Explained: क्या है 2-DG दवा, जो कोरोना से मची तबाही के बीच उम्मीद लेकर आई?

दिल्ली में फिर 1500 से कम कोरोना केस मिले.

डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गनाइजेशन (DRDO) ने कोरोना के मरीजों पर 2-DG दवा (2-DG drug on coronavirus patients) के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है. ये दवा उन कोशिकाओं को टारगेट करती है, जहां वायरस पनप रहे हों.

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    (डॉ चंद्रकांत लहरिया)

    देश अब भी कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर की चपेट में है, हालांकि कुछ राज्यों में ग्राफ नीचे आ रहा है. इस बीच डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (DRDO) ने एक ऐसी दवा के आपातकालीन उपयोग की इजाजत दे दी है जो कोरोना संक्रमण से लड़ने में मददगार है. इस दवा को 2-deoxy-D-glucose (2-DG) नाम दिया गया. इसे ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) की ओर से भी हरी झंडी मिल गई है.

    ऑक्सीजन पर निर्भरता कम हो सकेगी
    ड्रग 2-डीजी को DRDO की मदद से इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन ने तैयार किया. साथ ही इसे डॉ रेड्डी लैब का भी सहयोग मिला. माना जा रहा है कि ये कोरोना के मॉडरेट से लेकर गंभीर लक्षणों वाले मरीजों के लिए काफी कारगर होगा और सबसे बड़ी बात कि ऑक्सीजन पर निर्भरता को कम करेगा. ये काम की बात है क्योंकि पिछले कुछ समय में ऑक्सीजन संकट के कारण बहुत से कोरोना मरीजों की जान गई. वैसे तो 2-डीजी दवा शुरुआत में कुछ ही अस्पतालों तक पहुंचेगी लेकिन जून के मध्य तक ये सारे अस्पतालों को मिल सकेगी.

    2-DG Drug against coronavirus infection
    कोरोना के मरीजों पर 2-DG दवा के इस्तेमाल को मिली मंजूरी - सांकेतिक फोटो (pixabay)




    क्या है ये दवा और कैसे काम करती है?
    ये ग्लूकोज से बनने वाली दवा है, जो कैंसर के मरीजों पर भी सहायक दवा के तौर पर इस्तेमाल होती रही. ये मेटाबॉलिज्म पर असर करते हुए ग्लाइकोलाइसिस नाम के रास्ते में रुकावट डालती है. इससे कोशिकाओं में ग्लूकोज का बनना बाधित होता है. बता दें कि कोरोना वायरस कोशिकाओं के भीतर ग्लूकोज में भी तेजी से बढ़ता है. यानी अगर इस प्रक्रिया को ही कमजोर कर दिया जाए तो वायरस का पनपना भी कम हो सकेगा. स्टडी में देखा गया कि दवा उन्हीं कोशिकाओं को टारगेट करती है, जहां वायरस हों. ये वहां जाकर अतिरिक्त ग्लूकोज बनने को रोकता है और वायरस का मल्टीप्लाई होना कमजोर पड़ता जाता है.

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    क्या पहले इस्तेमाल हुआ है?
    2-डीजी को अब तक किसी बीमारी में मुख्य इलाज के तौर पर नहीं लिया गया. वैसे कथित तौर पर कैंसर के 200 से ज्यादा क्लिनिकल ट्रायल में इसका उपयोग कहा जाता है. फिलहाल भी माना जा रहा है कि संक्रमित कोशिकाओं तक जाकर ग्लूकोज उत्पादन रोक दवा वायरस के पनपने पर लगाम लगा सकेगी. पिछले एक साल में दुनिया के अन्य हिस्सों से प्रकाशित कुछ शोध पत्रों में थेरेपी के रूप में 2-डीजी की संभावित भूमिका पर भी चर्चा हुई लेकिन अब तक ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं आई, जिसमें अस्पतालों में कोविड मरीजों पर इसके उपयोग की बात हो.

    2-DG Drug against coronavirus infection
    दवा से वायरस का मल्टीप्लाई होना कमजोर पड़ता जाता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    क्लिनिकल ट्रायल में क्या दिखा?
    जैसा कि होता है, किसी भी दवा को थेरेपी की तरह काम में लाने से पहले क्लिनिकल ट्रायल से गुजरना होता है, 2-DG भी इस प्रोसेस से गुजरा. प्री-क्लिनिकल ट्रायल अप्रैल 2020 में हुआ. इसमें दिखा कि कैसे दवा वायरस के खिलाफ काम करती है. इसके बाद मई से अक्टूबर 2020 के बीच 17 अस्पतालों के 110 कोरोना मरीजों पर क्लिनिकल ट्रायल हुआ. दिसंबर 2020 से लेकर मार्च 2021 के बीच 27 अस्पतालों के 220 मरीजों पर फेज-3 ट्रायल किया गया. इस दौरान DRDO और रेड्डी लैब ने मिलकर काम किया.

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    इमरजेंसी इस्तेमाल के लिए दवा को अनुमति मिली
    हालांकि क्लिनिकल ट्रायल का डाटा पब्लिक डोमेन में फिलहाल नहीं. 8 मई को आधिकारिक तौर पर जारी प्रेस रिलीज में बताया गया कि कैसे इस दवा के इस्तेमाल से मरीजों में रिकवरी का समय लगभग ढाई दिन (2.5) कम हो गया. रिलीज में बताया गया कि काफी सारे मरीज इस दवा की मदद से रिकवरी की ओर बढ़े और तीसरे दिन ऑक्सीजन की जरूरत कम हो गई.

    तो, क्या हमें COVID-19 के लिए एक और थेरेपी मिल गई है?
    अब तक कोविड के इलाज के लिए तीन तरह के इलाज कारगर दिख रहे हैं- डेक्सामेथासोन, खून पतला करने वाली दवाएं और ऑक्सीजन. बीमारी के इलाज के लिए भारत में काम आ रही बाकी थेरेपी ऑफ-लेबल है. यानी ये पक्का नहीं हो सका कि उनसे कितना लाभ होता है. 2-DG दवा को वैकल्पिक दवा के तौर पर मंजूरी मिली.

    2-DG Drug against coronavirus infection
    दिसंबर 2020 से लेकर मार्च 2021 के बीच 27 अस्पतालों के 220 मरीजों पर फेज-3 ट्रायल किया गया- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    क्या है वैकल्पिक थेरेपी 
    बता दें कि प्राइमरी थेरेपी वो है, जिसका किसी बीमारी के इलाज में सीधा रोल होता है. वहीं वैकल्पिक थेरेपी सीधे इलाज नहीं करती लेकिन इलाज में सहायक होती है. एक बार अपनी उपयोगिता साबित होने के बाद ये मुख्य इलाज का हिस्सा भी बन जाती है. इस तरह से देखें तो फिलहाल 2-DG दवा को अपनी उपयोगिता दिखाने के लिए काफी सफर करना होगा.

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    दवा को लेकर किस तरह के सवाल उठ रहे?
    2-DG थेरेपी को भले ही हमारे यहां इजाजत मिल गई लेकिन क्लिनिकल ट्रायल का डाटा पब्लिक डोमेन में नहीं. न ही इसे वैज्ञानिकों के समूह में रिव्यू के लिए दिया गया. अब विशेषज्ञ कुछ बातों पर एतराज जता रहे हैं. जैसे तीसरे चरण के ट्रायल में केवल 220 मरीजों को लिया गया, जो कि इस फेज के लिहाज से काफी छोटा साइज है. इतने कम लोगों पर ट्रायल से दवा के बारे में पूरी जानकारी नहीं मिल पाती है कि वो कितनी कारगर और सुरक्षित है. रेमडेसिविर, प्लाज्मा थेरेपी समेत कई दूसरे इलाज के बारे में इसी तरह का तजुर्बा रहा. कुछ मानते हैं कि ये काम की हैं तो कुछ इसे पूरी तरह नकार रहे हैं.

    2-DG Drug against coronavirus infection
    DCGI की मंजूरी के बाद भी बहुत से लोग मान रहे हैं कि बड़े समूह पर इसका क्लिनिकल ट्रायल होना चाहिए- सांकेतिक फोटो


    ज्यादा लोगों पर क्लिनिकल ट्रायल की मांग
    इसके अलावा क्लिनिकल ट्रायल बड़े समूह पर होने पर ही दवा की एफिकेसी निकलकर आ पाती है. यही कारण है कि DCGI की मंजूरी के बाद भी बहुत से लोग मान रहे हैं कि साथ में बड़े समूह पर इसका क्लिनिकल ट्रायल होना चाहिए. इसके अलावा प्रेस विज्ञप्ति में तीन बार 'महत्वपूर्ण' शब्द का इस्तेमाल हुआ. क्लिनिकल रिसर्च में ये टर्म खास मतलब नहीं रखती, जब तक कि इसे 'सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण' न कहा जाए. इसपर ज्यादा जानकारी दी जानी चाहिए ताकि थेरेपी को समझा और भरोसा किया जा सके.

    आगे क्या हो सकता है?
    दवा का लाइसेंस एक अच्छी शुरुआत है. लेकिन अभी बड़े पैमाने पर रैंडम क्लिनिकल ट्रायल की जरूरत है. साथ ही मरीजों और परिजनों को ये बताया जाना भी जरूरी है कि ये एक वैकल्पिक दवा है और अभी इसपर और काम की जरूरत है. वैसे तो ये दवा फिलहाल बाजार में नहीं मिलेगी लेकिन तब भी ये पक्का किया जाना चाहिए कि लोग पैनिक न हों और दवा की मांग न शुरू हो जाए.

    हो सकता है कि 2-DG दवा कोरोना के इलाज की दिशा में वो दवा साबित न हो सके, जिसका दुनिया में इंतजार है लेकिन इससे कम से कम उम्मीद बंध रही है कि हम इलाज की दिशा में आगे जा रहे हैं.

    (डॉ चंद्रकांत लहरिया पब्लिक पॉलिसी और हेल्थ सिस्टम के जानकार हैं. वे ‘Till We Win: India’s Fight Against The COVID-19 Pandemic’ के सह-लेखक भी हैं. इस लेख में दिए गए विचार उनके हैं.)