बंगाली अभिनेता सौमित्र चटर्जी, जिन्हें शूट को एक बार में पसंद कर लेते थे सत्यजीत रे

दिग्गज बंगाली एक्टर सौमित्र चटर्जी (Photo- twitter)
दिग्गज बंगाली एक्टर सौमित्र चटर्जी (Photo- twitter)

पहली फिल्म के दौरान सौमित्र चटर्जी (Soumitra Chatterjee) को खुदपर यकीन नहीं था. वे मानते थे कि उनका चेहरा कैमरे पर अच्छा नहीं लगेगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 15, 2020, 9:53 PM IST
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दिग्गज बंगाली एक्टर सौमित्र चटर्जी का 85 साल की उम्र में पोस्ट-कोरोना तकलीफों के कारण निधन (Soumitra Chatterjee passes away) हो गया. 50 के दशक में बांग्ला सिनेमा से शुरुआत करने वाले सौमित्र ऐसे पहले भारतीय कलाकार रहे, जिन्हें फ्रांस का सबसे बड़ा कला अवॉर्ड Ordre des Arts et des Lettres मिला था. ऑस्कर विजेता डायरेक्टर सत्यजीत रे (Satyajit Ray) के साथ सौमित्र ने अपना बेहतरीन काम दिया था.

अमेरिका के सबसे ख्यात फिल्म आलोचकों में से एक पॉलिन केल ने सौमित्र को वन-मैन-स्टॉक कंपनी यूं ही नहीं कहा था. पॉलिन का मानना था कि वे एक से दूसरी भूमिका में इतने आराम और सहजता से जाते हैं कि उन्हें पहचाना ही नहीं जा सकता. पश्चिम बंगाल में साल 1935 में जन्मे सौमित्र कीअभिनय में रुचि बचपन से ही दिखने लगी. इसकी वजह थी, उनका परिवार, जहां दादा थिएटर से जुड़े हुए थे.





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सौमित्र के पिता वैसे तो पेशेवर वकील थे लेकिन वे भी थिएटर में गहरी दिलचस्पी रखते थे. देखादेखी सौमित्र भी स्कूल में अभिनय करने लगे, लेकिन तब तक वे इस बात पर पक्का नहीं थे कि वे आगे क्या काम करेंगे. यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकाता से बांग्ला साहित्य में ग्रेजुएशन करने तक वे अभिनय को शौक की तरह लेते रहे. मास्टर्स के दौरान उन्होंने एक शो देखा, जिसके बाद से वे एक्टिंग में पूरी तरह से घुलमिल गए.

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सौमित्र के पिता भी थिएटर में गहरी दिलचस्पी रखते थे


बेहतरीन आवाज के मालिक सौमित्र आय के लिए ऑल इंडिया रेडियो में उद्घोषक का काम करते थे. इसी दौरान वे सत्यजीत रे के संपर्क में आए. तब रे अपराजितो फिल्म बना रहे थे और उसके लिए नए चेहरों की तलाश में थे. हालांकि सौमित्र का काम पसंद आने के बाद भी रे उन्हें अपराजितो में मौका नहीं दे सके लेकिन उन्हें अभिनय का दीवाना 21 साल के ये नौजवान याद रह गया.

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बाद में किसी दूसरी फिल्म के सेट पर बांग्ला सिनेमा के दो दिग्गजों की मुलाकात हुई और रे ने उन्हें अपनी अगली फिल्म अपुर संसार के लिए चुन लिया. तो इस तरह से बनी ये जोड़ी पूरे 14 फिल्मों तक चली, जिसमें दोनों ने ही बेहतरीन काम दिया. रे ने कई बार जिक्र किया था कि सौमित्र उन्हें रवींद्रनाथ ठाकुर की याद दिलाते थे. वे अक्सर मजाक करते थे कि अगर सौमित्र को दाढ़ी लगा दी जाए तो वे वही लगेंगे.

ऐसे ही एक अन्य इंटरव्यू के दौरान सौमित्र और अपनी केमिस्ट्री पर बोलते हुए रे ने कहा था कि वे एक बुद्धिमान एक्टर हैं. और अगर उन्हें खराब स्क्रिप्ट दी जाए तो वे जानते हैं कि खराब एक्टिंग भी कैसे करनी है.

अभिनय के महारथी सौमित्र चटर्जी को लिखने-पढ़ने का भी काफी शौक था


सौमित्र को अपने रंग-रूप और शख्सियत पर खास आत्मविश्वास नहीं था. कहा जाता है कि रे के अपने फिल्म में लेने के बाद भी वे काफी डरे हुए थे क्योंकि वे मानते थे कि उनका चेहरा कैमरे पर अच्छा नहीं लगेगा. हालांकि फिल्म का पहला दृश्य एक ही टेक में ओके हो गया. इसके बाद जाकर सौमित्र को खुद पर यकीन हो सका.

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वे फेलुदा नाम के जासूसी चरित्र के तौर पर पूरे बंगाल में लोकप्रिय हो गए थे. फेलुदा या प्रदोश चंद्र मित्‍तर मशहूर फिल्‍म‍ निर्देशक और लेखक सत्‍यजीत रे के काल्‍पनिक पात्र का नाम था. महज 27 साल का ये जासूस बड़ी से बड़ी गुत्थी चुटकियों में सुलझा देता था. अपनी उम्र और भंगिमाओं के कारण वे इस रोल में खूब फबते थे. यहां तक कि रे ने अपनी कहानियों में भी फेलुदा के नाक-नक्श सौमित्र की ही तरह रखे थे.



सत्यजीत रे के अलावा इस दिग्गज बंगाली एक्टर ने कई दूसरे फिल्म निर्देशकों जैसे मृणाल सेन, असित सेन, अपर्णा सेन, रितुपर्णो घोष और तपन सिन्हा के साथ भी शानदार काम किया. परदे पर अभिनय के बाद भी वे थिएटर को नहीं भूले थे और लगातार कोलकाता के थिएटर में अभिनय किया करते थे. साथ ही साथ उन्हें लिखने-पढ़ने का भी भारी शौक था. खासकर कविता लेखन में उनकी खूब रुचि थी और उन्होंने कविता की 12 किताबें भी लिखीं.

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लगभग 2 दशक तक सिनेमा की मुख्यधारा में काम करने और ढेरों अवॉर्ड्स लेने के बाद आखिरकार सौमित्र दोबारा रंगमंच की ओर लौटे. साल 1978 में उन्हों दोबारा पूरी तरह से थिएटर के लिए काम शुरू कर दिया. लेकिन बीच-बीच में फिल्मों की ओर भी लौटते रहे.
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