एक समय ज्वालामुखियों ने बढ़ाया था महासागरों का कार्बन, अब इंसान निकले उससे आगे

5.5 करोड़ साल पहले ज्वालामुखियों (Volcanoes) ने महासागरों (Oceans) में कार्बन की मात्रा बढ़ाई थी. (तस्वीर: Pixabay)
5.5 करोड़ साल पहले ज्वालामुखियों (Volcanoes) ने महासागरों (Oceans) में कार्बन की मात्रा बढ़ाई थी. (तस्वीर: Pixabay)

कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emission) आज जिस तेजी से हो रहा है उतना साढ़े पांच साल करोड़ पहले भी नहीं हो रहा था जब पृथ्वी (Earth) के हालात आज से मिलते जुलते थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 19, 2020, 2:32 PM IST
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आज मानवीय गतिविधियों (Human activities) के कारण कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emission) जलवायु परिवर्तनों का कारक बन गया जिससे पृथ्वी पर ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) जैसे नतीजे मिल रहे हैं.  ताजा अध्ययन से पता चला है कि बहुत पहले जब पृथ्वी पर आज के कार्बन उत्सर्जन जैसे हालात थे, तब ज्वालामुखियों (Volcanoes) ने बड़ी मात्रा में महासागरों (Oceans) में कार्बन छोड़ा था लेकिन आज के मानवीय कार्बन उत्सर्जन तब के उत्सर्जन से कहीं ज्यादा हैं.

पीछे जाना अब मुमकिन नहीं
पृथ्वी पर जीवन आने के बार से कार्बन के पृथ्वी की प्रक्रियाओं में भागीदारी की अहमियत बहुत अधिक और संवेदनशील हो गई थी. इसका सीधा असर मानवीय जीवन पर दिखाई देने लगा है. आलम यह है कि इस कार्बन उत्सर्जन से कई प्रक्रियाएं ऐसे स्तर पर पहुंच गई हैं जिनका वापस पूर्व स्थिति में पहुंचना नामुमकिन है. इसें ग्रीन लैंड में हिमचादर का पिघलना प्रमुख उदाहरण है.

इंसान ने बनाया रिकॉर्ड
इस शोध में साफ तौर पर बताया गया है कि मानवीय कार्बन उत्सर्जन आज तक प्राकृतिक तौर पर भी इतना नहीं हुआ. जितना उस दौर में ज्वालामुखियों ने हजारों सालों तक महासागरों में कार्बन पहुंचाया है वह मानवीय कार्बन उत्सर्जन के आसपास तक नहीं है. अध्ययन के मुताबिक इंसान अब तीन से आठ गुना ज्यादा कार्बन उत्सर्जन कर रहा है.



कितने साल पहले थी ऐसा स्थिति
इस अध्ययन की पड़ताल प्रसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस जर्नल में प्रकाशित हुए हैं. कोलंबिया यूनिवर्सिटी के लैमोन्ट डोहेर्टी अर्थ ऑबजर्वेटरी के शोधकर्ताओं ने 5.56 करोड़ साल पुरानी महासागरीय स्थितियों का अध्ययन किया. इस काल को पैलेओसीन-इयोसीन थर्मल मैक्जिमम (PETM) के नाम से जाना जाता है.

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आज के जलावायु हालात (Climatic Conditions) लगभग वैसे ही हैं जैसा कि 5.5 करोड़ साल पहले थे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


क्या थे तब हालात
इस युग से पहले पृथ्वी बहुत ज्यादा गर्म थी. आज जितनी है उससे भी ज्यादा. बढ़ते कार्बन स्तरों ने PETM काल में ताबमान 5 से 8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा रखा था. महासागरों में  विशाल मात्रा में कार्बन जमा हो गया था जिसकी वजह से उसका पानी अम्लीय हो गया था. इससे बहुत सी समुद्री प्रजातियां खत्म हो गई थीं.

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तब कारण स्पष्ट पता नहीं थे
PETM काल के बारे में वैज्ञानिक काफी पहले से जानते है. लेकिन अब तक उन्हें इसके कारणों के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं थी. ज्वालामुखी के अलावा और भी मत सामने आए जिसमें PETM काल में कार्बन की मात्रा बढ़ने की व्याख्या दी गई, जिसमें जमी हुई मीथेन के अचानक घलने से लेकर धूमकेतु के पृथ्वी से टकराव तक शामिल है. शोधकर्ता इस का कारण भी पता नहीं पा रहे थे कि वायुमंडल में कार्बन की मात्रा कितनी और कैसे बढ़ी थी. इसका जवाब ज्वालामुखी सिद्धांत से ही मिल रहा है.

लेकिन तब और अब में है अंतर
इस अध्ययन की प्रमुख लेखिका लॉरा हेनस का कहना है कि यह शोध आज के हालातों के लिहाज से बहुत अहम है. उन्होंने कहा, “हम समझना चाहते हैं कि आज के तेजी से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन पर पृथ्वी कैसे प्रतिक्रिया करती है. PETM काल आज का हालातों की आदर्श प्रतिलिपि नहीं है, लेकिन इसकी समीपता सबसे ज्यादा है. आज हालात बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.

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आज चिंता का कारण कार्बन उत्सर्जन(Carbon Emission) की वह बहुत तेज गति (High speed) है जिससे प्राणियों (living being) का सामंजस्य बनाने नामुमकिन है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


क्या किया शोध में
पहले शोधकर्ताओं ने PETM काल के समुद्री हालात में जीवों के प्रतिक्रियाओं की तुलना उस युग के जीवाश्मों से की और पाया की वहां का कार्बन ज्वालामुखियों से आया था जो उत्तरी अमेरिका ग्रीनलैंड और उत्तरी यूरोप के इलाकों में 4 से 5 हजार साल तक सक्रिय रहे थे. जिनसे करीब 14.9 क्वाड्रिलियन टन कार्बन महासागरों में मिल गया था जो उस समय के पहले से मौजूद कार्बन से दो तिहाई ज्यादा था. इससे हवा पानी हजारों सालों तक बहुत ज्यादा अम्लीय हो गए. इससे बहुत सारी प्रजातियां भी नष्ट हो गईं.

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आज हालात उस समय से भी ज्यादा गंभीर हैं. क्योंकि इंसान ज्वालामुखियों से भी ज्यादा तेजी से कार्बन उत्सर्जित कर रहा है. ऐसा नहीं है कि महासागर इस कार्बन को अशोषित नहीं कर रहे हैं. ऐसा होता तो हालात बहुत पहले ही बेकाबू हो चुके होते. शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर कार्बन धीमी गति से जोड़ा जाए तो प्राणी खुद को बदलते हालात के मुताबिक ढाल सकते हैं, लेकिन वर्तमान दर ही सबसे ज्यादा चिंता का विषय है.
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