शाहीन बाग: क्या आम सड़कों पर है प्रदर्शन की इजाजत? ये हैं सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले

सुप्रीम कोर्ट बुधवार को शाहीन बाग में नागरकिता संशोधन कानून के विरोध में जारी प्रदर्शन के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करेगा.

दिल्‍ली में नागरिकता संशोधन कानून 2019 (CAA 2019) के खिलाफ हिंसा (Delhi Violence) और हिंसक प्रदर्शनों में मरने वालों बढ़ती हुई संख्‍या के बाद सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) को कानून व्‍यवस्‍था बरकरार रखने के लिए शाहीन बाग प्रदर्शन (Shaheen Bagh Protest) को लेकर तत्‍काल प्रभावी फैसला सुनाना चाहिए.

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    उत्‍कर्ष आनंद

    नई दिल्‍ली. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने नागरिकता संशोधन कानून 2019 (CAA 2019) के खिलाफ शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन के कारण सड़कें बंद किए जाने को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा था कि अगर दूसरे वर्ग ने किसी और वजह से यही रास्‍ता अख्तियार कर लिया तो क्‍या होगा. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के जस्टिस के. कौल और केएम जोसेफ की पीठ ने साफ किया था कि सड़क पर अनिश्चितकालीन प्रदर्शन (Indefinite Protest) को मंजूरी नहीं दी जा सकती. शीर्ष न्‍यायालय ने शाहीन बाग प्रदर्शन (Shaheen Bagh Protest) खत्‍म कराने के लिए बातचीत करने वालों का एक पैनल बनाया. हालांकि, वार्ताकार (Interlocutors) प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर कोई अंतिम नतीजा नहीं निकाल पाए. वहीं, दिल्‍ली में विरोध और हिंसक प्रदर्शन बढ़ते जा रहे हैं.

    इस बीच सवाल उठता है कि क्‍या भारत के नागरिकों को सार्वजनिक मार्गों पर प्रदर्शन की अनुमति है? अगर हां, तो उन्‍हें कैसे और कब सड़क पर प्रदर्शन की अनुमति दी जा सकती है? इसको समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों पर नजर डालते हैं...

    अन्‍य नागरिकों की आवाजाही बाधित नहीं होने पर धार्मिक जुलूस की है अनुमति
    सरकार की ओर से नियुक्‍त समिति ने 1950 में मंजूर हसन बनाम मोहम्‍मद जमान मामले में कहा था कि भारत में सार्वजनिक मार्ग (Public Roads) पर धार्मिक जुलूस निकालने का अधिकार है. लेकिन, इसमें जरूरी है कि उस मार्ग पर अन्‍य लोगों की आवाजाही बाधित नहीं होनी चाहिए. इसके बाद 1955 में सागिर अहमद बनाम यूपी सरकार (State of UP) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पब्लिक रोड्स को परिभाषित करते हुए कहा कि राज्‍य के सभी सार्वजनिक मार्ग सरकार के अधीन हैं, लेकिन सरकार की भूमिका जनता की ओर से ट्रस्‍टी की तरह है. जनता लाभार्थी के तौर पर इसका इस्‍तेमाल कर सकती है. हालांकि, किसी भी लाभार्थी के अपने अधिकार के इस्‍तेमाल के कारण दूसरे लाभार्थी के अधिकार में अड़चन पैदा नहीं होनी चाहिए. सरकार ट्रस्‍टी के तौर पर उपयोगकर्ता के अधिकारों को सीमित कर सकती है.

    अनुच्‍छेद-19(1) कभी भी और कहीं भी प्रदर्शन का अधिकार नहीं देता
    सुप्रीम कोर्ट ने 1969 में रेलवे बोर्ड बनाम नरिंजन सिंह मामले में कहा कि सरकारी परिसरों में बैठक आयोजित करना किसी भी नागरिक का मौलिक अधिकार (Fundamental Right) नहीं है. शीर्ष अदालत ने कहा, 'अभिव्‍यक्ति की आजादी, शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने की आजादी और संगठन बनाने की आजादी का यह मतलब बिलकुल नहीं है कि देश के नागरिक अपने इन मौलिक अधिकारों का कहीं भी इस्‍तेमाल कर सकते हैं.' र्सावजनिक मार्गों पर प्रदर्शन का मामला भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश हो चुका है. पहली बार 1972 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अहमदाबाद के पुलिस कमिश्‍नर बनाम हिमत लाल शाह मामले में कहा कि संविधान का अनुच्‍छेद-19(1) देश के नागरिकों को कभी भी और कहीं भी प्रदर्शन का अधिकार नहीं देता.

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा- प्रदर्शन से पूर्व अनुमति लेने में कुछ भी गलत नहीं
    पांच सदस्‍यीय संविधान पीठ (Constitution Bench) ने कहा, 'हम ये स्‍पष्‍ट कर देना चाहते हैं कि सार्वजनिक मार्ग या सार्वजनिक स्‍थल पर प्रदर्शन या बैठक करने से पहले अनुमति ले लेने में कुछ भी गलत नहीं है. अनुच्‍छेद-19(1)(b) देश के हर नागरि‍क के हितों के लिए है ताकि सभी अपने अधिकार का लाभ उठा सकें.' संविधान पीठ ने कहा कि भारत में किसी नागरिक के सार्वजनिक मार्ग पर प्रदर्शन का अधिकार उचित प्राधिकरण (Authority) के नियंत्रण का विषय है. प्राधिकरण अनुमति देने से पहले देखेगा कि बैठक या प्रदर्शन से बाकी लोगों के अधिकारों का उल्‍लंघन न हो और कानून व्‍यवस्‍था भी न बिगड़े.

    प्रदर्शन के अधिकार को हालात के मद्देनजर किया जा सकता है सीमित
    सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में अनीता ठाकुर बनान जम्‍मू-कश्‍मीर (Jammu-Kashmir) सरकार मामले में दिए फैसले में स्‍पष्‍ट किया कि प्रदर्शन का अधिकार देश के नागरिकों का मौलिक अधिकार है. लेकिन, इस पर देश की संप्रभुता और अखंडता के साथ ही आम जनजीवन व कानून-व्‍यवस्‍था पर असर के मद्देनजर पाबंदियां लगाई जा सकती हैं. वहीं, 2018 में बिमल गुरुन बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्‍पष्‍ट किया कि सामान्‍य जनजीवन पर विपरीत असर डालने वाला या अराजकता फैलाने वाला या आम लोगों के लिए खतरा पैदा करने वाले किसी भी राजनीतिक, धार्मिक या सामाजिक प्रदर्शन की अनुच्‍छेद-19(1) के तहत छूट नहीं है.

    जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के कारण लोगों की परेशानियों का किया जिक्र
    शीर्ष अदालत ने 2018 में दिए एक फैसले में कहा था कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के कारण स्‍थानीय लोगों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. प्रदर्शनों के कारण पुलिस को जगह-जगह बैरिकेडिंग करनी पड़ती है. ऐसे में लोगों को अपने वाहन आसपास की पार्किंग्‍स में खड़े कर पैदल अपने घरों तक जाना पड़ता है. इससे बुजुर्गों और बच्‍चों को सबसे ज्‍यादा परेशानी होती है. कई बार मेडिकल एमरजेंसी में प्रदर्शनों के कारण लोगों के साथ ही पुलिस को भी उन्‍हें वहां से निकालकर अस्‍पताल के लिए रास्‍ता देने में बहुत परेशानी होती है. प्रदर्शन में बड़ी संख्‍या में लोगों की मौजूदगी के कारण जाम की स्थिति पैदा होने पर आम लोगों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

    सुप्रीम कोर्ट बुधवार को करेगा शाहीन बाग प्रदर्शन मामले में सुनवाई
    सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर के अलावा दूसरी जगह पर प्रदर्शन की अनुमति देने को कहा था. इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने जहां ये साफ किया कि लोगों को प्रदर्शन अधिकार है. वहीं, उन्‍हें किसी भी जगह प्रदर्शन का अधिकार नहीं है. हालांकि, बाद में प्रदर्शनकारियों को फिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति दे दी गई. सुप्रीम कोर्ट में कल यानी बुधवार को फिर शाहीन बाग में प्रदर्शन के मामले पर सुनवाई होनी है. अब देखना ये है कि शीर्ष अदालत पिछले फैसलों जैसा ही फैसला देती है या कोई बीच का रास्‍ता निकालती है.

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