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Ayodhya Verdict : 1986 में राममंदिर का ताला खुलवाने में राजीव गांधी की नहीं थी कोई भूमिका

News18Hindi
Updated: November 9, 2019, 5:35 PM IST
Ayodhya Verdict : 1986 में राममंदिर का ताला खुलवाने में राजीव गांधी की नहीं थी कोई भूमिका
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एक बार खुद स्‍वीकार स्‍पष्‍ट किया था क‍ि राममंदिर का ताला खुलवाने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी.

अयोध्या (Ayodhya) पर करीबी नजर रखने वाले जनमोर्चा अखबार के संपादक शीतला सिंह ने अपनी एक मुलाकात का हवाला देते हुए बताया कि राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) ने खुद इस बात से इनकार किया था कि उनकी राममंदिर का ताला खुलवाने (Unlocking the Ram Temple) में कोई भूमिका थी. इलाहाबाद (Allahabad) के सीजेएम रहे सीडी राय (CJM CD Rai) ने इस मामले की पूरी कहानी बताई.

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  • Last Updated: November 9, 2019, 5:35 PM IST
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नई दिल्‍ली. अयोध्‍या जमीन विवाद मामले (Ayodhya Land Dispute Case) में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अपना फैसला सुना दिया है. साथ ही केंद्र सरकार (Central Government) को तीन महीने के भीतर राममंदिर (Ram Temple) निर्माण के लिए ट्रस्‍ट (Trust) बनाने का आदेश दिया है. अब पूरी दुनिया की नजर अयोध्‍या के घटनाक्रम पर है. अयोध्‍या के बारे में बहुत कुछ प्रचलित है. उन्‍हीं में एक है कि 1986 में राममंदिर का ताला पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी (Former PM Rajiv Gandhi) ने खुलवाया था. आम राय तो यही है, लेकिन तथ्‍यों का ध्‍यान से विश्‍लेषण करने पर पता चलता है कि इसमें राजीव गांधी की कोई भूमिका नहीं थी.

तो कैसे और किसने खुलवाया राममंदिर का ताला
अयोध्या पर करीबी नजर रखने वाले जनमोर्चा अखबार के संपादक शीतला सिंह ने अपनी एक मुलाकात का हवाला देते हुए बताया कि राजीव गांधी ने खुद इस बात से इनकार किया था कि उनकी राममंदिर का ताला खुलवाने (Unlocking the Ram Temple) में कोई भूमिका थी. फिर आखिर कैसे खुला राममंदिर का ताला? इस बारे में इलाहाबाद (Allahabad) के सीजेएम रहे सीडी राय (CJM CD Rai) बताते हैं कि 1986 में यह मामला तत्‍कालीन जिला जज केएम पांडे (Justice KM Pandey) की अदालत में लंबित था. अयोध्‍या और आसपास के लोगों को उम्‍मीद थी कि जल्‍द ही मामले में फैसला आ जाएगा. जस्टिस पांडे ने भी फैसला सुनाने से पहले पूरी तैयारी की.

डीएम-एसपी के लिखित आश्‍वासन के बाद दिया फैसला

जस्टिस पांडे ने फैसले से पहले फैजाबाद (Faizabad) के तत्‍कालीन जिलाधिकारी इंदु कुमार पांडे (DM Indu Kumar Pandey) और पुलिस अधीक्षक (SP) कर्मवीर सिंह को तलब किया. उन्‍होंने दोनों अधिकारियों से फैसले के बाद कानून-व्यस्था (Law and Order) के हालात पर चर्चा की. जब दोनों ने जिला जज को भरोसा दिलाया कि किसी तरह के फैसले से कानून व्यस्था पर कोई असर नहीं पड़ेगा तो जस्टिस पांडे ने दोनों अधिकारियों से इस वादे को लिखित में कोर्ट में दाखिल करने को कहा. दोनों अधिकारियों के लिखित आश्वासन (Written Assurance) के बाद अदालत ने 1 फरवरी 1986 को शाम 4.40 बजे फैसला सुनाया.

जस्टिस केएम पांडे के फैसले के बाद पुलिस-प्रशासन के राममंदिर पहुंचने से पहले हजारों लोग वहां पहुंच गए और उन्‍होंने ताला तोड़ डाला.


भीड़ ने तोड़ा ताला, रिकॉर्ड में तोड़ने वाले का नाम
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फैसले में जिला जज पांडे ने प्रशासन (Administration) को स्‍पष्‍ट आदेश दिया कि अदालत से विवादित स्थल तक पहुंचने के समय के भीतर राममंदिर का ताला खोल दिया जाए यानी प्रशासन को एक घंटे से भी कम वक्त दिया गया. फैजाबाद के डीएम और एसपी का वादा धरा रह गया और फैसला आने के बाद प्रशासन के विवादित स्‍थल तक पहुंचने से पहले ही हजारों लोग वहां पहुंच गए. भीड़ ने राममंदिर का ताला तोड़ दिया. लिहाजा, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है कि ताला किसने खोला? ये सब अदालत के फैसले के बाद हुआ, इसलिए पुलिस (Police) या प्रशासन ने घटना की जांच (Investigation) करने की कोशिश भी नहीं की.

तो इसलिए जस्टिस केएम पांडे ने दिया फैसला
तत्‍कालीन सीजेएम सीडी राय ने यह भी बताया कि जस्टिस केएम पांडे ने ताला खुलवाने का फैसला सरकार की ओर से मिले किसी इशारे या आदेश के दबाव में नहीं दिया था. दरअसल, एक दिन वह रामलला (Ramlala) के दर्शन करने गए थे. जब वह बाहर निकले तो एक साधु ने उन्‍हें काफी खरी-खोटी सुनाई. साथ ही राममंदिर का ताला खुलवाने की चुनौती दे डाली. इसके बाद जस्टिस पांडे ने एक महीने से भी कम समय में मामले की सुनवाई पूरी की और ताला खुलवाने का आदेश दे दिया. बता दें कि आजादी के बाद 1986 तक फैजाबाद में दर्जनों जिला जज आए और चले गए, लेकिन किसी ने इस मामले में फैसला नहीं दिया. सभी तारीख देकर मामले को आगे बढ़ाते रहे.

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First published: November 9, 2019, 5:06 PM IST
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