गहरे महासागर में खुला पृथ्वी के सुपरनोवा के पास से गुजरने का रहस्य

गहरे महासागर में खुला पृथ्वी के सुपरनोवा के पास से गुजरने का रहस्य
शोधकर्ताओं ने करोड़ो साल पहले पृथ्वी के सुपरनोवा के पास से गुजरने के प्रमाण गहरे समुद्र में पाए हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर, नासा)

गहरे समुद्र (Deep Sea) में मिले सुपरनोवा (Supernovae) के प्रमाण बता रहे हैं कि 33 हजार साल पहले पृथ्वी (Earth) कभी रोडियोधर्मी (Radioactive) धूल के बादल (Dust Cloud) से गुजरी थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 27, 2020, 10:38 AM IST
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ब्रह्माण्ड (Unvierse) में सुपरनोवा (Supernova) एक बहुत ही अहम घटना है. इससे लगभग सभी खगोलीय घटनाएं किसी न किसी प्रकार से जुड़ी हुई हैं. यहां तक कि हमारा सौरमंडल (Solar System) और हमारी पृथ्वी (Earth) का निर्माण भी इनके बाद हुआ है और दोनों पर ब्रह्माण्ड के सबसे शक्तिशाली विस्फोटों के उत्पाद आते रहते हैं. लेकिन एक चौंकाने वाली घटना में शोधकर्ताओं का गहरे महासागर (Deep Ocean) के अवसादों (Sediments) में इसके प्रमाण मिले हैं.

क्या प्रमाण मिला है
हाल ही में हुए अध्ययन में बताया गया है कि इस घटना के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं. गहरे महासागर में शोधकर्ताओं को बहुत ही कम पाए जाने वाला लोहे के आईसोटोप्स मिले हैं जो कम से कम 33 हजार साल पुराने हैं. इस शोध के नतीजे प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित हुए हैं.

किसने किया यह शोध
इस शोध में ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी (ANU) के शोधकर्ताओं ने हिंद महासागर की गहराइयों में दबे अवसादों का विश्लेषण किया है. ANU के न्यूक्लियर फिजिसिस्ट और इस अध्ययन की अगुआई करने वाले प्रोफेसर एंटोन वालनर की टीम का यह अध्ययन दर्शाता है कि 33 हजार साल पहले पृथ्वी एक रेडियोधर्मी धूल के धुंधले बादल से गुजरी होगी.



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इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि पृथ्वी एक समय सुपरनोवा के से बने बादलों के पास से गुजरी होगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर, नासा)


 

कैसे आए थे ये तत्व
प्रोफेसर वालनर के मुताबिक ऐसा लगता है कि इन बादलों में उस समय के पहले हुए तारों के बहुत ही शक्तिशाली और चमकदार विस्फोटों के अवशेष रहे होंगे. शोधकर्ताओं ने दो जगहों से बहुत सारे गहरे समुद्र के अवसादों को खोजा जो करीब 33 हजार साल पुराने हैं. इसके उन्होंने HIAF  के मास स्पैक्ट्रोमीटर का उपयोग किया. शोधकर्ताओं ने इन अवसादों में लोहे का खास तरह का आइसोटोप Iron-60 पाया जो कि सुपरनोवा के विस्फोट के दौरान बनता है.

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पृथ्वी के साथ नहीं बना था यह लोहा
शोधकर्ताओं का कहना है कि आयरन-60 आइसोटोप एक रेडियोएक्टिव तत्व है और यह पूरी तरह से 1.5 करोड़ साल में विघटित होता है. इससे साफ होता है कि अगर पृथ्वी पर आयरन-60 पाया जाता है तो वह हमारे 4.6 अरब साल पुराने ग्रह के बनने के बहुत बाद में बना होगा. इससे साफ होता है कि यह पास के सुपरनोवा से आकर हमारे ग्रह के महासागरों में नीचे जमा हो गया होगा.

और अवसादों की खोज
पिछले कुछ हजार सालों में हमारा सौरमंडल तारों के बीच की जगह पर पाए जाने वाले स्थानीय बादलों से गुजरा है, इन बादलों को लोकल इंटरस्टेलर क्लाउड (LIC) कहते हैं. इन बादलों को उत्पत्ति अभी स्पष्ट नहीं है.  यदि ये बाल पिछले कुछ लाखों साल पहले सुपरनोवा से बने थे तो उसमें आयरन -60 जरूर होगा. इसी लिए टीम ने और अवसादों के बारे खोज करने का फैसला किया.

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यह खास लोहा तारों के बीच की जगह मौजूद बादलों में होता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


कई सवाल भी उठे
इसके बाद टीम ने अवसादों में पाया गया आयरन-60 की जब पृथ्वी के बाकी पदार्थों के रेडियोएक्टिव स्तर की तुलना की तो उन्होंने पाया कि आयरन-60 बहुत कम रेडियोएक्टिव स्तर का हैं जो जितना की अंतरिक्ष में रेडियोएक्टिव स्तर है. सौरमंडल के समय और इन बादलों की मौजूदगी के स्थान आपस में तालमेल नहीं खाते हैं इससे भी कई सवाल उठते हैं. जैसे यदि ये सुपरनोवा से नहीं बने तो कहां से आए और यह कि आयरन-60 इतने समान रूप से कैसे फैल गया.

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प्रोफेसर वालनर का कहना है कि पहले पाया गया आयरन-60 करीब 26 लाख साल पुराना है और दूसरी जगह पाया गया 60 लाख साल पुरना है. इसी से लगता है कि पृथ्वी उस समय सुपरनोवा के बादलों के पास  से गुजरी होगी. हो सकता है कि यह आयरन-60 और भी ज्यादा पुराना हो.
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