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Ayodhya case: राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद केस में ये थे प्रमुख पक्षकार

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Updated: November 9, 2019, 7:18 PM IST
Ayodhya case: राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद केस में ये थे प्रमुख पक्षकार
अयोध्या विवादित ढांचे में पूजा करने की मांग को लेकर गोपाल सिंह विशारद में याचिका दायर की थी.

अयोध्या में विवादित ढांचे को लेकर कानूनी लड़ाई 1950 में शुरू हुई थी. भगवान राम के भक्त गोपाल सिंह विशारद (Gopal Singh Visharad) विवादित ढांचे में पूजा के अधिकार को लेकर फैजाबाद अदालत में पिटीशन दायर की थी.

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  • Last Updated: November 9, 2019, 7:18 PM IST
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अयोध्या (Ayodhya) में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद (Janmabhoomi-Babri Masjid dispute) पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को अपना फैसला दे दिया. दरअसल अयोध्या में विवादित ढांचे को लेकर कानूनी लड़ाई 1950 में शुरू हुई थी. भगवान राम के भक्त गोपाल सिंह विशारद विवादित ढांचे में पूजा के अधिकार का दावा करते हुए, फैजाबाद जिला अदालत में एक पिटीशन दायर की थी.

हालांकि कई विभेदों के चलते हिन्दू और मुसलमानों दोनों ही पक्षों से कई लोगों ने इस विवादित भूमि पर अपना दावा किया था . जिसके चलते यह मामला बहुत अधिक जटिल हो गया था. जाइए जानते हैं कि कौन-कौन से प्रमुख पक्षकारों ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के विवाद केस में शामिल थे.

हिन्दू और मुसलमानों दोनों ही पक्षों से कई लोगों ने इस विवादित भूमि पर अपना दावा किया था .


1- गोपाल सिंह विशारद

गोपाल सिंह विशारद ने 1950 में पहली बार राम जन्मभूमि विवाद पर अदालत में याचिका दायर की थी. अयोध्या के रहने वाले गोपाल सिंह ने फैजाबाद सिविल कोर्ट में राम जन्मभूमि में पूजा करने के अधिकार को लेकर केस फाइल किया था. 1986 में गोपाल सिंह की मौत के बाद उनके पुत्र राजेंद्र सिंह ने इस की पैरवी को आगे बढ़ाया.

2- निर्मोही अखाड़ा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या विवाद पर 2010 में दिए अपने फैसले में निर्माही अखाड़ा को विवादित भूमि को तीसरा पक्षकार माना था. गौरतलब है कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की चौदह अखाड़ों में से निर्मोही अखाड़ा एक है. निर्मोही अखाड़ा 1885 से इस विवादित भूमि पर अपना दावा कर रहा है. एक रिपोर्ट के अनुसार अखाड़ा के महंत रघुबर दास ने फैजाबाद प्रशासन के खिलाफ एक याचिका दायर की थी. लेकिन अदालत ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया था. इसके बाद दिसंबर 1959 में एक बार फिर निर्माही अखाड़ा ने विवादित भूमि पर पूजा करने के अधिकार को लेकर फैजाबाद के सिविल कोर्ट में एक पिटीशन दायर की थी.
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निर्मोही अखाड़ा 1885 से इस विवादित भूमि पर अपना दावा कर रहा है.


3. देवकी नंदन अग्रवाल
इलाहाबाद हाईकोर्ट के सीनियर वकील और जज देवकी नंदन अग्रवाल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में 1 जुलाई 1989 में एक रिट पिटीशन दायर की थी. उन्होंने रिट में राम लला के सखा के रूप में उनकी नियुक्ति की मांग की. हाईकोर्ट ने उन्हें राम का सखा नियुक्त किया.

राम के सखा देवकी अग्रवाल ने राम जन्मभूमि और अस्थाना जन्मभूमि की तरफ से अदालत में एक याचिका दायर की. 8 अप्रैल 2002 को देवकी अग्रवाल की मृत्यु के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के एक सेवानिवृत्त इतिहासकार टी पी वर्मा को अगला राम सखा नियुक्त किया गया. इसके बाद 2010 में त्रिलोक नाथ पांडे को राम सखा नियुक्त किया गया था.

4. अखिल भारतीय हिंदू महासभा
अखिल भारतीय हिंदू महासभा अयोध्या विवाद केस में एक प्रमुख पक्षकार रहा है. 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को इसी संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने हाईकोर्ट के फैसले को, जिसमें भूमि के बंटवाले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था.

बता दें कि हिंदू महासभा की स्थापना 1915 में ब्रिटिश भारत में हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा करने के लिए की गई थी. हालांकि देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के बावजूद यह भारतीय राजनीति में प्रभाव शून्य रही है.

2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को हिंदू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.


5- महंत सुरेश दास
गोपाल सिंह विशारद की ही तरह महंत दास ने विवादित स्थल की पूजा करने के अधिकार के लिए कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. 1950 में अयोध्या के दिगंबर अखाड़ा के महंत परमहंस राम चंद्र दास ने फैजाबाद अदालत में एक याचिका दायर की थी.

6- अखिल भारतीय श्री राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति
समिति ने पक्षकारों के खिलाफ एक रिट पिटीशन दायर की थी. इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ समिति ने 2010 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. समिति के पिटीशन को सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2011 में स्वीकार कर लिया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को मुख्य केस में टैग कर लिया था.

7- एम सिद्दीक
एम सिद्दीक अयोध्या विवाद केस के प्रमुख पक्षकार हैं. एम सिद्दीक जमियत-उल-उलेमा-ए-हिंद उत्तर प्रदेश के जनरल सेक्रेटरी हैं. एम सिद्दी की मौत के बाद जमियत के उलेमा मौलाना असद राशिदी इस केस के प्रमुख पक्षकार हो गए हैं. जमियत की तरफ से उन्होंने अयोध्या केस पर एक पिटीशन दायर की थी.

8- उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड
केंद्रीय सुन्नी वक्फ बोर्ड ने एक पिटीशन दायर कर बाबरी मस्जिद में अपना दावा किया है. वक्फ बोर्ड ने 1961 में फैजाबाद सिविल कोर्ट में एक पिटीशन दायर की थी. बोर्ड ने अपने याचिका में विवादित भूमि पर अधिकार की मांग की थी.

सुन्नी वक्फ बोर्ड ने 1961 में फैजाबाद सिविल कोर्ट में एक पिटीशन दायर की थी.


9- मोहम्मद हामिद अंसारी
मोहम्मद हामिद अंसारी बाबरी मस्जिद केस के पुराने पक्षकार थे. वह 1949 से बाबरी मस्जिद केस जुड़े हुए हैं. मस्जिद में भगवान राम की मूर्तियों को रखने के बाद शांति व्यवस्था भंग करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए लोगों में से वो भी शामिल थे.

1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड द्वारा दायर की गई याचिका में वो छह अन्य लोगों के साथ प्रमुख पक्षकार थे. अयोध्या में जन्म अंसारी की 2016 में मौत हो गई. उनकी मौत के बाद उनके पुत्र इकबाल अंसारी प्रमुख पक्षकार बन गए.

10- हाजी मिस्बाहुद्दीन
फैजाबाद के रहने वाले हाजी मिस्बाहुद्दीन अयोध्या विवाद केस के प्रमुख मुस्लिम पक्षकार हैं. जिन्हें हिंदू पक्षकारों द्वारा दायर याचिका का विरोध करने के लिए रखा गया था.

11- हाजी फेनकू
हाजी फेनकु शुरुआती मुस्लिम पक्षकार थे. फेनकू अयोध्या के सबसे बड़े संपत्ति मालिकों में से एक थे. फेनकू उन पांच शुरूवाती मुस्लिम पक्षकारों में शामिल रहे हैं, जिन्होंने अदालत में मुस्लिम पक्ष को मजबूती से रखा था. 1960 में उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे हाजी महबूब अहमद को प्रमुख मुस्लिम पक्षकारों में शामिल किया गया.

12- फारूक अहमद
फारूक अहमद भी अयोध्या मामले में सबसे पुराने मुस्लिम पक्षकार हैं. दिसंबर 2014 में उनके निधन के बाद उनके बेटे मोहम्मद उमर पक्षकार बन गए है. बता दें कि अहमद के पिता दिसंबर 1949 में बाबरी मस्जिद में भगवान राम की मूर्तियों को रखने के संबंध में एक मूल शिकायतकर्ता थे.

13- शिया सेंट्रल बोर्ड ऑफ वक्फ
शिया वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद को अपनी संपत्ति होने का दावा करता है. बोर्ड का कहना है कि बाबरी मस्जिद का निर्माण बाबर के सेनापति मीर बाक़ी ने किया था. 1946 के ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसने बाबरी मस्जिद को सुन्नी संपत्ति होने का फैसला सुनाया था.

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First published: November 9, 2019, 7:16 PM IST
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