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गर्म होती धरती की वजह से अंगारों पर चलने को मजबूर ऑस्ट्रेलिया

Kinshuk Praval | News18Hindi
Updated: January 19, 2020, 11:13 PM IST
गर्म होती धरती की वजह से अंगारों पर चलने को मजबूर ऑस्ट्रेलिया
ऑस्ट्रेलिया में आने वाले दिन भी अंगारों पर चलने के बराबर साबित होंगे

ऑस्ट्रेलिया (Australia) की त्रासदी (Bushfire) को देखकर ये कहने वाले बहुत मिल सकते हैं कि ऐसा पहले भी हुआ है. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि ऐसी तबाही से बचने के लिए क्या कभी कोई तैयारी हो सकेगी?

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  • Last Updated: January 19, 2020, 11:13 PM IST
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ऑस्ट्रेलिया (Australia) इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी से जूझ रहा है. जंगलों में लगी आग (Bushfire) के सामने ऑस्ट्रेलियाई सरकार की हैसियत किसी तमाशबीन सी नज़र आती है. 1 लाख वर्ग किलोमीटर ज़मीन जल गई, पचास करोड़ से ज्यादा जीव-जंतु जलकर मारे गए, आसमान लाल धुएं के गुबार में ढक गया, 18 सौ घर ख़ाक हो गए तो हज़ारों लोगों को अपना घर छोड़कर जाने को मजबूर होना पड़ा. अब तक जंगलों की आग बुझाने की तमाम कोशिशें महज़ गर्म तवे पर पानी छिड़कने जैसी ही साबित हुईं.

ऑस्ट्रेलिया में हर साल ही जंगलों में आग लगती है और वहां की सरकार हर साल ही जरूरी ऐहितयाती कदम उठाकर आग पर काबू पा लेती है. लेकिन इस बार आग पर किसी का भी ज़ोर नहीं चल सका. आग से 63 लाख हेक्टेयर जंगल और पार्क बुरी तरह जल गए. हज़ारों फायरफाइटर्स और वॉलिंटियर्स भी आग पर काबू नहीं पा सके. आग बुझाने की कोशिश में 28 लोगों की मौत हो गई जिसमें फायरकर्मी भी शामिल हैं. सितंबर 2019 से लगी आग नए साल में भी तबाही की लपटों के साथ आगे बढ़ती रही. आग का असर पूरे देश में है लेकिन सबसे ज्यादा न्यू साउथ वेल्स और विक्टोरिया के इलाके प्रभावित हुए. न्यू साउथ वेल्स के आसपास के 250 किमी के इलाकों को खाली कराकर वहां आपातकाल लागू कर दिया गया है.

युद्धस्तर पर जुटा है आग बुझाने में ऑस्ट्रेलिया
आग बुझाने के लिए युद्ध स्तर पर ऑस्ट्रेलिया जुटा हुआ है. इस आग को बुझाने के लिए 500 से ज्यादा एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल किया जा रहा है. जिसमें बड़े एयर टैंकर भी हैं जो कि तेज़ बौछार से पानी छोड़ते हैं. कई हेलिकॉप्टर भी जलते जंगलों के ऊपर लगातार उड़ान भर रहे हैं. ऑस्ट्रलियाई सरकार ने विदेशों से भी किराए पर पानी बुझाने के लिए अतिरिक्त एयरक्राफ्ट मंगाए हैं.

हज़ारों फायरकर्मी जान पे खेलकर आग बुझाने में जुटे हुए हैं
हज़ारों फायरकर्मी जान पे खेलकर आग बुझाने में जुटे हुए हैं


तीनों सेनाओं के तकरीबन 3 हज़ार जवान, 6 हज़ार से ज्यादा दमकलकर्मी और हज़ारों वॉलेंटियर्स अपनी ताकत झोंक रहे हैं. जल सेना क्रूज़र का इस्तेमाल कर रही है तो वायुसेना भी अपने विमानों से पानी बरसाने का काम कर रही है. उसके बावजूद आग बुझाने की कोशिश दिल जलाने जैसी साबित हो रही है. ऐसा नहीं कि अग्निकाल से गुज़र रहा ऑस्ट्रेलिया आग बुझाने के संघर्ष में अकेला है बल्कि उसके साथ अमेरिका, कनाडा और न्यूजीलैंड भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ हैं. उसके बावजूद ये जंग आसान नहीं है.

आग का अंदाज़ा आंकने में सरकार से हुई चूकऐसे में सवाल ये है कि आखिर आग कैसे ख़ामोशी से खतरनाक होती चली गई? आखिर सरकार को इसकी विभीषिका का अंदाज़ा क्यों नहीं हो सका?

दस साल पहले साल 2009 में भी ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया में जंगलों में आग लगी थी जिसमें 180 लोगों की मौत हो गई थी. लेकिन दस साल बाद ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में आग का उससे भी ज्यादा भयावह दौर लौटेगा इसकी कल्पना खुद ऑस्ट्रलियाई सरकार को भी नहीं थी. जब ऑस्ट्रेलिया का जंगल जल रहा तो प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन आग की तबाही से अनभिज्ञ विदेश में छुट्टियां मना रहे थे. हालांकि तमाम आलोचनाएं झेल रहे प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन इस आग को जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मानते हैं.

जंगलों की आग का सबसे बड़ा विलेन बढ़ता तापमान
दरअसल, ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में आग लगने की घटना नई नहीं है. क्लाईमेट चेंज का असर ऑस्ट्रेलिया में तापमान में बढ़ोतरी के रूप में दिख रहा है. पिछले सौ साल में 2019 सबसे गर्म साल रहा है. 1910 के बाद 2019 में तापमान सामान्य से 1.52 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा. अकेले दिसंबर 2019 में ही ऑस्ट्रेलिया में तापमान में असामान्य बढ़ोतरी दर्ज की गई. ऑस्ट्रेलिया के राज्यों में तापमान 40 डिग्री के पार था तो कई इलाकों में तापमान 50 डिग्री के भी पार रहा है.

50 करोड़ से ज्यादा जीव-जंतु आग में जलकर मारे गए हैं
50 करोड़ से ज्यादा जीव-जंतु आग में जलकर मारे गए हैं


पिछले कुछ सालों में ऑस्ट्रेलिया में गर्म और सूखी गर्मियों के लंबे दिन रहे हैं जिनसे जलवायु परिवर्तन का प्रभाव देखा जा सकता है. बढ़ते तापमान और सूखे की वजह से ऑस्ट्रेलिया के अलग अलग इलाकों में आग भड़कती रही है. न्यू साउथ वेल्स और विक्टोरिया के इलाकों में शुष्क मौसम और ज्यादा तापमान के बीच तेज़ हवाओं ने आग बढ़ाने का काम किया. गर्म तापमान और शुष्क मौसम की वजह से झाड़ियों वाले इलाके और घने जंगल तेजी से आग की चपेट में आते चले गए.

हिंद महासागर के तापमान से बिगड़ा ऑस्ट्रेलिया का मौसम
ऑस्ट्रेलिया में गर्म हवाओं और सूखे के पीछे हिंद महासागर की द्विध्रुव (IOD) स्थिति को कारण माना गया है. ध्रुव (IOD) स्थिति की वजह से समुद्र के पश्चिमी आधे हिस्से में सतह का तापमान गर्म तो पूर्व में ठंडा है. दोनों के तापमान का फर्क पिछले 60 साल में सबसे ज्यादा शक्तिशाली माना गया है. इसकी वजह से ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ा है और गर्म हवाएं चल रही हैं. जबकि ऑस्ट्रेलियाई मौसम विभाग अलनीनो और लॉ-नीना मौसमी परिघटना को भी जंगलों की आग के लिए जिम्मेदार मानता है.

सूखे जंगलों में बिजली गिरने से लगती है आग
आग लगने के पीछे सिर्फ आम लोग ही जिम्मेदार नहीं होते हैं बल्कि बिजली गिरने की वजह से भी जंगलों में आग लग जाती है जो कि हवा के जरिए धीरे-धीरे आगे बढ़ती जाती है. दरअसल, जंगलों में लगी आग से उठता धुआं और फिर धुएं से बनते बादल और बाद में बादलों के आपस में घर्षण से बनती बिजली ही जंगलों में गिरकर नई आग जलाने का काम करती है. ऑस्ट्रेलिया के कई इलाके सूखा प्रभावित हैं जिस वजह से वहां की सूखी ज़मीन, झाड़ियों और जंगलों में आग पकड़ना आसान रहता है.

अब सबकुछ बारिश के भरोसे
हालांकि हाल ही में हुई बारिश से हालात में कुछ सुधार आया. लेकिन आने वाले समय में तापमान के फिर बढ़ने की चेतावनी जारी हुई है जिससे की आग के फिर से भड़कने का खतरा है. ऐसे में उम्मीद उसी आसमान से है जो बारिश की बूंदों से जंगलों के ज़ख्म पर मरहम लगा सके और धधकती ज़मीन को कुछ हद तक ठंडा कर सके ताकि ऑस्ट्रेलिया के कोआला और कंगारू विलुप्त होने से बच सकें.

50 करोड़ से ज्यादा जीव-जंतुओं की मौत की वजह से न मालूम कितने दुर्लभ जीव भी हमेशा के लिए विलुप्त हो चुके होंगे. अब किसी तरह बचे हुए बेजुबानों के सामने खाने और पानी की समस्या बड़ी चुनौती है. पानी की ही कीमत अब ऑस्ट्रेलिया में वो हज़ारों ऊंट चुका रहे हैं जिनके कत्लेआम का वारंट सरकार जारी कर चुकी है.

ऑस्ट्रेलिया की त्रासदी को देखकर ये कहने वाले बहुत मिल सकते हैं कि ऐसा पहले भी हुआ है. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि ऐसी तबाही से बचने के लिए क्या कभी कोई तैयारी हो सकेगी? ऑस्ट्रेलिया में जिस रफ्तार से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ेगा वैसे ही बुशफायर की घटनाओं में भी इज़ाफ़ा होता रहेगा. ऐसे में चाहे इंसान हो या फिर बेज़ुबान, ऑस्ट्रेलिया में आने वाले दिन भी अंगारों पर चलने के बराबर साबित होंगे.

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First published: January 19, 2020, 7:41 PM IST
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