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पृथ्वी के सबसे पास स्थित Black Hole की हुई खोज, जानिए क्या खास है इसमें

पृथ्वी के सबसे पास स्थित Black Hole की हुई खोज, जानिए क्या खास है इसमें

यह ब्लैकहोल उन ब्लैकहोल से काफी अलग है जो अब तक खोजे गए हैं.

यह ब्लैकहोल उन ब्लैकहोल से काफी अलग है जो अब तक खोजे गए हैं.

वैज्ञानिकों को पृथ्वी (Earth) से एक हजार प्रकाशवर्ष (Light year) दूर एक ब्लैकहोल के बारे में पता चला है. बताया जा रहा है कि यह पृथ्वी के सबसे पास वाला ब्लैकहोल है.

नई दिल्ली: पिछले कुछ सालों से ब्लैकहोल (Black Hole) में वैज्ञानिक की रुचि विशेष तौर पर बढ़ी है. यह खगोलीय पिंड वैज्ञानिक ही नहीं आम इंसानों में भी कौतूहल पैदा करता है. ऐसी चीज जो प्रकाश तक को अपनी ओर खींच ले, उसके बारे में जानना नामुमकिन सा लगता है लेकिन वैज्ञानिकों ने उनके बारे में काफी कुछ अप्रत्यक्ष रूप से जाना भी है. अब वैज्ञानिकों को पृथ्वी के सबसे पास स्थित एक ब्लैकहोल के बारे में पता चला है.

किसने खोजा यह ब्लैकहोल
यूरोपियन साउदर्न ऑबजर्वेटरी (ESO) के खगोलविदों ने इस ब्लैकहोल की खोज की है. यह पृथ्वी से केवल 1000 प्रकाशवर्ष दूर है. यह ब्लैकहोल वैज्ञानिकों को HR 6819 सिस्टम के अध्ययन के दौरान दिखाई दिया है. यह टेलीस्कोपियम नक्षत्र में स्थित है.

संयोग से हुई यह खोज
दरअसल इस ब्लैकहोल को भी संयोग से ही खोजा गया. खगोलविद HR6819 सिस्टम का अध्ययन कर रहे थे. वे  इस दो तारों के सिस्टम का अवलोकन कर रहे थे कि उन्होंने पाया कि इसमें एक तीसरा पिंड भी है. उन्होंने देखा कि दो तारे एक ही सिस्टम के रूप में ब्लैकहोल की परिक्रमा कर रहे हैं. अध्ययन के सहलेखक और शोधकर्ता डाइटरिच बाडे का कहना है कि उनकी टीम को 40 दिन के समय के आंकड़ों का अवलोकन करना था जो कई महीनों का काम था.

आमतौर पर इस तरह पता लगता है ब्लैकहोल का
आमतौर पर ब्लैक होल उनके आसपास की गैस और धूल को देखते हुए खोजे जाते हैं. जब ब्लैक होल ये पदार्थ टूट कर बिखराते हैं तो बहुत शक्तिशाली संकेत उत्सर्जित होते हैं जो टेलीस्कोप पकड़ लेते हैं. लेकिन यह ब्लैकहोल बहुत ही अलग तरह से खोजा गया.

आमतौर पर ब्लैकहोल के पास ज्वलंत गतिविधि होती है, लेकिन यहां ऐसा नहीं था. (सांकेतिक फोटो)


अलग बर्ताव पाया गया इस ब्लैकहोल का
ESO का कहना है कि यह छिपा हुआ ब्लैकहोल दूसरे ब्लैकहोल की तरह बर्ताव नहीं कर रहा था जो अपने आसपास के वातावरण से ज्वलंत बर्ताव करते हैं और इसलिए काले दिखाई देते हैं. उसके बारे में अनुमान लगा पाना केवल दो तारों के जोड़ों से लग सकता था. ये तारे उसका एक ही कक्षा में चक्कर लगा रहे थे.  वैज्ञानिक थॉमस रिविनिअस का कहना है कि इस तरह का दिखाई न देने वाला पिंड जो सूर्य से चार गुना भारी हो, ब्लैकहोल ही हो सकता है.

तो कैसे पता लगा कि यह ब्लैकहोल है
जब अंतरिक्ष में कोई पिंड किसी दूसरे पिंड का चक्कर लगाता है तो स्वाभाविक है कि केंद्र में स्थित पिंड का द्रव्यमान या भार (Mass) चक्कर लगाने वाले पिंड से बहुत ही ज्यादा होगा. यह उस परिक्रमा लगाने वाली कक्षा पर भी निर्भर करता है. यदि हमें चक्कर लगाने वाले पिंड के भार का अनुमान हो जाए और उसकी कक्षा का पता चल जाए तो केंद्र में स्थित पिंड के द्रव्यमान का अनुमान लगाया जा सकता है. इस मामले में भी वैज्ञानिकों ने यही किया. उन्होंने पाया कि तारे का वजन और उसकी कक्षा के अनुसार केंद्र में स्थित पिंड का भार बहुत ही ज्यादा होगा जो कि इतन कम क्षेत्र में तब ही संभव है जब केंद्र में स्थित ब्लैकहोल हो

एक और ऐसा ही ब्लैक होल मिलने की उम्मीद
बात यहीं तक नहीं रुक रही है. वैज्ञानिकों को लगता है कि इस ब्लैकहोल की खोज उन्हें एक और सिस्टम की ओर ले जा रही है जिसका अवलोकन चल रहा है. एक अन्यशोधकर्ता मैरीएन हेइदा का कहना है कि टीम ने एक एक और LB-1 नाम का सिस्टम देखा है जिसमें ऐसा ही ब्लैकहोल हो सकता है. LB-1 ज्यादा दूर है.

क्या मिलेगी इनसे जानकारी
इसका मतलब है कि इस तरह के और भी कई ब्लैकहोल हो सकते हैं जिसका तारों के जोड़े चक्कर लगाते हों. इनसे काफी कुछ जानकारी मिल सकती है. इनके अध्ययन से पता चल सकेगा कि ब्लैकहोल का चक्कर लगा रहे तारों का निर्माण कैसे होता है. इन दुर्लभ तारों का भार शुरू में सूर्य से 8 गुना ज्यादा होता है और बाद में सुपरनोवा विस्फोट से इनका अंत होता है और फिर ब्लैकहोल बन जाते हैं.

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Tags: Black hole, Research, Science, Space

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