वैश्विक सुपरपावर बनने की जंग में खुद टूट सकता है चीन?

वैश्विक सुपरपावर बनने की जंग में खुद टूट सकता है चीन?
चीन में कुछ खास शब्दों के इस्तेमाल पर भी सरकारी निगरानी होती है.

चीनी नेतृत्व (Chinese Leadership) को लगता है कि अमेरिका (America) और पश्चिमी देशों (Western Countries) की ताकत उनकी अर्थव्यवस्था में छिपी है. लेकिन ये पूरा सत्य नहीं है. सिर्फ बेहतर अर्थव्यवस्था और मिलिट्री के दम पर वर्ल्ड सुपर पावर नहीं बना जा सकता. चीन के साथ सबसे बड़ी समस्या उसकी छवि की है और चीन इसका बड़ा खामियाजा उठा सकता है

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कोरोना वायरस की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है. दुनिया में विकास का कीर्तिमान स्थापित करने वाले देश भी नहीं समझ पा रहे हैं कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर कैसे लाया जाए. जिस अमेरिका और ब्रिटेन की ताकत का दुनिया लोहा मानती थी, वो भी कोरोना की वजह से बिल्कुल टूटे हुए दिखे रहे हैं. लेकिन जिस देश से कोरोना वायरस पूरी दुनिया में फैला, यानी चीन, वो हर तरफ आक्रामक है. अपने सभी पड़ोसियों के साथ बिगड़े रिश्तों के अलावा चीन पश्चिमी देशों के साथ गंभीर बहसों में उलझा हुआ है.

कहा जा रहा है कि ये अगले शीत युद्ध की शुरुआत भी हो सकती है. चीन खुद को अगला वर्ल्ड पॉवर सुपरपावर बताने की कोशिश कर रहा है, जिसे फिलहाल दुनिया का कोई भी देश मानने को तैयार नहीं है. हालांकि ये सच है कि चीन ने अपनी सामरिक और आर्थिक शक्तियां बहुत मजबूत की हैं लेकिन वैश्विक सुपरपावर बनने की उसकी राह में अभी कई रोड़े हैं.

शी जिनपिंग का सपना
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर प्रकाशित एक स्टोरी के मुताबिक 2008 के चीन ओलंपिक के समय में शी जिनपिंग पोलित ब्यूरो के सदस्य हुआ करते थे और ओलंपिक की व्यवस्था उन्हीं के जिम्मे थी. इस ओलंपिक की थीम थी 'वन वर्ल्ड, वन ड्रीम'. इसे शी जिनपिंग का सपना माना जाता है. तब चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ हुआ करते थे. जिंताओ के बाद चीन के राष्ट्रपति बने शी जिनपिंग. अपने शासन के शुरुआती दिनों से ही शी जिनपिंग ने ग्रेट चाइना ड्रीम को अपना लक्ष्य बनाया हुआ है.



माओ जेदॉन्ग




दरअसल चीन में कम्यूनिस्ट क्रांति के बाद देश के सर्वोच्च नेता माओ जेदॉन्ग ने भी कुछ ऐसी ही शुरुआत की थी. तब चीन में एक कमेटी भी बनाई गई थी जिसका काम था कि दुनिया में चीन को महान कैसे बनाया जाए. ऐसा क्या किया जाए जिससे वर्ल्ड ऑर्डर चीन के इशारे पर चले. माओ ने ये सब करने के लिए चीन की सोसायटी को बाहरी दुनिया के लिए बंद कर दिया था. इसे पश्चिमी देशों में Bamboo Curtain भी कहा जाता है. लेकिन माओ ने जो पर्दा चीन की सरहदों पर डाला था वो वाकई बेहद मजबूत था. इसी पर्दे की आड़ में जमींदार किसानों पर एक बड़ी कार्रवाई के बाद कल्चरल रिवोल्यूशन जैसे घटनाएं हुईं जिनमें अनगिनत लोगों की हत्या की गई. लेकिन ये सबकुछ करते हुए माओ ने अपने देश की छवि कमजोर ही की.

आर्थिक सुधारों की नींव
बाद में  डेंग जियाओपिंग ने 80 के दशक में देश में आर्थिक सुधारों की शुरुआत की. और उस वैचारिकी को भी तोड़ा जिसके तहत चीन के इशारों पर वर्ल्ड ऑर्डर तय करने की बातें कही जाती थीं.  डेंग जियाओपिंग ने तय किया कि चीन को वर्ल्ड ऑर्डर के हिसाब से ही चलना चाहिए. उनके बाद के राष्ट्रपति भी इसी रास्ते पर चले लेकिन पहले हू जिंताओ और फिर अब शी जिनपिंग ने चीन को महान बनाने के सपने के नाम पर फिर से वही आक्रामक नीतियां अख्तियार की हैं.

डेंग जियाओपिंग


आर्थिक प्रगति सबसे बड़ा आधार
अब चीन चाहता है कि पूरी दुनिया उसी के हिसाब से भविष्य की राह तय करे. एशिया टाइम्स में प्रकाशित एक लेख कहता है कि चीन के ऐसा सोचने की वजह सिर्फ उसकी आर्थिक प्रगति है. इसे पश्चिमी मुल्क भी मानते हैं. लेकिन वैश्विक ताकत बनने के लिए सिर्फ आर्थिक प्रगति एक मात्र कारण नहीं है. अमेरिका की तरह चीन भी दुनिया की भूराजनीति में अपनी शक्ति बढ़ाना चाहता है. लेकिन चीन संभवत: इस बात से अंजान है कि अमेरिका की ताकत सिर्फ उसकी बंदूकों में नहीं छिपी है. दरअसल ये आयडिया भी डेंग जियाओपिंग के उस विचार में छिपा है जब उन्होंन कहा था-economy is the hard truth (आर्थिकी सबसे कड़वा सच है).

चीन की धारणा, पश्चिमी देश हुए कमजोर
चीन के आक्रामक होने का अभी का पूरा विचार इस बात पर टिका हुआ है कि बीते सालों में पश्चिमी ताकतवर देश विशेष रूप से अमेरिका कमजोर हुए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक भाषा का चीन उसी तरह जवाब देता है. लेकिन चीन ये भूल जाता है कि द्वीतीय विश्व युद्ध के समय में भी अमेरिका की आर्थिक स्थिति कुछ आज जैसी ही थी. वर्तमान में भी अमेरिका 1930 की मंदी जैसे हालात नहीं झेल रहा है. लेकिन 1945 से सोवियत के साथ शुरू हुए विश्व युद्ध में अमेरिका ने निर्णायक जीत हासिल की. और वो भी सिर्फ वजह से नहीं कि उसके पास ताकतवर मिलिट्री या समृद्ध अर्थव्यवस्था है. इसका मुख्य कारण ये था कि सोवियत के समक्ष अमेरिका ने दुनिया के सामने एक लिबरल नैरेटिव खड़ा किया. इस वजह से चीन पश्चिम के कमजोर होने का विवेकपूर्ण विश्लेषण नहीं कर रहा है.

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आलोचना से घबराकर आक्रामक रुख अख्तियार किया
कोरोना वायरस की वजह से दुनियाभर की आलोचना झेलता चीन बजाए सटीक जवाब देने के खुद भी उल-जुलूल हरकतें कर रहा है. जैसे उसके विदेश मंत्रालय की तरफ से आरोप लगाया गया कि अमेरिका ने उसके यहां कोरोना वायरस फैलाया है. इतना ही नहीं अपनी भूराजनीतिक ताकत बढ़ाने के चक्कर में हर पड़ोसी देश के साथ बुरे संबंधों में है. भारत के साथ सीमा विवाद के अलावा ताइवान के साथ चीन के बहुत बुरे संबंध हैं. इसी बीच हांगकांग पर की गई चीनी कार्रवाई ने पूरी दुनिया की निगाहें उसके अत्याचारी कदम की तरफ मोड़ दी है. दक्षिणी चीन सागर में वो लगातार हेकड़ी जमा रहा है जिसकी वजह से जापान की नाराजगी जगजाहिर है. चीन के संबंध सिर्फ पाकिस्तान के साथ बेहतर हैं.

चीन की नकारात्मक छवि गढ़ना आसान
चीन आर्थिक रूप से कमजोर हो रहा है. वो भले ही खुद को सर्वशक्तिशाली दिखाने की कोशिश करे लेकिन दुनिया के देश जब उसके यहां से अपनी कंपनियां हटाने का फैसला कर रहे हैं तो चीन जानता है कि इसका नतीजा क्या होने वाला है? लेकिन वो बजाए डिप्लोमेसी के हर बात का जवाब सिर्फ आक्रामक स्टेटमेंट्स से देता है. ऐसी वक्त में पश्चिमी देशों के लिए चीन की नकारात्मक छवि गढ़ना बेहद आसान है. आर्थिक प्रतिबंधों के साथ चीन के अपने देश के भीतर किए जा रहे अत्याचारों की कहानी पश्चिमी मीडिया में निकट भविष्य में तेजी के साथ बढ़ सकती है. चीन अगर युद्ध को ही हर बात का विकल्प मानता है तो भी 2019 में आई रिपोर्ट्स के मुताबिक उसकी सामरिक शक्ति अमेरिका के बराबर होने में अभी कम से कम 20 साल का वक्त लगेगा.

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