जब कोई अपना धर्म बदलता है तो क्या कहता है कानून

केवल सात राज्य हैं जो धर्म परिवर्तन विरोधी कानून पारित करने में कामयाब रहे हैं.


Updated: July 27, 2018, 12:36 PM IST

Updated: July 27, 2018, 12:36 PM IST
धर्म परिवर्तन केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर में एक विवादित मुद्दा रहा है. जब भी कोई धर्म बदलता तो उसके साथ ढेरों सवाल भी उठ खड़े होते हैं. हालांकि हमारा कानून कहता है कि देश के हर नागरिक को धर्म की आजादी है यानि जिस भी मजहब के साथ रहना चाहे रह सकता है लेकिन हमें जानना चाहिए कि क्या धर्म परिवर्तन को लेकर देश में कोई कानून है और अगर ये है तो कितना कारगर है

भारत हमेशा से सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक विविधता के लिए जाना गया है. ये दुनिया के चार प्रमुख धर्मों का जन्मस्थान भी है - हिंदू, बौद्ध, जैन, और सिख धर्म. हमारा संविधान कहता है कि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है. यानि देश में हर किसी को अपने धार्मिक क्रियाकलापों की आजादी और अधिकार है. देश में धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार के रूप में धर्म परिवर्तन के लिए संवैधानिक सुरक्षा का भी प्रावधान है. सवाल उठता है कि जब कोई धर्म अपना धर्म बदलता है तो कानून क्या कहता है.



कानून की नज़र में धार्मिक क्रियाकलाप की शर्तें

भारतीय संविधान का भाग III विभिन्न मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है. अनुच्छेद 25- 28 धर्म की आजादी का अधिकार प्रदान करता है. ये मुख्य रूप से आयरिश संविधान पर आधारित है. अनुच्छेद 25 (1) में कहा गया है कि "सार्वजनिक आदेश, नैतिकता और स्वास्थ्य और इस भाग के अन्य प्रावधानों के अधीन, सभी व्यक्ति समान रूप से विवेक की स्वतंत्रता और धर्म का प्रचार, अभ्यास और प्रचार करने के लिए स्वतंत्र है." लेकिन अनुच्छेद 26 ये भी कहता है धार्मिक आजादी और धार्मिक संप्रदायों के क्रियाकलाप में शांति और नैतिकता की शर्तें भी हैं यानि ये इस तरह भी नहीं हों कि हालात बिगड़े या कहीं तनाव की स्थिति आ जाए.

अनुच्छेद 27 अनिवार्य करता है कि राज्य द्वारा किसी भी कर का भुगतान करने के लिए किसी भी व्यक्ति को मजबूर नहीं किया जाएगा जिससे किसी विशेष धर्म या धार्मिक संप्रदायों का प्रचार होता हो.
अनुच्छेद 28 में कहा गया है कि सरकारी शैक्षिक संस्थानों में कोई धार्मिक निर्देश नहीं दिया जाएगा.


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धर्म परिवर्तन पर कानून
भारत चूंकि धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है, लिहाजा ना तो किसी धर्म को संरक्षित करता है और ना धार्मिक तौर पर किसी की निजी जिंदगी, विश्वास में तांकझांक करता है. धर्म मूल रूप से पसंद और विश्वास का मामला है. कानून कहता है कि हर किसी को अपनी पसंद के धर्म का चयन करने के लिए स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए. भारतीय संविधान सभी व्यक्तियों को किसी भी धर्म का प्रचार और अभ्यास की आजादी देता है. लेकिन धर्म परिवर्तन समाज और राजनीति में सबसे गर्म मुद्दों में है. ऐसे कई कारण हैं जिनके लिए लोग अपने धर्म को परिवर्तित करते हैं:

- कानून कहता है कि कोई भी अपनी मर्जी से अपना धर्म बदल सकता है, ये उसका निजी अधिकार है
- लेकिन कानून ये भी कहता है कि किसी को डरा-धमका या लालच देकर धर्म परिवर्तन नहीं करा सकते
- देश में बहुत से लोग शादी के लिए धर्म बदलते हैं
- कुछ लोग अपनी सुविधा या वैचारिकता के कारण धर्म बदल देते हैं
- बेशक कानून कहता है कि धन का लालच देकर धर्म नहीं बदलवाया जा सकता लेकिन देश में बड़े पैमाने पर ऐसा किए जाने का आरोप लगता रहा है

किसी भी धर्म का प्रचार करने का अधिकार
सवाल कि क्या 'धर्म परिवर्तन' किसी भी धर्म को फैलाने का अधिकार है, धर्म परिवर्तन कानूनों की संवैधानिकता निर्धारित करने के लिए मौलिक महत्व रखता है. अनुच्छेद 25 "प्रचार" शब्द के बारे में कहता है कि का "प्रचार" अर्थ है प्रसार या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता. भारतीय संविधान ड्राफ्ट करते समय, ड्राफ्टर्स ने "परिवर्तन" शब्द का उपयोग किया लेकिन आखिरी ड्राफ्ट में उन्होंने उप-समिति अल्पसंख्यकों (एम रूथनास्वामी) द्वारा की गई सिफारिशों की मानी और 'परिवर्तन' के बजाए पर 'प्रचार' का इस्तेमाल किया 'और बहस को छोड़ दिया गया कि क्या रूपांतरण शामिल करने का अधिकार शामिल है या नहीं.

आज भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया जा सका है कि क्या किसी भी धर्म को प्रचारित करने का अधिकार रूपांतरण का अधिकार है या नहीं? भारतीय संविधान में 'धर्म परिवर्तन' के लिए कोई अभिव्यक्ति प्रावधान नहीं है लेकिन फिर भी, कुछ ऐसे हैं जिनकी विवाद इस पक्ष में है कि धर्म परिवर्तन' का अधिकार अनुच्छेद 25 के तहत निहित है जो विवेक की स्वतंत्रता से उभरता है और दूसरी तरफ विरोध करने वाले भी हैं.



'धर्म परिवर्तन' के लिए मजबूर करने वाले लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जा सकती है?

केंद्रीय स्तर पर, भारत में कोई कानून नहीं है जो जबरन 'धर्म परिवर्तन के मामले में कोई मंजूरी प्रदान करता है. 1954 में, भारतीय 'धर्म परिवर्तन (विनियमन और पंजीकरण बिल) को पारित करने के लिए एक प्रयास किया गया था लेकिन भारी विपक्ष के कारण संसद इसे पारित करने में विफल रही. बाद में, राज्य स्तर पर विभिन्न प्रयास किए गए. 1968 में उड़ीसा और मध्य प्रदेश ने बल से 'धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए कुछ अधिनियमों को पारित किया. उड़ीसा के 'धर्म परिवर्तन विरोधी कानून में अधिकतम दो साल की कारावास और जुर्माना लगाया गया. मजबूर रूपांतरण के मामले में10,000.

तमिलनाडु और गुजरात जैसे विभिन्न अन्य राज्यों के साथ इसी तरह के कानून पारित हुए, जिसने भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 295 ए और 298 के तहत संज्ञेय अपराध के रूप में मजबूर रूपांतरण किए. इन प्रावधानों के अनुसार जबरदस्ती 'धर्म परिवर्तनट के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को कारावास के साथ दंडित किया जाएगा.



कानून उन लोगों के बारे में क्या कहता है जो कुछ गलत फायदे के लिए धर्म परिवर्तन करते हैं?
ऐसे भी लोग हैं जो अपने धर्म को किन्हीं कारणों के लिए बदल लेते हैं. आरक्षण लाभ प्राप्त करने के लिए, संस्थानों में एडमिशन के लिए, विवाह यी तलाक के लिए.  कानून क्या कहता है ऐसे लोगों के बारे में? इस संबंध में  ऐतिहासिक निर्णय हुए हैं.

अगर कोई हिंदू पुरुष दूसरी शादी के लिए धर्म बदलता है तो हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 17 के तहत इस तरह के विवाह बड़े पैमाने पर आधार पर अमान्य होंगे और इस तरह के व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 494 के तहत उत्तरदायी माना जाएगा.

धर्म परिवर्तन विरोधी कानून किन राज्यों में लागू?

आज तक, केवल सात राज्य हैं जो धर्म परिवर्तन विरोधी कानून पारित करने में कामयाब रहे हैं, लेकिन केवल मध्य प्रदेश, ओडिशा, गुजरात, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश ऐसे राज्य हैं जहां विरोधी रूपांतरण कानून लागू हैं. हाल ही में झारखंड ने एक धर्म परिवर्तन विरोधी बिल का प्रस्ताव दिया है जिसका उद्देश्य जबरन धर्म परिवर्तन को प्रतिबंधित करना है.
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