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खगोलविदों को मिले 6 ग्रह, जानिए किस खास तरह से लगाते हैं अपने सूर्य का चक्कर

6 ग्रहों का यह सिस्टम अपने तारे  का चक्कर लगाने में खास तालमेल रखता है.
6 ग्रहों का यह सिस्टम अपने तारे का चक्कर लगाने में खास तालमेल रखता है.

वैज्ञानिकों को छह ग्रहों का एक तंत्र (System of Six Planet) मिला है. ये ग्रह एक खास अंदाज में ही अपने सूर्य का चक्कर लगाते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 20, 2020, 8:03 PM IST
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नई दिल्ली. इंसान ने हमारे ब्रह्माण्ड (Universe) में कई तारों (Stars) और उनसे संबंधित रहस्यों के बारे में जाना है और इस बारे में और गहराई से जानने के लिए नई कोशिशें कर रहा है. इतना ही नहीं शोधकर्ता अब तक अंतरिक्ष में कई सालों से नजर बनाए रखे हैं जिससे वे नई बातें जानने की कोशिश करते रहते हैं. अब सात साल तक की निगरानी के बाद वैज्ञानिकों ने एक तारे और उसका चक्कर लगाने वाले ग्रहों के बारे में दिलचस्प जानकारी हासिल की है.

88 प्रकाश वर्ष दूर तारे और उसके ग्रहों का है मामला
वैसे तो ब्रह्माण्ड में बहुत से तारे और उनके ग्रहों के बारे में पता किया है, लेकिन HD 158259 नाम का तारा कुछ अलग ही है. 88 प्रकाश वर्ष दूर इस तारे और उसके ग्रहों में खास बात है. इनमें आपसी सामंजस्य बेहतरीन है.

सात साल से जमा कर रहे हैं आंकड़े
खगोलविद इस सौर मंडल का पिछले सात साल से अवलोकन कर रहे हैं. इसका तारा हमारे सूर्य से थोड़ा सा बड़ा है और इसके छह ग्रह हैं एक पृथ्वी से बड़ा है और पांच नेप्च्यून से छोटे ग्रह हैं. लेकिन इन ग्रहों की विशेषता यह है कि इनका अपने सूर्य का चक्कर लगाने का तरीका बहुत ही सामंजस्य भरा है. यानी ये बहुत ही बढ़िया तालमेल से अपने सूर्य का चक्कर लगाते हैं.



Galaxy
अंतरिक्ष में बहुत से ग्रह तंत्र हैं लेकिन यह कुछ खास है.


ग्रहों की गति का तालमेल
इस अनोखी जानकारी से खगोलविदों को सौरमंडल के निर्माण में समझने तो मदद मिलेगी ही और यह भी समझने में मदद मिलेगी कि वे अपने सूर्य के चक्कर लगाने का तरीका कैसे हासिल करते हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार ग्रहों के तालमेल को ऑर्बिटल रेजोनेंस (Orbital resonance) कहा जाता है.

क्या होता है यह ऑर्बिटल रेजोनेंस
जब किसी तारे के ग्रहों की कक्षा में उनकी चाल का आपस में संबंध होता है तो उसे ऑर्बिटल रेजोनेंस कहते हैं. ग्रह एक दूसरे पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव भी डालते हैं.  आमतौर पर यह सौर मंडल में देखा नहीं जाता है. हमारे सौर मंडल में भी केवल प्लूटो और नेप्च्यून में ही इस तरह का व्यवहार पाया जाता है. इसको अक्सर अनुपात में प्रदर्शित किया जाता है. प्लूटो और नेप्च्यून का ऑर्बिटल रेजोनेंस 2:3 होता है. जिसका मतलब है कि जब प्लूटो सूर्य के दो चक्कर लगाता है, तब तक नेप्चयून तीन चक्कर लगा लेता है.

तो क्या खास है इस सौरमंडल में
HD 158259 तारे में हर ग्रह का अपने बाद के ग्रह से ऑर्बिटल रेजोनेंस एक ही है और यह 3:2. है. यह कालानुपात (Period Ration) के मुताबिक 1.5 होगा. यानी जब अंदर का ग्रह तीन चक्कर लगाता है तो उसके ठीक बाद ग्रह दो चक्कर लगाता है. ऐसा सभी ग्रहों के साथ है.

पृथ्वी से दूर कई ग्रह ऐसे हैं जो बहुत अनोखी जानकारी दे सकते हैं.


कहां हुआ यह अध्ययन
स्विट्जरलैंड के जिनेवा यूनिवर्सिटी के नाथन हारा की अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम ने TESS  एक्जोप्लेने हंटिंग स्पेस टेलीस्कोप और सोफी स्पेक्टोग्राफ का उपयोग करते हुए आंकड़े जमा किए. उन्होंने हर ग्रह की कक्षा का सटीक समय निकाला है. उनके बीच बहुत नजदीकी मामला है.

कैसे हो गया यह खास
सबसे नजदीक के ग्रह, जिसे सुपर अर्थ (पृथ्वी से दोगुने आकार है) कहा जा रहा है, की कक्षाएं 2.17, 3.4, 5.2, 7.9, 12 और 17.4 दिन की हैं. उनके कालानुपात (Period Ratio) 1.57, 1.51, 1.53, 1.51 और 1.44 हैं. ये भले ही सटीक रेजोनेंस न हो, लेकिन HD 158259 को अतिविशेष सौरमंडल जरूर बना रहा है.

क्या पता चलता है इस रेजोनेंस से
ऐसा कुछ और सौरमंडल में भी पाया गया है जब रेजोनेंस नजदीकी तौर पर समान हो. शोधकर्ताओं का मानना है कि इससे यह संकेत मिलता है कि इन ग्रहों का निर्माण वहां नहीं हुआ होता जहां पर वे अभी मौजूद हैं. ऐसे मामलों में ग्रहों का निर्माण तारों से दूर होता है और उसके बाद वे अपने तारे के पास आते हैं. ऐसे में रेजोनेंस की भूमिका बढ़ जाती है.यह जानकारी सौरमंडल के निर्माण प्रक्रिया के बारे में आगे बहुत मददगार हो सकती है.

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