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    Assam Floods: क्यों काजीरंगा नेशनल पार्क के लिए हर साल बाढ़ जरूरी है?

    काजीरंगा पार्क में सालाना बाढ़ आना उसे बनाए रखने के लिए भी जरूरी है
    काजीरंगा पार्क में सालाना बाढ़ आना उसे बनाए रखने के लिए भी जरूरी है

    काजीरंगा नेशनल पार्क (Kaziranga National Park) की प्राकृतिक बनावट ऐसी है कि वो सालाना बाढ़ (floods) के बिना चल ही नहीं सकता.

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    ब्रह्मपुत्र नदी में आई बाढ़ से असम (floods in Assam) में भयंकर तबाही मची हुई है. लगभग सारे ही जिले बाढ़ की चपेट में हैं. इससे इंसानों के साथ जानवरों की भी जान पर बनी हुई है. काजीरंगा नेशनल पार्क में जानवरों जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं. टाइगर रिजर्व के हालात भी खराब हैं. जानवरों को बचाने के लिए रेस्क्यू अभियान शुरू हो चुका. हालांकि तबाही के बाद भी माना जा रहा है कि काजीरंगा पार्क में सालाना बाढ़ आना उसे बनाए रखने के लिए भी जरूरी है. जानिए, कैसे बाढ़ यहां का इकोसिस्टम बनाए रखने में मदद करती है और किस तरह से बाढ़ को खतरे से कम पर रोका जा सकता है.

    क्या खास है काजीरंगा पार्क में
    असम के गोलाघाट और नागांव जिले में स्थित काजीरंगा नेशनल पार्क अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता है. यानी यहां कई तरह के पशु-पक्षी होते हैं. वैसे गैंडों की यहां सबसे ज्यादा संख्या है. अपनी जैव विविधता के कारण ही साल 1985 में यूनेस्को ने इस नेशनल पार्क को विश्व धरोहर घोषित किया था. अब ब्रह्मपुत्र की बाढ़ में ये पार्क पानी से भर रहा है. यहां तक कि 86 जानवरों की मौतें हो चुकी हैं और 125 जानवरों को रेस्क्यू किया जा चुका है. इस साल आई बाढ़ को साल 1988 के बाद की सबसे भयानक बाढ़ माना जा रहा है. यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी काजीरंगा के पशुओं को बचाने की बात चर्चा में है.

    असम प्राकृतिक तौर पर ही बाढ़ के लिए संवेदनशील राज्य है (Photo-flickr)

    अब ऐसे में सवाल ये उठता है कि जानलेवा बाढ़ यहां के इकोसिस्टम की जरूरत कैसे?



    असल में असम प्राकृतिक तौर पर ही बाढ़ के लिए संवेदनशील राज्य है. खासकर काजीरंगा पार्क का टाइगर रिजर्व ब्रह्मपुत्र नदी और कार्बी आंगलोंग पहाड़ियों से घिरा हुआ है. ऐसे में एक्सपर्ट मानते हैं कि बाढ़ तो यहां आएगी ही और ये यहां के इकोसिस्टम के लिए जरूरी भी है. इस बारे में इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट में काजीरंगा नेशनल पार्क टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर पी सिवाकुमार विस्तार से बताते हैं. उनका कहना है कि काजीरंगा मूलतः नदी पर आधारित इकोसिस्टम है, न कि जमीन पर आधारित. यही वजह है कि ये पानी के बिना चल भी नहीं सकता.

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    इकोसिस्टम ही पानी पर आधारित
    बता दें कि काजीरंगा पूरी तरह से ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के आसपास जमा कछारी मिट्टी से बना हुआ है. यानी ये इलाका न केवल बाढ़ से बना है, बल्कि इसे बना रहने के लिए भी लगातार बाढ़ की जरूरत होती है. इस बारे में काजीरंगा के वाइल्डलाइफ वार्डन उत्तम सैकिया कहते हैं कि हर साल आने वाली बाढ़ से पार्क का लैंडस्केप बना रहता है. यहां की जमीन, पानी के स्त्रोत और जंगलों को बाढ़ के पानी से ही पोषण मिलता है. नदी में आई बाढ़ के कारण काजीरंगा में मछलियों की विविधता भी बनी रहती है.

    काजीरंगा पूरी तरह से ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के आसपास जमा कछारी मिट्टी से बना है


    खरपतवार हटाने को पानी जरूरी
    इतना ही नहीं, बाढ़ की मदद से नेशनल पार्क में सालभर में भारी मात्रा में उगे खरपतवार लगभग खत्म हो जाते हैं. ये काफी जरूरी है. खासकर काजीरंगा, जहां ज्यादातर पशु वनस्पतियों पर जिंदा हैं, उनके लिए जरूरी है कि घास-फूस सही क्वालिटी और उनकी जरूरत के हिसाब से हो. ऐसे में खतपतवार का होना दूसरी वनस्पतियों की बढ़त को कम कर सकता है. वहीं बाढ़ में डूबने पर खतपतवार खुद ही खत्म हो जाते हैं. यहां तक कि ये माना जाता है कि अगर सालाना आने वाली बाढ़ न होती तो तो यहां पर केवल जंगल ही रह जाता.

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    नेचुरल सलेक्शन में मदद
    एक्सपर्ट्स का ये भी मानना है कि बाढ़ एक तरह से प्राकृतिक चयन का काम करती है. बाढ़ में केवल वही जानवर जिंदा रह पाते हैं जो मजबूत हैं, युवा हैं, जबकि बूढ़े और बीमार जानवर खत्म हो जाते हैं. इस बारे में इंडियन एक्सप्रेस को सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ रिहैबिलिटेशन और कंसर्वेशन के हेड राथिन बरमान कहते हैं कि पहले हर 10 साल में एक बड़ी बाढ़ आती और वो सारे जानवर खत्म हो जाते थे जो घायल या बीमार हों. अब ये लगभग हर दूसरे साल होने लगा है. जानवर भी इसे समझते हैं और हर साल बाढ़ से बचने के लिए ऊंची पहाड़ियों पर चले जाते हैं.

    पार्क के जानवर हर साल बाढ़ से बचने के लिए ऊंची पहाड़ियों पर चले जाते हैं (Photo-pexels)


    सड़क पार करने हुए जा रही जान
    वैसे बाढ़ से खुद को बचाने की कोशिश में जानवरों की जान भी जा रही है. दरअसल काजीरंगा से कार्बी आंगलोंग के ऊंचे स्थानों तक जाने के लिए उन्हें नेशनल हाइवे 37 से गुजरना होता है. यहां पर गाड़ियों की भी काफी आवाजाही रहती है. ऐसे में सड़क पार करते हुए उनके गाड़ियों की चपेट में आने का डर रहता है.

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    अपनाए जा रहे ये तरीके
    इन्हीं सब बातों को देखते हुए बाढ़ के लिए असम सरकार पहले से ही तैयारियां करने लगती है. सेंट्रल वाटर कमीशन के जरिए नदी का जलस्तर बढ़ने पर नजर रखी जाती है. आसपास के रिहायशी इलाकों के लिए जागरुरता अभियान भी चलता है और उन्हें समझाया जाता है कि बाढ़ से परेशान जानवरों को परेशान न करें. साथ ही बाढ़ से बचने के लिए जानवर सड़क पार करके ऊपर जाने की कोशिश करते हैं, ये भी ध्यान में रखा जाता है. बारिश में नेशनल हाइवे 37 पर सेक्शन 144 लग जाता है ताकि गाड़ी की स्पीड कंट्रोल में रहे. इसके बाद भी बाढ़ में जानवरों की जान जा रही है. ये देखते हुए एक्सपर्ट कई और उपाय अपनाने पर जोर दे रहे हैं. उनका मानना है कि पार्क से पहाड़ियों तक वे आसानी से पहुंच सकें, इसके लिए सेफ पैसेज तैयार किया जाना चाहिए. इसी के मद्देनजर पिछले साल लगभग 35 किलोमीटर लंबा फ्लाईओवर बनाने की बात हुई है.
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