भारत की जेलों में कैदियों को कितनी मिलती है दिहाड़ी

पारिश्रमिक और मजदूरी एक राज्य से दूसरे राज्य में भिन्न होती है.

News18Hindi
Updated: December 6, 2018, 11:53 PM IST
भारत की जेलों में कैदियों को कितनी मिलती है दिहाड़ी
पारिश्रमिक और मजदूरी एक राज्य से दूसरे राज्य में भिन्न होती है.
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Updated: December 6, 2018, 11:53 PM IST
दिल्ली उच्च न्यायालय ने तिहाड़ जेल अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपराध के पीड़ितों या उनके कानूनी वारिसों के कल्याण के लिए अगस्त 2006 में बनाए गए फंड के लिए कैदियों के 25% वेतन से कटौती करने के अभ्यास को फिलहाल बंद रखें.

वेतन

दोषी कैदियों को जेल के अंदर काम करने के लिए भुगतान मिलता है, जो काम स्वेच्छा से या उनकी सजा का हिस्सा हो सकता है. ये मजदूरी उनके वर्गीकरण के आधार पर तय की जाती है - कुशल, अर्द्ध कुशल और अकुशल - और दर समय-समय पर संशोधित की जाती है.



 

 

 
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पारिश्रमिक और मजदूरी एक राज्य से दूसरे राज्य में भिन्न होती है. 2017 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी 2015 के जेल आंकड़ों के अनुसार, पुडुचेरी ने कुशल अभियुक्तों, अर्द्ध कुशल अभियुक्तों और अकुशल अभियुक्तों को क्रमश: 180 रुपये, 160 रुपये और 150 रुपये प्रति दिन की मजदूरी तय की. इसके बाद दिल्ली के तिहाड़ ने क्रमशः 171 रुपये, 138 रुपये और 107 रुपये दिए. अगला बिहार (156 रुपये, 112 रुपये, 103 रुपये) और राजस्थान (150 रुपये, शून्य और 130 रुपये) थे.

निचले सिरे पर मणिपुर और मिजोरम हैं, जिन्होंने 12 रुपये से 15 रुपये प्रति दिन के रूप में कम से कम भुगतान किया था. पश्चिम बंगाल ने 35 रुपये (कुशल अभियुक्त), 30 रुपये (अर्द्ध कुशल) और 26 रुपये (अकुशल) का भुगतान किया, जबकि छत्तीसगढ़ ने 30 रुपये (कुशल) और 26 रुपये (अकुशल) का भुगतान किया, जो कि मजदूरी के रूप में लगभग आधा था मध्य प्रदेश 55 रुपये (कुशल) और 50 रुपये (अकुशल).



 

 

 

 

 

 

 

 

 

कटौती

1998 में, सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को एक तंत्र तैयार करने के लिए कहा ताकि अपराध के पीड़ितों को मुआवजा दिया जा सके (गुजरात राज्य और गुजरात बनाम गुजरात उच्च न्यायालय के केस में यह निर्णय आया). विभिन्न राज्यों में जेलों ने राज्य से राज्य में भिन्न मुआवजे की राशि के साथ अपना खुद का नियम बना दिया. फिर 2008 में, सीआरपीसी को एक नए खंड, 357 ए के साथ संशोधित किया गया, जिसमें यह निर्धारित किया गया था कि प्रत्येक राज्य को अपराध पीड़ितों और उनके आश्रितों की क्षतिपूर्ति के लिए एक योजना तैयार करनी चाहिए.

दिल्ली उच्च न्यायालय के मामले में याचिकाकर्ता कात्यायनी ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के साथ-साथ सीआरपीसी संशोधन दोनों के बाद दिल्ली सरकार ने मुआवजे के लिए अलग-अलग प्रावधान किए हैं. 1998 के आदेश के बाद, 2006 में दिल्ली जेल नियमों में संशोधन किया गया था, जिसमें नियम 39 ए के साथ कैदियों की 25% मजदूरी का कटौती और पीड़ित कल्याण कोष में जमा किया जा सकता था. सरकार ने अदालत से कहा कि 2006 से फंड के लिए कैदियों की मजदूरी से 15 करोड़ रुपये से ज्यादा एकत्रित किया गया है, जो अप्रयुक्त है.

फिर सीआरपीसी संशोधन के बाद, राज्य सरकार ने 2011 में दिल्ली पीड़ितों की मुआवजा योजना को दिल्ली पीड़ितों की मुआवजा योजना, 2015 के साथ बदल दिया. बाद की योजना को देखते हुए याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कटौती का महत्व खत्म हो गया था.
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