोना खरीदने की बात को सुर्खियों में छापा.समय का एक चक्र पूरा हो गया था. भारत ने ये दो सौ टन सोना तब खरीदा जब ये अपने सर्वोच्च स्तर पर था.
जिस समय सारी दुनिया खालिस मंदी की मार से त्राहि - त्राहि कर रही थी. उसी दौर में दो सौ टन सोने को देखते ही देखते खरीद लेना नए भारत के आत्मविश्वास की नई कहानी कह रहा था. उस मंदी में दो ही एशियाई देश शान से खड़े रह पाये. एक चीन और दूसरा भारत.

गोल्ड रिजर्व रिकॉर्ड स्तर पर 

अब भारत में सोने का रिजर्व 558.10 टन है. वर्ष 2018 की पहली तिमाही में ये अपने सबसे उच्चतम स्तर पर रिकार्ड किया गया. वर्ष 2000 में ये रिजर्व अपनी न्यूनतम स्थिति पर था, तब ये 358 टन रह गया था.
गैर आधिकारिक तौर पर भारत के लोगों द्वारा व्यक्तिगत रूप से सोना रखने की बात करें तो हम दुनिया के नंबर वन देश माने जाते हैं. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट मानती है कि फिलहाल भारत के लोगों के पास प्राइवेट तौर पर 18 हजार टन से ऊपर सोना होगा, यानि दुनिया में सबसे ज्यादा.



ईसा पूर्व से पहले का है हमारा सोने से प्यार 

हमारे देश में सोने का क्रेज युगों युगों से रहा है, ईसा पूर्व के कई हजार साल पहले से. यही एक एेसी दीवानगी इस देश में रही, जो कभी कम नहीं हुई बल्कि यों कहें कि बढ़ती ही जा रही है.

भारत में सोने की खपत का इतिहास देश के इतिहास जितना ही पुराना है. हालांकि देश में सोने के खनन का ज्यादा उल्लेख नहीं मिलता. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कर्नाटक में ईसा से पहले सोने की कई खदानें थीं, जिनसे सोना निकला जाता था. वैसे भारतीय व्यापारी कच्चे सोने की खोज में दूर-दूर तक के सुदूर पूर्व के देशों की यात्राएं करते थे, यही कारण है कि सुमात्रा, जावा, इंडोनेशिया, मलेशिया, कंबोडिया, वियतनाम जैसे देशों में भारतीय संस्कृति की हजारों साल पुरानी छाप वहां के मंदिरों के रूप में अब भी देखी जा सकती हैं. भारतीय सोने के व्यापारी और कारीगर प्राचीन काल में इनमें से कई देशों में जाकर बस भी गये.
वैसे विवरण तो ये भी मिलते हैं कि दक्षिण आस्ट्रेलिया के जनजातीय इलाकों से खनिज सोना भारत आता था, जहां उसे परिष्कृत किया जाता था. फिर उन्हें गहनों की शक्ल दी जाती थी.

बढती गई स्वर्णिम चमक
ईसा से ढाई हजार साल पहले भारत की सिंधु घाटी सभ्यता में सोने के सिक्के और गहने मिलने का वर्णन है. वैदिक काल में इसका महत्व धार्मिक और सांस्कारिक तौर तरीकों में और बढ़ा. रीतिरिवाजों में इस बहुमुल्य धातु का उपयोग अधिकाधिक होने लगा. मौर्य वंश के शासनकाल में सोने का महत्व शायद सबसे ज्यादा बढा. फिर मध्यकाल और मुगलकाल में स्वर्ण की चमक बढ़ती गई. चौदहवीं शताब्दी के आसपास तक तो भारत के कई साम्राज्यों में सोने और चांदी के सिक्कों का प्रचलन भी था.

स्वर्णकारों का दर्जा था ज्यादा ऊंचा 

वैदिक काल में दूसरी शताब्दी में स्वर्णकारों का समाज में खासा ऊंचा स्थान था, क्योंकि वो सबसे महंगी धातु को अपने हाथों से जो नये नये रूप देते थे. उनका स्थान दूसरे कलाकारों से काफी ऊंचा माना जाता था. उन्हें राजसी संरक्षण हासिल था. ऐेतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि भारतीय स्वर्णकारों ने तब तक आभूषण बनाने में खास पारंगता हासिल कर ली थी. भारत में बने आभूषणों की दूसरे समीपवर्ती देशों में काफी मांग हुआ करती थी. वो बखूबी जानते थे कि सोने में धातुओं को किस तरह मिश्रित करना है और उसे कैसे पिघलाना है. हर गांव शहर में सोनार जरूर होता था.



हर साम्राज्य के आभूषणों की शैली थी विशिष्ट
भारत में बहुत ढेर सारे राजवंशों का उदय और पतन हुआ. हर वंश की ज्वैलरी की शैली अलग और विशिष्ट होती थी. अलग शैली में गढ़ी होती थी. गंधरा दौर के आभूषणों में ग्रीक और हेलेनिस्टिक प्रभाव था. 322 ईसा पूर्व से 72 ईसापूर्व तक आभूषण और परिष्कृत हो चुके थे. सोने के साथ दूसरे अन्य पत्थरों का इस्तेमाल सिखा जा चुका था.



मुगल जब भारत आये तो वो इसमें और बदलाव लेकर आये. 1526 से शुरू हुुए मुगल साम्राज्य के दौरान आभूषणों का कांसेप्ट और स्टाइल सबकुछ बदल गया. ज्वैलरी के डिजाइन में ईरान और फ्रांस का प्रभाव देखा जाने लगा. ये डिजाइन इतनी वैविध्य से भरी हुई थीं कि हर राज्य में वो अलग अलग छटा लिए होती थीं. उड़ीसा और बंगाल के तरीके अलग थे तो राजस्थान में सोने में मीनाकारी अलग तरीके से होती थी. अलग अलग राज्यों के मंदिरों में आभूषणों की सजावट की शैली भी अलग अलग होती थी.
IBN Khabar, IBN7 और ETV News अब है News18 Hindi. सबसे सटीक और सबसे तेज़ Hindi News अपडेट्स. Knowledge News in Hindi यहां देखें.
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर