Bihar Election Result 2020 : तब सुशासन के नारे से बिहार की गद्दी पर आए थे नीतीश कुमार

साल 2005 में बिहार ने दो विधानसभा चुनाव देखे
साल 2005 में बिहार ने दो विधानसभा चुनाव देखे

बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम 2020 (Bihar Assembly Election Result 2020) : नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू (Nitish Kumar, Janata Dal United) ने सबसे बड़ा मुद्दा जंगलराज को खत्म कर सुशासन (Sushasan) लाने को बनाया. सुशासन के नारे की धमक लंबे समय तक कायम रही.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 10, 2020, 6:12 AM IST
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साल 2005 में बिहार ने दो विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly election in 2005) देखे. पहला चुनाव फरवरी में, जबकि दूसरा अक्टबूर 2005 में हुआ था. पहले ही चुनाव में बिहार की राजनीति पर लालू परिवार की पकड़ कमजोर पड़ी, वहीं नीतीश कुमार तगड़े प्रतिद्वंदी के तौर पर उभरे. हालांकि किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था. आखिरकार केंद्र सरकार ने विधानसभा भंग करके राष्ट्रपति शासन लगा दिया. इसके लगभग 7 ही महीने बाद दोबारा चुनाव हुए, जिसे बिहार की राजनीति में बदलाव के तौर पर भी देखा जाता है.

सबसे पहले तो एक नजर पहले चुनाव पर डालते हैं, जो फरवरी 2005 में हुआ था. लालू को 243 में से 75 सीटें मिली थीं. बीजेपी और जेडीयू मिलकर 92 ला पाए थे. ये जीत तो थी, मगर सरकार बनाने के लिहाज से अभी एनडीए दूर था. रामविलास पासवान की एलजेपी ने कमाल करते हुए कुल 29 सीटें पाई थीं. इधर सीएम पद के लिए पासवान मुस्लिम नेता चाहते थे. लेकिन ऐसा भी नहीं हो सका. राष्ट्रपति शासन के दौरान जनता अपना मन बनाती रही और इसके नतीजे जल्दी ही सामने आ गए.

साल 2005 के चुनाव को बिहार की राजनीति में बदलाव के तौर पर देखा जाता है- सांकेतिक फोटो




अक्टूबर में दूसरा चुनाव हुआ. इस बार एडीए ने प्रचार करते हुए सीएम का अपना चेहरा साफ रखा, जो नीतीश कुमार थे. चुनाव के लिए खास रणनीति तैयार हुआ, जिसमें कई सारे जुमले भी इस्तेमाल में आए. जंगल राज खत्म करना एक बड़ी बात थी. नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू और भाजपा ने बिहार की जनता को जंगल राज से आजादी दिलाने का वादा किया. साथ ही साथ सड़क, स्कूल, हेल्थ जैसी बातों को चुनावी मुद्दा बनाया. ये रणनीति जाति की लड़ाई से ज्यादा विकास की पहल लगने लगी और जनता ने इसे माना.
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नतीजा ये रहा कि साल 2005 के चुनाव में जेडीयू को 88 सीटें मिलीं. ये 20 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर थे. भाजपा ने इसके साथ गठबंधन किया था. उसके पास अपने हिस्से की 55 सीटें थीं. इस तरह से एनडीए के कुल वोट शेयर 36.11 फीसदी हो गए. दोनों पार्टियों ने मिलकर अपने दम पर विधानसभा में बहुमत हासिल किया था.

अब लालू के शासन को जंगलराज के तौर पर जाना जाने लगा


लालू की पार्टी आरजेडी को 54 सीटें मिलीं, ये अपने-आप में तो ठीक संख्या थी लेकिन ओवरऑल प्रदर्शन काफी कमजोर रहा. लालू के पारंपरिक वोट बैंक यानी खुद यादवों में भी आरजेडी के लिए खास उत्साह नहीं था. वे लगातार जाति के आधार पर 90 के दशक से परिवार को वोट कर रहे थे और इस बार कुछ नया चाहते थे. मुस्लिम मतदाता भी लालू से नाराज थे और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में इस पार्टी के नेताओं को हार का सामना करना पड़ा था.

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नीतीश की पार्टी ने सबसे बड़ा मुद्दा जंगलराज को खत्म कर सुशासन लाने को बनाया. सुशासन के इस नारे की धमक लंबे समय तक कायम रही और आज भी नीतीश को व्यंग्य में ही सही, सुशासन बाबू के नाम से विपक्षी पुकारते हैं. इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से आने वाले इस नेता ने वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में बिहार के हालात बताने जैसे तरीके अपने प्रचार के दौरान अपनाए, जो काम के साबित हुए. साथ ही चुनाव से पहले नीतीश कुमार पसमांदा मुसलमानों के लिए आरक्षण का भी समर्थन कर चुके थे. ये भी उनके पक्ष में गया. यही वजह है कि जेडीयू को 88 वोट मिले.

नीतीश की पार्टी ने सबसे बड़ा मुद्दा जंगलराज को खत्म कर सुशासन लाने को बनाया


भाजपा पहली बार बिहार में मजबूत पार्टी के तौर पर उभरी. ये राजनैतिक बदलाव का समय था. भाजपा ने लालू परिवार से बिहार के मोह भंग को पहचाना और जनता की नब्ज पकड़ ली. उन्होंने सात महीने पहले हुए चुनाव से भी सबक लिया और इस बार के प्रचार के दौरान सीएम पद के लिए सहयोगी पार्टी जेडीयू के लीडर नीतीश कुमार का नाम आगे रखा. कुल मिलाकर यहां वोट सुशासन और नीतीश के नाम पर बटोरा गया.

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कांग्रेस को इस बार केवल 9 सीटें मिल सकीं. यूपीए के तौर पर राजद और दूसरी पार्टियों से मिलने के बाद भी ये किसी तरह के बहुमत के आसपास भी नहीं था. कभी अपने दम पर बिहार की सत्ता पर काबिज रहने वाली कांग्रेस अब-तक बिहार में लालू प्रसाद की राजद के भरोसे रही. उसने नए चेहरों और नई नीतियों की भी बात नहीं की, बल्कि लगातार लालू की लाइन पर बात करती रही. जिला स्तर पर पार्टी का अपना कोई मजबूत चेहरा या एजेंडा नहीं था. नतीजा ये हुआ कि शीर्ष पर रही इस पार्टी को खुद जनता ने साइडलाइन कर दिया था. ये हाल तब भी कम बुरे थे. इसके बाद के साल में पार्टी को केवल 4 सीटें मिली थीं.
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