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क्या है वो परनामी संप्रदाय, जिसे मानती थीं गांधीजी की मां

News18Hindi
Updated: October 20, 2019, 5:47 PM IST
क्या है वो परनामी संप्रदाय, जिसे मानती थीं गांधीजी की मां
परनामी समुदाय का जितना विश्वास हिन्दू धर्म में होता है उतना ही इस्लाम में भी.

परनामी समुदाय का जितना विश्वास हिन्दू धर्म में होता है उतना ही इस्लाम में भी.

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  • Last Updated: October 20, 2019, 5:47 PM IST
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गांधी जी हिंदू धर्म में पैदा हुए. ताउम्र हिंदू धर्म की परंपराओं के साथ जीवन जिया. गांधीजी की मां हिंदू होते हुए भी ऐसे परनामी संप्रदाय में यकीन रखती थीं, जो गीता और कुरान में कोई भेद नहीं करता था. मोहनदास करमचंद गांधी पर मां की गहरी छाप रही, वो सभी धर्मों का सम्मान करते थे. गांधीजी ने जब अपनी आत्मकथा 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' लिखी तो मां पुतलीबाई के बारे में बात करते हुए परनामी समुदाय पर भी लिखा.

परनामी संप्रदाय में दो धर्मों के संगम का वर्णन महात्मा गांधी ने किया है. गांधी कहते हैं, "मेरा परिवार परनामी था. भले ही हम जन्म से हिंदू हैं, लेकिन मां जिस परनामी संप्रदाय के धार्मिक स्थल पर हमेशा जाती थीं, वहां पुजारी समान तौर पर गीता और कुरान दोनों से पढ़ता था. परनामी सात्विक जीवन, परोपकार, जीवों पर दया, शाकाहार और शराब से दूर रहने पर जोर देता था. इस संप्रदाय की शिक्षाओं से गांधीजी ने खुद को ताउम्र बांधे रखा.

परनामी समुदाय का जितना विश्वास हिंदू धर्म में होता है उतना ही इस्लाम में भी. परनामी समुदाय के लोग हिंदू धर्म ग्रंथ पढ़ते हुए पैगंबर मोहम्मद का नाम लेते हैं और भगवान कृष्ण की स्तुति के दौरान कुरान की बातें करते हैं. ये हिंदू निजानंद संप्रदाय के लगभग 60 लाख अनुयायियों के लिए दैनिक अनुष्ठान है, जो 400 साल पहले गुजरात के जामनगर में परनामी नाम से शुरू हुआ. कृष्ण के लिए उनका प्यार भी पवित्र पैगंबर का आह्वान करता है.

गुजरात से लेकर नेपाल तक 

ये संप्रदाय में गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान से लेकर और नेपाल में तक फैला है. वहां भी इसके अनुयायी हैं. मुंबई में कम से कम 5,000 परनामी अनुयायी रहते हैं. भुलेश्वर में एक विशेष कृष्ण परनामी मंदिर इन भक्तों का स्वागत करता है,

परनामी समुदाय का श्री कृष्ण मंदिर


परनामी समुदाय को निजानंद संप्रदाय भी कहते हैं. एक ऐसा समुदाय है जो भगवान "राज जी" में विश्वास करता है. उन्हें ही परम सत्य मानता है. मुस्लिम अनुयायियों ने प्राणनाथ जी को "अंतिम इमाम मेहंदी" माना और हिंदू अनुयायियों ने "बुद्ध निशकलंक कल्कि अवतार" के रूप में माना, जिसे 1678 AD में हरिद्वार में कुंभ मेले में तय किया गया.
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श्री कृष्ण की मूर्ति


क्या है परंपरा और क्या है शिक्षा
धर्म के भीतर एक वैष्णववाद उप-परंपरा है जो भगवान कृष्ण पर केंद्रित है. यह परंपरा पश्चिमी भारत में 17 वीं शताब्दी में भक्ति संतों, श्री देवचंद्र महाराज और उनके सबसे प्रमुख शिष्य श्री मेहरराज ठाकुर (जिसे महामती प्रणथ या प्राणनाथ भी कहा जाता है, जो इस परंपरा को नाम देती है) की शिक्षाओं के आधार पर उभरा.

औरंगजेब के गैर-मुसलमानों के धार्मिक उत्पीड़न के चलते ये परंपरा बढ़ी, तब हिंदू विद्रोह ने नए साम्राज्यों का नेतृत्व किया.

राजा छत्रसाल ने संरक्षित किया
बुंदेलखंड के एक ऐसे साम्राज्य के राजा छत्रसाल ने इस संप्रदाय के लोगों को संरक्षित किया. परनामी परंपरा ने हिंदुओं और मुस्लिमों को श्री कृष्ण की पूजा परंपरा में शामिल होने का स्वागत किया. परनामी लोग चाहे किसी भी धर्म के क्यों ना हों, वो एक साथ मिलकर भोजन करने पर विश्वास करते हैं और ये काम वो हमेशा से करते आ रहे हैं. धर्मों के सामंजस्य को आधार मानने के कारण परनामी समुदाय बढ़ता चला गया.

पन्ना रहा है परनामी परंपरा का धार्मिक केंद्र 
परनामी परंपरा का धार्मिक केंद्र पूर्वोत्तर मध्य प्रदेश में पन्ना शहर में रहा है.  समकालीन युग में, अन्य प्रमुख परनामी धार्मिक केंद्र (गद्दी) जामनगर (गुजरात) और फुगुवा (काठमांडू, नेपाल के दक्षिण में) में हैं. इसमें भी गुरुओं की परंपरा रही है. अब भी हर साल जामनगर 12 दिनों का एक बड़ा उत्सव होता है, जिसे पारायण कहते हैं. ये एक नवंबर से 12 नवंबर तक होता है और इसमें दुनियाभर से आए परनामी जुटते हैं. इसमें आमतौर पर दो लाख लोग हिस्सा लेते हैं.

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First published: October 20, 2019, 5:43 PM IST
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