खगोलविदों ने खोजा धरती से टकराने वाले दो करोड़ साल पुराने क्षुद्रग्रह का सफर

वैज्ञानिकों ने इस क्षुद्रग्रह (Asteroid) की चंद्रमा की दूरी से पृथ्वी तक पहुंचने की सारी तस्वीरें ली थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

वैज्ञानिकों ने इस क्षुद्रग्रह (Asteroid) की चंद्रमा की दूरी से पृथ्वी तक पहुंचने की सारी तस्वीरें ली थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

पृथ्वी (Earth) से दो साल पहले टकराए 2.2 करोड़ साल पुराने क्षुद्रग्रह (Asteroid) ने धरती तक का सफर कैसे किया, खगोलविदों ने यह पता लगा लिया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 24, 2021, 7:24 PM IST
  • Share this:
हमारे खगोलविदों ने बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए पुराने क्षुद्रग्रह (Asteroid) के सफर की पूरी कहानी पता लगाई है. इस क्षुद्रग्रह की खास बात यह है कि इसने 2.3 करोड़ साल का सफर तय कर पृथ्वी (Earth) के अफ्रीका में कालाहारी रेगिस्तान में उल्कापिंडों (Meteorites) की बारिश की थी. यह पहली बार है कि वैज्ञानिकों ने स्रोत से ही किसी क्षुद्रग्रह के पूरे रास्ते का पता लगाया है.

दो साल पहले टकराया था

2018 LA नाम का यह क्षुद्रग्रह पृथ्वी के कालाहारी रेगिस्तान के बोट्सवाना में 2 जून साल 2018 से टकराया था जिसके दौरान इसने बिखरकर उल्कापिंडों की बारिश की थी. यह पहली बार है जब वैज्ञानिकों ने किसी क्षुद्रग्रह या उल्कापिंड जैसे पिंड की पृथ्वी तक की यात्रा का पूरा ब्यौरा निकालने में सफलता पाई  है. खगोलविदों को कहना है कि ऐसा मौका हमें केवल दूसरी बार मिला है जब कोई क्षुद्रग्रह अंतरिक्ष से पृथ्वी में प्रवेश करने से पहले उल्का में बदल गया था.

कहां से आया था ये
पुराने अवलोकनों के आधार पर नए अध्ययन में उल्कापिंडो के टुकड़े और अन्य दूसरे कारकों को शामिल कर 2018 LA के उद्गम स्थल का पता लगाया गया. यह क्षुद्रग्रह गुरू और मंगल ग्रह के बीच क्षुद्रग्रह की पट्टी में घूमने वाले  पिंड वेस्ता से आया था. वेस्ता हमारे सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा क्षुद्रग्रह है. केवल यही एक ऐसा क्षुद्रग्रह है पृथ्वी से नंगी आंखों से दिखाई देता है.

नासा ने रखी नजर

यह क्षुद्रग्रह पृथ्वी के वायुमंडल में जब पहुंचा था  उस समय उसीक गति 37 हजार मील प्रति घंटा थी और उस समय यह मध्य कालाहारी रेगिस्तान के ऊपर टूट कर बिखर गया था जिससे उल्कापिंडों की बारिश हुई थी. नासा के वैज्ञानिकोंने इस पिंड की चंद्रमा की दूरी से हवाई और एरीजोना के टेलीस्कोपों से इस पर निगरानी रखी.



Earth, NASA, Asteroid, Meteorites, Kalahari Desert, Journey of Asteroid, NEO, Near Earth Objects, Asteroid Belt,
यह क्षुद्रग्रह (Asteroid) पृथ्वी के वायुमडंल में आने के बाद उल्का में बदल गया था. (फाइल फोटो)


ऑस्ट्रेलिया से रखी गई नजर

पृथ्वी से टकराने के बाद शोधकर्तां ने ऑस्ट्रेलिया के खगोलविदों से न्यू साउथ वेल्स के स्कैयमैपर टेलीस्कोप की तस्वीरों की जांच करने को कहा. यह टेलीस्कोप ब्लैक होल के अध्ययन के लिए उपोयग में लाया जाता है और द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में उसने छह टन के क्षुद्रग्रह की उड़ान का रास्ता रिकॉर्ड किया.

पृथ्वी के बाहर से सतह तक पहुंच रही है हर साल बड़ी मात्रा में धूल

क्षुद्रग्रह पट्टी की संचरना पता लगेगी

पर्थ की कर्टिन यूनिवर्सी के खगोलविद हैड्रिन डेविलेपोइक्स बताते है कि इस क्षुद्रग्रह की यात्रा का विश्लेषण बताताहै कि वह वेस्ता से निकलने से पहले उसकी सतह के नीचे काफी गहराई में दफन था. इस शोध से क्षुद्रग्रह की पट्टी की संरचना का नक्शा भी बनाना संभव हो जाएगा और हम यह पता लगा सकेंगे कि पृथ्वी के लिए खतरा बनने वाले क्षुद्रग्रह किससे बने हैं.

Earth, NASA, Asteroid, Meteorites, Kalahari Desert, Journey of Asteroid, NEO, Near Earth Objects, Asteroid Belt,
यह क्षुद्रग्रह (Asteroid) गुरू और मंगल के बीच स्थिति क्षुद्रग्रह की पट्टी के पिंड वेस्ता से आया था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


उल्कापिंड से मिले स्रोत के सुराग

कालाहारी में गिरे टुकड़ों ने शोधकर्ताओं को और ज्यादा सुराग दिए. स्पैक्ट्रोस्कोपी और माइक्रोटोमोग्राफी तकनीकों का उपयोग कर वे यह पता लगाने में सफल रहे कि ये पत्थर साल 2015 में गिरे सारीसिसेक उल्कापिंड के जैसे ही थी जो वेस्ता से आया था. शोध में लगी एक टीम के सदस्य खगोलविद पीटर जेनिस्केन्स ने बताय कि अरबों साल पहले वेस्ता पर हुए दो विशाल टकराव ने बहुत से खतरनाक क्षुद्रग्रह पैदा किए. इन उल्कापिंडों ने इस टकराव की जानकारी दी.

रूस ने शुरू की ISS छोड़ने की तैयारी, जानिए वह क्यों कर रहा है ऐसा

2015 और 2018 में पृथ्वी पहुंचने वाले उल्कापिंड हॉर्डाइट यूक्राइट डियोजेनाइट (HED) उल्कापिंड थे. इन्हें ये नाम उनकी रासायनिक और खनिज संरचना के कारण दिया गया था. रासायनिक विश्लेषण और कम्प्यूटर मॉडलिंग जरिए शोधकर्ता इन उल्कापिंडों के रास्तों को इनके स्रोत तक ले जाने में सफल हुए.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज