क्यों संभल जाएं जब आसपास का तापमान 45 डिग्री या ज्यादा होने लगे, जानें क्या है लू

उत्तर भारत अब तवे की गरम हो गया है और लू चलने लगी है
उत्तर भारत अब तवे की गरम हो गया है और लू चलने लगी है

बढ़ते तापमान के चलते उत्तर भारत की हालत गर्म तवे की तरह है. ये लू का मौसम है. ऐसे में बाहर निकलना और 45 डिग्री से ज्यादा के तापमान का सामना करना नुकसानदेह है. हालांकि लू का चलना पर्यावरण के लिए अच्छा भी होता है

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गर्मी ने कहर ढाना शुरू कर दिया है. पिछले 24 घंटों में दुनिया की सबसे गर्म 15 जगहों में 10 भारत की हैं. राजस्थान के चुरु में तापमान 50 डिग्री को छू रहा है. गंगानगर, बीकानेर और पिलानी बस इससे जरा ही पीछे हैं. यही नहीं दिल्ली और उत्तर भारत भी 47 डिग्री के आसपास तप रहा है. उत्तर भारत का हाल इस समय किसी गरम तवे जैसा है. इस गर्म मौसम में लू और कहर ढहा रही है.

क्या होती है लू 
गर्मी के मौसम से जूझ रहा इलाका जहां तापमान, अपेक्षित तापमान से कहीं ज्यादा हो और ये पांच दिन से ज्यादा जारी रहे – इसे लू कहा जाता है. इसके साथ ही मौसम में नमी भी आ जाती है. किसी भी क्षेत्र का अपेक्षित तापमान किसी भी मौसम में कितना होगा, इसकी गणना तापमान के पिछले 30 साल के रिकॉर्ड के आधार पर की जाती है.

गरम हवाएं आमतौर पर एक एरिया के ऊपर बने अधिक दबाव की वजह से पैदा होती हैं. यह अधिक दबाव काफी देर तक बना रहता है, अक्सर कई दिन और हफ्ते भी.
अजीब बात है लेकिन है सच 


जानकार कहते हैं कि लू या गरम हवाएं पर्यावरण के लिए अच्छी होती हैं. सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन अच्छा मॉनसून निर्भर करता है इस बात पर की हमारी जम़ीन ठीक से गरम हुई है या नहीं. वहीं दूसरी तरफ लू से होने वाली मौत को भी रोका जा सकता है अगर सही तरह के इंतज़ाम किए जाएं.

जैसे दोपहर के वक्त सूरज से सीधा सामना न हो पाए. सूरज और बारिश का आपस में गहरा रिश्ता है और जितना तेज़ सूरज होगा, मॉनसून को आने में उतनी ही आसानी होगी.

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लू उतनी खतरनाक नहीं होती , लेकिन पर्यावरण में हो रहे प्रदूषण और धूल ने उसे खतरनाक बना दिया है


हमारे शरीर पर क्या असर डालती है लू
हमारे शरीर का मूल तापमान 37 डिग्री सेल्सियस होता है यानि इस तापमान पर हमारे शरीर से काम लेने वाले एनज़ाइम्स सबसे अच्छा प्रदर्शन करते हैं. अफसोस कि इस तापमान के बावजूद गरमी को हम एक डिग्री भी ज्यादा सहन नहीं कर पाते.

जहां हमारे शरीर के अंदर का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस होता है. वहीं त्वचा का तापमान 33 डिग्री रहता है. यानि अंदरूनी हिस्से से त्वचा तक आते आते काफी तापमान कम हो जाता है. तभी शरीर ठंडा रह पाता है.

जब आसपास का तापमान 45 डिग्री हो तो संभल जाएं
जब आसपास का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंचने लगता है तब उलटी प्रक्रिया शुरू हो जाती है और शरीर में गर्मी जमा होने लगती है. ऐसे में पसीना बहाने वाले ग्लैंड्स काम पर लग जाते हैं, जिससे शरीर ठंडा रहता है.

ऐसे में अगर हम कुछ एहितायत बरतें और सूरज से सामना कम ही करें, तो इस लू से हम निपट सकते हैं. लेकिन यह भी सच है कि वक्त के साथ शहरीकरण बढ़ रहा है, और धूल, निर्माण कार्य की वजह से गर्मी बढ़ रही है. यानि लू स्वाभाविक रूप से तो नुकसानदायक नहीं है लेकिन मानव निर्मित कार्यों की वजह से जिस तेज़ी से तापमान में बढ़ोतरी हो रही है, वह निश्चिततौर पर चिंता की बात है.

जानलेवा साबित होती रही हैं गरम हवाएं 
कुछ साल पहले आई विश्व मौसम विज्ञान संगठन की रिपोर्ट में बताया गया था कि किस तरह गरम हवाएं पिछले एक दशक में बहुत ज्यादा जानलेवा साबित हुई हैं जिसकी वजह से यूरोप में 2003 में 72 हजार लोगों की जाने गई, वहीं रूस में 2010 में 55 हजार लोग लू की चपेट में आ गए.

एक स्टडी के मुताबिक किसी भी शहर में ‘ग्रीन स्पेस’ होने से इस तरह की मौतों में 50 फीसदी की कमी आ सकती है. दक्षिण एशिया में लू का कहर कितना पड़ता है इसका अंदाजा हर दिन अखबारों में आने वाली रिपोर्टों से लगाया जा सकता है.

भारत के हिसाब से लू कितनी तापमान में शुरू हो जाती है
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, भारत सरकार की वेबसाइट में हीट वेव यानि कड़ी गरमी को कुछ इस तरह समझाया गया है – यह सामान्य तौर पर अधिकतम तापमान से कहीं ज्यादा तापमान को कहते हैं और भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के गरमी के मौसम में यह गरम हवाएं आती हैं. यह आमतौर पर मार्च से जून के बीच आती है.

अधिकतम तापमान और उसकी वजह से पर्यावरण की स्थितियों में होने वाले बदलाव से उस क्षेत्र के लोगों पर असर पड़ता है और कई बार मौत भी हो जाती है.भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक गर्म हवाएं चलने के कई पैमानों में एक यह है कि मैदानी इलाके में जब तापमान 40 डिग्री सेल्सियस और पहाड़ी पर 30 डिग्री से ज्यादा पहुंच जाए.

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