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पहली बार इतनी तेजी से 'ऑन ऑफ’ होते दिखा सफेद बौने तारा, जानिए क्या है मामला

पहली बार इतनी तेजी से 'ऑन ऑफ’ होते दिखा सफेद बौने तारा, जानिए क्या है मामला

आमतौर पर इस तरह के सफेद बौनों (White Dwarf) में चमक में ऐसा बदलाव नहीं दिखता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

आमतौर पर इस तरह के सफेद बौनों (White Dwarf) में चमक में ऐसा बदलाव नहीं दिखता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

किसी सफेद बौने (White Dwarf) में पहली बार चमक (Brightness) इतनी तेजी से कम ज्यादा होती दिखी. शोधकर्ताओं ने इसका कारण पास के साथी तारे (Companion) से आने वाली सामग्री से इसका संबंध बताया.

    सफेद बौने (White Dwarf)  तारों की वह अवस्था होती है जो तारों के मरने के बाद बनती है. यानि तब जब तारों का खुद का ईंधन खत्म हो जाता है. सफेद बौनों का अध्ययन तारों के जीवन चक्र (life cycle of stars) में बहुत अहमियत होती है. वैसे तो इन तारों का अध्ययन धरती के टेलीस्कोप या फिर अंतरिक्ष में स्थापित हबल जैसी वेधशाला से ही होती है. लेकिन इस बार खगोलविदों ने ग्रह की खोज करने वाले सैटेलाइट से खास सफेद बौने को खोज निकाला है जो अचानक चमकना (Brightening of Star) बंद कर फिर चमकने लगता है.

    नासा के TESS के आंकड़ों का अध्ययन
    पहली बार इस तरह की खोज यूके की डरहम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की टीम ने की है. इसके लिए शोधकर्ताओं ने नासा का ट्रांजिटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट (TESS) के आंकड़ों का उपयोग किया. जब तारों का हाइड्रोजन ईंधन खत्म हो जाता है तब सफेद बौनों की अवस्था आती है. इनका आकार पृथ्वी के जितना होता है, लकिन भार सूर्य के बराबर ही होता है.

    अकेले नहीं होते तारे
    आमतौर पर तारे अकेले नहीं होते है और उनका साधी तारे भी होता है. इस सफेद बौने के मामले में भी एक साथी तारा है जिससे यह पदार्थ निगलने का काम कर रहा है. खगोलविदों ने देखा है कि इस सफेद बौने की चमक आधे घंटे में खो जाती है. इससे पहले जो सामाग्री निगलने वाले सफेद बौनों में ऐसा कुछ दिन से लेकर कई महीनों तक देखने को मिला था.

    पदार्थ संचयन की प्रक्रिया
    इस सफेद बौने की चमक निगले जाने वाले पदार्थ पर निर्भर होती है. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इससे उन्हें पदार्थ संचयन यानि (Accretion) की पूरी प्रक्रिया समझने में मदद मिले जो ब्लैक हो, सफेद बौनों और न्यूट्रॉन तारों में खास तौर से दिखाई देती है जिसमें ये सब अपने पड़ोसी तारों का पदार्थ “खा” जाते हैं. इस अध्ययन की पड़ताल नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित हुई हैं.

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    शोधकर्ताओं को यह सफेद बौना (White Dwarf) दो तारों के सिस्टम में दिखाई दिया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    दो तारों  का तंत्र
    शोधकर्ताओं ने यह परिघटना एक सफेद बौने के द्विज तंत्र में अवलोकित की है जिसे TW पिक्टोरिस कहा जाता है. यह पृथ्वी से 1400 प्रकाशवर्ष दूर स्थित है.  टी डब्ल्यू पिक्टोरिस में एक सफेद बौना है जिसे पास की एक्रीशन डिस्क से पदार्थ मिल रहा है. इस डिस्क में पस के छोटे साधी तारे से हाइड्रोजन और हीलियम मिल रही है. जब यह बौना पदार्थ निगलता है, यह चमकीला हो जाता है.

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    सफेद बौने की मैग्नेटिक फील्ड
    टेस के सटीक अवलोकन विस्तृत आंकड़ों का उपयोग आमतौर पर सौरमंडल के बाहर के ग्रहों की खोज जाती है. डरहम के शोधकर्ताओं की टीम ने एक चमक का दिखना और गायब होना देखा जो कभी भी एक्रीटिंग सफेद बौनों में इतने कम समय में नहीं देखी गई. लेकिन पास के तारे से आने वाला पदार्थ लगातार आ रहा था. शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे सफेद बौने की मैग्नेटिक फील्ड में बदलाव हो सकता है.

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    शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि संचयन वाले (Accretion) पिंडों का अध्ययन कर में यह खोज मदद करेगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    मैग्नेटिक गेटिंग
    .चमक ज्यादा  होने पर सफेद बौना पदार्थ ज्यादा निगलता है लेकिन अचानक यह तंत्र बंद हो जाता है और चमक बहुत फीकी हो जाती है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इसकी वजह इसके चुंबकीय क्षेत्र के घुमाव है जो इतना तेज हो जाता है कि वह संचयन क्रिया रोक देता है जिससे चमक कम हो जाती है. यानी यही घुमाव वही ईंधन को संचयन डिस्क में जाने से नियंत्रित करता है. इस प्रक्रिया को मैग्नेटिक गेटिंग कहते हैं.

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    शोधकर्ताओं का कहना है कि कुछ समय बाद पदार्थ निगलने की क्रिया फिर शुरु हो जाती है और चमक बढ़ जाती है. चमक में बदलाव एक्रीटिंग सफेद बौनों में आम बात है, लेकिन यह धीमी प्रक्रिया होती है.  जो दिन से लेकर महीनों तक चलती है. लेकिन टी डब्ल्यू में ऐसा हर 30 मिनट में हो रहा है जिससे बत्ती जलने बुझने का अहसास होता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे संचयन क्रिया वाले पिंडों के अध्ययन में मदद मिलेगी.

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