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इराक से अमेरिकी फौज का हटना क्या कट्टरपंथी मुल्क ईरान की बल्ले-बल्ले कर देगा?

ट्रंप ने अगले साल की शुरुआत तक इराक से अमेरिकी फौजों को वापस लौटने को कह दिया है- सांकेतिक फोटो (getarchieve)

ट्रंप ने अगले साल की शुरुआत तक इराक से अमेरिकी फौजों को वापस लौटने को कह दिया है- सांकेतिक फोटो (getarchieve)

मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US president Donald Trump) ने अगले साल की शुरुआत तक इराक से अमेरिकी फौजों को वापस लौटने (US army withdrawal from Iraq) को कह दिया है. इससे ईराक सीधे ईरान के हाथों में जा सकता है.

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    अमेरिका मिडिल ईस्ट में शांति के लिए तैनात अपने सैनिकों को वापस बुला रहा है. मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एलान किया है कि 2021 की जनवरी तक ईराक और अफगानिस्तान, दोनों ही देशों में उनके 2500 सैनिक बाकी रहेंगे. ये काफी बड़ा कदम है. राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी फौज की घर वापसी से पड़ोसी देशों में भूचाल आ सकता है.

    क्यों हुई सेना की तैनाती
    फिलहाल आतंकवादी समूह इस्लामिक स्टेट (ISIS) के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के तहत इराक में करीब 5,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं. इन सैनिकों को न केवल आतंक का सफाया करना था, बल्कि साथ ही साथ दोनों देशों में सैनिकों को आतंक से निपटने की ट्रेनिंग भी देनी थी.

    क्या हो सकता है असर
    अब इन्हीं सैनिकों को ट्रंप सरकार आगे की तैयारियों के लिए वापस बुला रही है. ये तारीख ट्रंप की वाइट हाउस से रुखसती से ठीक पहले की रखी गई है. माना जा रहा है कि सैनिकों के जाने से पड़ोसी आतंकी सक्रिय हो जाएंगे और इराक, अफगानिस्तान के अलावा पड़ोसी मुल्कों में भी अस्थिरता बढ़ जाएगी.

    US army in Iraq
    मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सेना को इराक और अफगानिस्तान से बुला रहे हैं


    आतंकियों का डर खत्म हो जाएगा
    हाल के सालों में कताइब हिजबुल्लाह संगठन पूरे मिडिल ईस्ट और खासकर ईराक में सक्रिय हो गया है. इसके हाथों में काफी ताकत आ चुकी है. इसे थोड़ा-बहुत डर संयुक्त राष्ट्र की ओर से तैनात सैनिकों की तरफ से था लेकिन अब सेना कम होने के कारण वो डर भी चला जाएगा.

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    मिलिशिया बना सेना का अंग
    बता दें कि कताइब हिजबुल्लाह सरकारी मदद से बने इराकी अंब्रेला संगठन के तहत एक संगठन है. इस अंब्रेला में 40 मिलिशिया समूह आते हैं. ये वो समूह है, जो असैनिक हथियारबंद लोगों से बनते है. साल 2014 में इसे इस्लामिक स्टेट से लड़ने के लिए बनाया गया. लेकिन 2018 में सेना को दोबारा संगठित करने के दौरान कताइब हिजबुल्लाह को भी आधिकारिक तौर पर इराकी सेना का हिस्सा बना लिया गया.

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    सरकार की कोशिशें भी फेल
    इन समूहों को इराकी फौज का हिस्सा बनाना एक भारी गलती साबित हुआ. चूंकि समूहों को ईरान से काफी मदद मिलती रही थी इसलिए अब हुआ ये कि ईरान, ईराक के आंतरिक मामलों में घुसने लगा. इन समूहों को कंट्रोल करने की इराक के पीएम मुस्तफा अल-कदीमी ने कोशिश भी की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. चूंकि इन्हें शिया देश ईरान से सीधी मदद मिल रही है इसलिए इन्हें सरकार की खास परवाह नहीं.

    US army in Iraq
    माना जा रहा है कि सैनिकों के जाने से पड़ोसी आतंकी सक्रिय हो जाएंगे- सांकेतिक फोटो (flickr)


    कैसे हो सकते हैं हालात
    ऐसे में अगर अमेरिका भी अपनी सेना हटा लेता है तो इराक को नुकसान होगा, जिसका सीधा फायदा ईरान को मिलेगा. इस बारे में अलजजीरा मीडिया में छपी रिपोर्ट में वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट के फैलो डेविड पोलॉक कहते हैं कि अगर अमेरिका अपनी फौज को इराक में रहने दे तो मिडिल ईस्ट में उसकी स्थिति मजबूत रहेगी, जबकि उसके दुश्मन देश ईरान को आतंक मचाने का मौका नहीं मिल सकेगा. वहीं अगर फौज देश छोड़ दे तो ईराक सीधे ईरान के हाथों में जा सकता है.

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    अफगानिस्तान से भी फौजों की वापसी
    ईरान से अपने पूरे राष्ट्रपति काल में जंग छेड़े ट्रंप अब भी इसी बात पर कायम हैं कि इराक के साथ-साथ अफगानिस्तान से भी अमेरिकी फौजें हटा ली जाएं. मालूम हो कि वर्तमान में करीब 14 हजार अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में तैनात हैं. ये अफगान सैनिकों को प्रशिक्षण दे रहे हैं और चरमपंथियों के हमलों पर जवाबी कार्रवाई भी कर रहे हैं.

    US army in Iraq
    अमेरिका अपनी सेना हटा लेता है तो इराक को नुकसान होगा, जिसका सीधा फायदा ईरान को मिलेगा- सांकेतिक फोटो (pxhere)


    ट्रंप ने किया था वादा
    अफगानिस्तान को चरमपंथियों से मुक्ति दिलाने के लिए सैनिकों की तैनाती का खर्च अमेरिकी नागरिकों से टैक्स के तौर पर वसूला जाता रहा. ये काम बुश के समय से हो रहा है. साल 2016 में ट्रंप ने राष्ट्रपति पद के लिए चुनावों के दौरान इसपर एतराज जताया था. साथ ही वादा किया था कि अफगानिस्तान में अब चूंकि पहले से बेहतर हालात हुए हैं, लिहाजा वहां से अमेरिकी सैनिक बुला लिए जाएंगे.

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    पाकिस्तान भी सेना हटाने का विरोधी
    एक तरफ इराक से सेना हटने पर उसपर ईरान का खतरा मंडरा रहा है, तो दूसरी ओर अफगानिस्तान से फौज हटने पर पाकिस्तान डरा हुआ है. इमरान सरकार को डर है कि अमेरिकी सैनिकों के हटने के बाद आतंकी मजबूत हो जाएंगे और पाकिस्तान में आतंक फैलाएंगे. बता दें कि पाक और अफगानिस्तान लगभग 2500 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करते हैं जिसे डूरंड रेखा कहते हैं. इस सीमा पर और आसपास आए-दिन तनाव होते रहते हैं. इसका असर इस्लामाबाद और काबुल पर भी दिखता है. यही कारण है कि पाक पीएम इमरान खान भी कई बार कहते दिखे कि फिलहाल अमेरिकन आर्मी का अफगानिस्तान से लौटना ठीक नहीं.

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