बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM की जीत के क्या मायने हैं?

बड़ी पार्टियों में कांटे की टक्कर के बीच बिहार चुनाव में 5 सीटें जीत चुकी असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की पार्टी किंगमेकर बन सकती है. साथ ही उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्ज भी मिल जाएगा.
बड़ी पार्टियों में कांटे की टक्कर के बीच बिहार चुनाव में 5 सीटें जीत चुकी असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की पार्टी किंगमेकर बन सकती है. साथ ही उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्ज भी मिल जाएगा.

बड़ी पार्टियों में कांटे की टक्कर के बीच बिहार चुनाव में 5 सीटें जीत चुकी असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की पार्टी किंगमेकर बन सकती है. साथ ही उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्ज भी मिल जाएगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 10, 2020, 10:32 PM IST
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बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar assembly election) के एग्जिट पोल साल 2015 की तर्ज पर एक बार फिर बेकार साबित हुए. एनडीए गठबंधन अनुमानों के विपरीत कमाल करता दिख रहा है. इस बीच ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) ने भी शानदार काम किया और 5 सीटों पर जीत हासिल कर ली. यानी वोटों का अंतर कम होने पर ओवैसी की पार्टी किंगमेकर का काम कर सकती है. अगर ऐसा हुआ तो हैदराबाद की ये पार्टी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पा जाएगी.

एआईएम ने पिछले दशकभर में तेजी से देशभर में खुद को बढ़ाया है. इसका पूरा नाम ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन है यानी अखिल भारतीय मुस्लिम संघ. मूलतः तेलंगाना की इस पार्टी के लीडर अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी हैं. वैसे पार्टी की जड़ें आजादी से पहले की हैं. साल 1928 में हैदराबाद को मुस्लिम राज्य बनाए रखने के लिए इसका गठन हुआ था. आजादी के बाद और वक्त के साथ पार्टी की लीडरशिप भी बदली और उसकी मजबूती भी बढ़ी.

ओवैसी मुस्लिम युवाओं में काफी लोकप्रिय हैं - (Photo-news18 English via PTI)




इसके नेता ओवैसी मुस्लिम युवाओं में काफी लोकप्रिय हैं और हमेशा ही उनकी रैलियों या दूसरे कार्यक्रमों में काफी भीड़ रहती है. लेकिन साथ ही ओवैसी का आलोचक वर्ग भी कोई छोटा-मोटा नहीं, जो उनपर लगातार सांप्रदायिकता भड़काने का आरोप लगाता रहा है. हालांकि खुद ओवैसी का कहना है कि वे मुस्लिम वर्ग की समस्याओं को सरकार के सामने लाने की कोशिशभर करते रहे हैं.
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कुछ हद तक ये बात सही भी है. लंदन से कानून पढ़कर आए ओवैसी अल्पसंख्यक वर्ग की मुश्किलों पर खुलकर बात करते हैं. वे संसद में भी किसी मामले पर अपनी नाखुशी जाहिर करने से नहीं चूकते. यही कारण है कि मुस्लिम वर्ग अब ओवैसी की पार्टी को अपने हक में बात करने वाली पार्टी के तौर पर देख रहा और तवज्जो दे रहा है. साथ ही वे दलितों को भी मुस्लिमों से जोड़ रहे हैं ताकि प्रभाव बढ़े.

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और ऐसा हो भी रहा है. इस बात की झलक पार्टी की बढ़ती पैठ से साफ है. तेलंगाना से बढ़ते हुए पार्टी का रुतबा महाराष्ट्र और अब बिहार तक आ गया है. पश्चिम बंगाल में भी मजलिस चुनाव लड़ने की बात कर रही है. अगर ये बात हो सकी तो पार्टी क्षेत्रीय न रहकर राष्ट्रीय पार्टी हो जाएगी. यानी उसे राष्ट्रीय तौर पर स्वीकारा जाएगा, जो उसके लिए काफी फायदेमंद हो सकेगा.

पश्चिम बंगाल में भी मजलिस चुनाव लड़ने की बात कर रही है


बता दें कि चुनाव आयोग ने पार्टियों को स्थानीय या राष्ट्रीय दर्जा देने के लिए कुछ नियम बना रखे हैं. वैसे इसकी तीन श्रेणियां हैं- राष्ट्रीय दल, राज्य पक्ष के दल और क्षेत्रीय दल. इन दलों को आयोग चुनाव प्रसार के लिए खास रियायतें देता है ताकि वे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचा सके. ये फायदे राष्ट्रीय पार्टी को सबसे ज्यादा मिलता है.

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राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनने के लिए कई शर्तें हैं. जैसे अगर कोई पार्टी कम से कम 3 राज्यों को मिलाकर लोकसभा की 2 प्रतिशत से ज्यादा सीटें जीत ले जाए. या लोकसभा या विधानसभा चुनाव में चार स्टेट्स में 6 प्रतिशत वोट पाए, या फिर किसी पार्टी को चार स्टेट क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर स्वीकार कर लें. अब तक देश में कुल 8 राष्ट्रीय पार्टियां हैं. इनमें राष्ट्रीय पार्टी का दर्ज पाए सबसे नई पार्टी नेशनल पीपुल्स पार्टी है, जिसे साल 2013 में मान्यता मिली.
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