लगातार नहीं पिघल रही है अंटार्कटिका की बर्फ, जानिए क्या मतलब है इसका

अंटार्कटिका (Antarctica) में बर्फ पिघलने (Ice Melting) की दर हमेशा एक सी नहीं रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

अंटार्कटिका (Antarctica) में बर्फ पिघलने (Ice Melting) की दर हमेशा एक सी नहीं रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

अंटार्किटिका (Antarctica) में बर्फ तेजी से तो पिघल (Ice Melting) रही है, लेकिन इसकी दर एक समान नहीं है. इसका असर पिछले शोधों के नतीजों पर भी पड़ सकता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 3, 2021, 10:42 PM IST
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जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और  ग्लोबल वार्मिंग (Global Waming) का सबसे बड़ा खतरा अंटार्कटिका (Antarctica) पर मंडरा रहा है. इससे वहां के पर्वयावरण में असंतुलन की स्थिति बनती जा रही है. अंटार्कटिका की बर्फ तेजी से पिघल (Ice Melting) रही है. वैज्ञानिकों ने पहले सोचा था कि बर्फ पिघलने की यह दर (Rate of melting) सीधी और लगातार है. लेकिन पिछले नासा सैटेलाइट (Satellite) सिस्टम के 20 साल के आंकड़ों से पता चलता है कि ताजा अध्ययन से पता चला है कि ऐसा नहीं हैं.

एक सी नहीं है बर्फ पिघलने की दर

यह विश्लेषण नासा के सैटेलाइट सिस्टम  के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र आंकड़ों के आधार पर किया गया है. इससे पता चला है कि अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने की दर हर साल अलग-अलग थी. इसका साफ मतलब यह है कि मॉडल आधारित समुद्र जलस्तर के बढ़ने को लेकर जितने अध्ययन हुए उनके नतीजों की फिर से समीक्षा करनी पड़ सकती है.

समय पर निर्भर करता है यह सब
इस अधयन के प्रमुख लेखक और ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी में सीविल, एनवयार्नमेंटल और जियोडेटिक इंजीनियरिंग के एसिस्टेंट प्रोफेसर ली वेंग का कहना है कि बर्फ की चादरें नियमित दर से नहीं बदल रही हैं. यह बदलाव बहुत जटिल है. यह बदलाव बहुत गतिक है. बर्फ के पिघलने का वेग समय पर निर्भर करता है.

क्यों खास हैं ये सैटेसाइट

यह अध्ययन जियोफिजिकल रिसर्च लैटर्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है और इसे दिसंबर में अमेरिकन जियोफिकल यूनियन की फॉल मीटिंग में पेश किया गया था. यह विश्लेषण नासा के दो सैटेलाइट वाले अभियान ग्रैविटी रिकवरी एंड क्लाइमेंट एक्पेरिमेंट (GRACE) के आंकड़ों के आधार पर किया गया है. ग्रेस दुनिया के महासागरों, जमीन के नीचे का पानी और बर्फ की चादरों में बदलाव को नापता है.



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ज्यादा बर्फबारी होने पर अंटार्कटिका (Antarctica) में बर्फ का वजन बढ़ जाता है. (फाइल फोटो)

पुराने मॉडल में विश्वसनीयता का खतरा

वो मॉडल जो समुद्र जलस्तर में बढ़ोत्तरी का पूर्वानुमान लगाते हैं. वे इस धारणा के आधार पर का काम करते हैं कि अंटार्टिका और ग्रीनलैंड के बर्फ के क्षेत्र और नियमित दर से पिघल रहे हैं. लेकिन इस विश्लेषण में  पाया गया है कि अंटार्टिका की चादरों की बर्फ के भार मे बदलाव मौसम और साल पर निर्भर रहता है, वे आंकड़े उतने विश्वसनीय होते नहीं हैं जितने समझे जाते हैं.

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अलग तरह के बदलाव

मिसाल के तौर पर किसी साल अगर बहुत ज्यादा बर्फाबारी हो जाती है, तो उससे अंटार्कटिका में बर्फ की मात्रा बढ़ जाती है. तो वहीं किसी साल वायुमंडल और आसपास के महासागर में बदलाव कम हो सकते हैं. वांग का कहना है कि अंटार्कटिका में बर्फ की मात्रा कम होती जा रही है. लेकिन यह गिरावट सपाट नहीं हैं.

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अंटार्कटिका (Antarctica) में बर्फ पिघलने की दर का महासागरों के जलस्तर पर पड़ता है. (फाइल फोटो)

यह बदलाव भी आता है

ग्राफ में यह रेखा कभी ऊंची हो जाती है तो कभी घाटी बना देती है और यह इस पर निर्भर करता है कि उस दौरान हुआ क्या है. इन्हीं बदलाव को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट के अंटार्कटिका और उसकी बर्फ का अध्ययन किया. बर्फ के भार में बदलाव या तो भारी बर्फबारी से होते हैं या फिर बर्फ के पिघलने से होते हैं. इससे गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में बदलाव हो जाता है.

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जैसे साल 2016 से 2018 के बीच पश्चिमी अंटार्कटिका में बर्फ की चादर बढ़ गई थी क्योंकि तब बहुत ज्यादा बर्फबारी हुई थी. इसी दौरान पूर्वी अंटार्कटिका में बर्फ की चादर सिकुड़ गई थी क्योंकि बहुत सी बर्फ पिघल गई थी. वांग ने बताया, “मैं यह नहीं कह रहा हूं कि अंटार्कटिका में बर्फ पिघलना गंभीर समस्या नहीं है. वास्तव में यह बहुत गंभीर है, पूरा अंटार्कटिका में बहुत तेजी से वजन कम हो रहा है. बात केवल समय के पैमाने और दर की है. हमारे मॉडलों के समुद्र जलस्तर में बदलावों के पूर्वानुमानों में यह दिखना चाहिए.

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