पीरियड्स नहीं बल्कि ये थी सबरीमाला मंदिर में महिलाओं पर रोक की वजह

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी. सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 का उल्लंघन बताते हुए हटा दिया था.

News18Hindi
Updated: October 3, 2018, 3:26 PM IST
पीरियड्स नहीं बल्कि ये थी सबरीमाला मंदिर में महिलाओं पर रोक की वजह
सबरीमाला मंदिर (फाइल फोटो)
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Updated: October 3, 2018, 3:26 PM IST
सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को पूजा करने की अनुमति देने के सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के खिलाफ सैकड़ों अयप्पा श्रद्धालुओं ने मंगलवार को केरल के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन किया. उन्होंने सड़कों को जाम कर दिया. प्रदर्शनकारियों में महिलाएं भी शामिल थीं. प्रदर्शनों की शुरूआत करने वालों में 'अंतरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद' जैसे संगठन शामिल हैं. इसके संस्थापक प्रवीण तोगड़िया हैं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी. सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 का उल्लंघन बताते हुए हटा दिया था.

इस दौरान एक महिला ने पेट्रोल छिड़क कर आत्मदाह करने का प्रयास किया. लेकिन पुलिस ने उसे बचा लिया. प्रदर्शनकारियों ने तख्तियां ले रखी थीं जिनमें कहा गया था कि अदालत भगवान अयप्पा से बड़ी नहीं है. उन्होंने मांग की कि राज्य और केंद्र सरकार पुराने प्रतिबंध को बनाए रखने के लिए उपयुक्त कानून लागू करे. अयप्पा धर्म सेना के अध्यक्ष राहुल ईश्वर ने एक मार्च का आयोजन किया. कोल्लम, अलापुझा, पलक्कड और कोच्चि जिलों में भी सड़क यातायात रोका गया.

माहवारी की उम्र वाली महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर रोक के इस विवादास्पद मामले में सरकार अपना रुख बदलती रही है. केरल सरकार ने 18 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि वह उनके प्रवेश के पक्ष में हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी महिलाओं के पक्ष में ही बातें कहीं थीं.

वैसे भारत में ऐसे कई मंदिर-मस्जिद और अन्य धार्मिक स्थल हैं जिनमें कपड़ों को लेकर, धार्मिक मान्यता आदि के चलते लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध है. ऐसे ही धार्मिक स्थलों में से एक है केरल का सबरीमाला मंदिर. यहां 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध है.

सुप्रीम कोर्ट में यंग लॉयर्स एसोसिएशन की ओर इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर केस लड़ा जा रहा है. ऐसे में ज्यादातर यही बात सामने आ रही है कि मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश न होने के पीछे कारण उनके पीरियड्स हैं. जबकि यह पूरी सच्चाई नहीं है. मंदिर के आख्यान में इसके पीछे कोई दूसरी ही कहानी है.

मंदिर के देवता ने ले रखी है शादी न करने की शपथ
वेबसाइट 'फर्स्टपोस्ट' के लिए लिखे एक लेख में एमए देवैया इस आख्यान के बारे में बताते हैं. वे लिखते हैं कि मैं पिछले 25 सालों से सबरीमाला मंदिर जा रहा हूं. और लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध किसने लगाया है. मैं छोटा सा जवाब देता हूं, "खुद अयप्पा (मंदिर में स्थापित देवता) ने. आख्यानों (पुरानी कथाओं) के अनुसार, अयप्पा अविवाहित हैं. और वे अपने भक्तों की प्रार्थनाओं पर पूरा ध्यान देना चाहते हैं. साथ ही उन्होंने तब तक अविवाहित रहने का फैसला किया है जब तक उनके पास कन्नी स्वामी (यानी वे भक्त जो पहली बार सबरीमाला आते हैं) आना बंद नहीं कर देते."
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हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के तौर पर भी है ख्याति
माना जाता है कि अयप्पा किसी कहानी का हिस्सा न होकर एक ऐतिहासिक किरदार हैं. वे पंथालम के राजकुमार थे. यह केरल के पथानामथिट्टा जिले में स्थित एक छोटा सा राज्य था. वह महल जहां अयप्पा बड़े हुए, वह आज भी है और वहां भी लोग जा सकते हैं. अयप्पा के सबसे वफादार लोगों में से एक थे वावर (मलयालम में बाबर को कहते हैं). यह एक अरब कमांडर थे, जिन्हें अयप्पा ने युद्ध में हराया था.

वावर की मान्यता आज भी है. माना जाता है कि इरूमेली मस्जिद में आज भी उसकी रूह बसती है. वह 40 किमी के कठिन रास्ते को पार करके सबरीमाला आने वाले तीर्थयात्रियों की रक्षा करती है. सबरीमाला जाने वाला रास्ता बहुत कठिन है. जिसे जंगल पार करके जाना पड़ता है. साथ ही पहाड़ों की चढ़ाई भी है क्योंकि यह मंदिर पहाड़ी के ऊपर बना है. मुस्लिम भी इरूमेली की मस्जिद और वावर की मजार पर आते हैं. यह मंदिर के सामने ही पहाड़ी पर स्थित है.

मानते हैं समानता का प्रतीक
सबरीमाला भारत के ऐसे कुछ मंदिरों में से है जिसमें सभी जातियों के स्त्री (10-50 उम्र से अलग) और पुरुष दर्शन कर सकते हैं. यहां आने वाले सभी लोग काले कपड़े पहनते हैं. यह रंग दुनिया की सारी खुशियों के त्याग को दिखाता है. इसके अलावा इसका मतलब यह भी होता है कि किसी भी जाति के होने के बाद भी अयप्पा के सामने सभी बराबर हैं. साथ ही यहां पर उन भक्तों को ज्यादा तवज्जो दी जाती है, जो मंदिर में ज्यादा बार आए होते हैं न कि उनको जिनकी जाति को समाज तथाकथित रूप से ऊंचा मानता हो.

इसके अलावा सबरीमाला आने वाले भक्तों को यहां आने से 40 दिन पहले से बिल्कुल आस्तिक और पवित्र जीवन जीना होता है. देवैया लिखते हैं कि इस मंदिर के जैसे रिवाज आपको देश में कहीं और देखने को नहीं मिलेंगे. क्योंकि यहां दर्शन के दौरान भक्त ग्रुप बनाकर प्रार्थना करते हैं. एक 'दलित' भी इस प्रार्थना को करवा सकता है और अगर उस ग्रुप में कोई 'ब्राह्मण' है तो वह भी उसके पैर छूता है.

पीरियड्स से नहीं है संबंध
देवैया लिखते हैं कि ऐतिहासिक अयप्पा के अलावा भी एक पुराणों में वर्णित पुरुष को भी उनके साथ जोड़ा जाता है. जो कहता है कि अयप्पा विष्णु और शिव के पुत्र हैं. यह किस्सा उनके अंदर की शक्तियों के मिलन को दिखाता है न कि दोनों के शारीरिक मिलन को. इसके अनुसार देवता अयप्पा में दोनों ही देवताओं का अंश है. जिसकी वजह से भक्तों के बीच उनका महत्व और बढ़ जाता है. और इसका पीरियड्स से कुछ भी लेना-देना नहीं है.

मंदिर में प्रवेश को लेकर क्या कहते हैं परंपरावादी?
परंपरावादी कहते हैं कि अगर इस पूर्व कहानी पर लोगों का विश्वास नहीं, तो फिर मंदिर में श्रृद्धा के साथ दर्शन कर क्या फायदा होगा? उनका कहना है कि जज के फैसले से इसपर क्या फर्क पड़ेगा क्योंकि पूर्व कहानी में श्रृद्धा के बिना दर्शन से उन्हें पुण्य नहीं मिलेगा.


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