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    फिर बढ़ा अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत का छेद, जानिए इस साल कितना है फर्क

    अंटार्कटिका (Antartica) में ठंड के जाते जाते ओजोन परत (Ozone Layer) का छेद बड़ा तो हो रहा है, लेकिन इसके बढ़ने की दर कम जरूर हो रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
    अंटार्कटिका (Antartica) में ठंड के जाते जाते ओजोन परत (Ozone Layer) का छेद बड़ा तो हो रहा है, लेकिन इसके बढ़ने की दर कम जरूर हो रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    अंटार्कटिका (Antarctica) में ठंडे के मौसम (Cold Temperatures) आने से इस साल की ओजोन परत (Ozone Layer) का छेद फिर से बढ़ने लगा है, लेकिन पिछले कुछ सालों में कुछ फर्क आया है.

    • News18Hindi
    • Last Updated: November 4, 2020, 1:15 PM IST
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    अंटार्कटिका (Antarctica) के ऊपर बने ओजोन परत (Ozone Layer) के छेद (Hole) ने दशकों को हमारे वैज्ञानिकों को चिंतित किया हुआ है. मानव क्रियाओं द्वारा उत्सर्जित खास प्रदूषकों (Pollutants) के कारण यह छेद  बढ़ता जा रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों में इसके बढ़ने की दर घटी है. इस साल की बात करें तो यह छेद ठंडे के मौसम में फिर से बनने लगा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि लगातार ठंडे तापमान और तेज ध्रवीय हवाओं (Polar winds) से अंटार्टिका के ऊपर गहरा ओजोन छेद होने में मदद मिली है. यह छेद नवंबर तक बने रहने की उम्मीद है.

    कितना बड़ा हो गया है ये छेद
    अमेरिका के नेशनल ओसियानिक एंड एटमॉस्फियरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) और नासा के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस साल अंटार्कटिका का ओजोन छेद अपने वार्षिक आकार के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है. इसका आकार 20 सितंबर को 2.48 करोड़ वर्ग किलोमीटर हो गया था जो अमेरिका महाद्वीप के बराबर है. अवलोकनों से खुलासा हुआ है कि दक्षिणी ध्रुव के ऊपर संतापमंडल (Stratosphere) में चार मील ऊंचे स्तंभ में ओजोन पूरी तरह से गायब हो गई है.

    40 चालीस सालों में कितना फर्क
    वैज्ञानिकों का कहना है कि इस इलाके पिछले 40 साल के रिकॉर्ड के मुताबिक साल 2020 में ओजोन छेद का यह 12वां सबसे बड़ा क्षेत्रफल है. वहीं गुब्बारों के उपकरणों से लिए गए मापन के अनुसार यह पिछले 33 सालों में 14वीं सबसे कम ओजोन की मात्रा है. ओजोन के स्तरों में लगातार हो रही कमी में मोंट्रियाल प्रोटोकॉल के लागू होने से नियंत्रण हुआ है. अगर पिछले दशकों के जैसे हालात अब भी होते तो यह और भी ज्यादा बड़ा हो जाता है.



    ये दो तत्व हैं जिम्मेदार
    मैरीलैंड के ग्रीनबेल्ट स्थित नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर में अर्थ साइंसेस के प्रमुख वैज्ञानिक पॉल न्यूमैन का कहना है कि साल 2000 के उच्चतम स्तर से संतापमंडल में क्लोरीन और ब्रोमीन के स्तर सामान्य स्तर की ओर 16 प्रतिशत गिरा है.” यह क्लोरीन और ब्रोमीन के अणु ही होते हैं जो ओजोन अणुओं को ऑक्सीजन के अणुओं में बदलते रहे है.

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    पृथ्वी (Earth) पर ओजोन परत में छेद केवल अंटार्कटिका (Antarcitica) के ऊपर ही है लेकिन आर्कटिक (Arctic) के ऊपर भी ओजोन कम होने लगी है.(प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    काफी कुछ करना बाकी
    न्यूमैन का कहना है, “हमें अब भी बहुत दूर जाना है. लेकिन सुधार ने इस साल बड़ा बदलाव दिखाया है. यह छेद लाखों वर्ग मील बड़ा होता अगर संतापमंडल में उतनी ही क्लोरीन मौजूद होती.

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    ओजोन परत कितनी अहम
    संतापमंडल पृथ्वी की सतह से करीब 25 मील की ऊंचाई पर है जहां ओजोन ऑक्सीजन के तीन परमाणों से मिल कर बनता है और बहुत ही तेजी से प्रतिक्रिया करता है. इसी ओजोन की परत पृथ्वी के जीवन के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करते हुए सूर्य से आनेवाली पराबैंगनी विकिरण को रोकती है. इन विकिरणों से त्वचा कैंसर, कैट्रैक्ट, प्रतिरोधी समस्याओं में कमी जैसी समस्याओं के साथ पेड़-पौधों एवं संवेदनशील छोटे समुद्री पौधों को नुकसान पहुंचाती है जिससे वैश्विक खाद्य शृखंला को प्रभावित होती है.

    खत्म होती है ओजोन
    लेकिन ओजोन परत में सूर्य कि किरणों की मौजूदगी में वाहनों और अन्य स्रोतों से निकले प्रदूषण उत्सर्जन की फोटोकैमिकल प्रतिक्रियाएं होती हैं जिससे निचले वायुमंडल में हानिकारक स्मॉग बनता है. अंटार्कटिका में ओजोन होल दक्षिणी गोलार्द्ध में सर्दियों के अंत में सूर्य की वापसी के बाद ओजोन खत्म करने वाली प्रतिक्रियाओं के कारण बनती हैं.

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    ओजोन परत (Ozone Layer) के छेद के कारण भी अंटार्कटिका (Antarcitica) में बर्फ तेजी से पिघलने लगी है.. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    सर्दियों तक कायम रहता है यह सिलसिला
    ठंडी सर्दियों के तापमान वसंत में कायम रहता है जिससे ओजोन खत्म होने की प्रक्रिया भी कायम रहती है. इन्हीं प्रतिक्रियाओं की वजह से अंटार्कटिका में ओजोन छेद बन जाता है. इस प्रतिक्रियाओं में मानव निर्मित पदार्थों से बनी सक्रिय क्लोरीन और ब्रोमीन अहम भूमिका निभाती है.

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    क्यों कम हुई ओजोन घटने की दर
    इन प्रतिक्रियाओं के कारण संतापमंडल के बादलों में ठंडी परतें बन जाती है. यहीं ये प्रतिक्रियाएं ओजोन अणुओं को नष्ट करती हैं. गर्मी के तापमान में संतापमंडल में बादल कम बनते हैं और वे लंबे समय तक नहीं रहते जिससे ओजोन के खत्म होने की प्रक्रिया सीमित रह जाती है. सितंबर में 20 साल पहले की तुलना में जिस दर से ओजोन के घटने की दर कम हुई है उसका कारण वायुमंडल में कम क्लोरीन होना है.
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