कांग्रेस छोड़ क्यों हिंदुत्व की ओर चले गए RSS के संस्थापक डॉ. हेडगेवार

मुंजे के अलावा हेडगेवार के व्यक्तित्व पर बाल गंगाधर तिलक और विनायक दामोदर सावरकर का बड़ा प्रभाव था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 1, 2019, 10:23 AM IST
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डॉ. हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल 1889 को नागपुर के ब्राह्मण परिवार में हुआ था. शुरुआती पढ़ाई नागपुर के नील सिटी हाईस्कूल में हुई, लेकिन एक दिन स्कूल में वंदेमातरम गाने की वजह से उन्हें निष्कासित कर दिया गया. उसके बाद उनके भाइयों ने उन्हें पढ़ने के लिए यवतमाल और फिर पुणे भेजा. मैट्रिक के बाद हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी एस मूंजे ने उन्हें मेडिकल की पढ़ाई के लिए कोलकाता भेज दिया. यह बात 1910 की है. पढ़ाई पूरी करने के बाद वह 1915 में नागपुर लौट आए.

आजादी की लड़ाई चल रही थी और हेडगेवार भी शुरुआती दिनों में कांग्रेस में शामिल हो गए. 1921 के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और एक साल जेल में बिताया. लेकिन, मिस्र के घटनाक्रम के बाद भारत में शुरू हुए धार्मिक-राजनीतिक खिलाफत आंदोलन के बाद उनका कांग्रेस से मन खिन्न हो गया. 1923 में सांप्रदायिक दंगों ने उन्हें पूरी तरह उग्र हिंदुत्व की ओर ढकेल दिया.

वह हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी एस मुंजे के संपर्क में शुरू से थे. मुंजे के अलावा हेडगेवार के व्यक्तित्व पर बाल गंगाधर तिलक और विनायक दामोदर सावरकर का बड़ा प्रभाव था.




हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करने के लिए 1925 में विजय दशमी के दिन डॉ. हेडगेवार ने संघ की नींव रखी. वह संघ के पहले सरसंघचालक बने. हेडगेवार ने शुरू से ही संघ को सक्रिय राजनीति से दूर सिर्फ सामाजिक-धार्मिक गतिविधियों तक सीमित रखा.

हेडगेवार का मानना था कि संगठन का प्राथमिक काम हिंदुओं को एक धागे में पिरो कर एक ताकतवर समूह के तौर पर विकसित करना है. हर रोज सुबह लगने वाली शाखा में कुछ खास नियमों का पालन होता था.



हेडगेवार का हिंदुत्व के बारे में स्पष्ट मत था. उनका कहना था -

“कई सज्जन यह कहते हुए भी नहीं हिचकिचाते कि हिंदुस्तान केवल हिंदुओं का कैसे? यह तो उन सभी लोगों का है जो यहां बसते हैं. खेद है कि इस प्रकार का कथन/आक्षेप करने वाले सज्जनों को राष्ट्र शब्द का अर्थ ही ज्ञात नहीं. राष्ट्र केवल भूमि के किसी टुकड़े को नहीं कहते.

डॉ. हेडगेवार का निधन 21 जून, 1940 को हुआ. उनके बाद सरसंघचालक की जिम्मेदारी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर को सौंप दी गई. इन दिनों डॉ मोहनराव मधुकर भागवत यानी मोहन भागवत यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.
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