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Ayodhya Land Dispute: जानें, 1986 में अदालत ने अचानक क्यों दिया राममंदिर का ताला खुलवाने का फैसला

News18Hindi
Updated: November 9, 2019, 12:43 PM IST
Ayodhya Land Dispute: जानें, 1986 में अदालत ने अचानक क्यों दिया राममंदिर का ताला खुलवाने का फैसला
वसीम रिजवी ने उस वक्त दावा करते हुए कहा था कि मीर बाकी शिया थे

फैजाबादकी अदालत (Faizabad Court) में आजादी के बाद 1986 तक एक दर्जन से ज्‍यादा जिला जज (District Judge) आए और तबादले (Transfer) के बाद दूसरी जगहों पर चले गए. लेकिन, किसी ने राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद (Ram Mandir-Babari Masjid Dispute) मामले में फैसला नहीं दिया. सभी ने इस मामले में तारीखें देकर अपना कार्यकाल पूरा किया. फिर फैजाबाद के जिला जज केएम पांडे (Justice KM Pandey) को एक साधु ने ऐसा क्‍या कह दिया कि उन्‍हें विवादित स्‍थल के ताले खुलवाने का आदेश देने को मजबूर होना पड़ा? फैसला देने के बाद जस्टिस पांडे को किन मुसीबतों का सामना करना पड़ा?

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  • Last Updated: November 9, 2019, 12:43 PM IST
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अनिल राय

नई दिल्‍ली. अयोध्या (Ayodhya) में विवादित स्थल का ताला खोलने का आदेश 1 फरवरी, 1986 को ही दे दिया गया था. जिला जज (District Judge) के आदेश के बाद लोगों ने ताला खोल भी दिया, लेकिन सवाल उठता है कि जस्टिस केएम पांडे (Justice KM Pandey) को आखिर ये फैसला क्‍यों लेना पड़ा. राममंदिर (Ram Temple) और बाबरी मस्जिद (Babari Masjid) का विवाद वर्षों पुराना था. अंग्रेजों के जमाने में या यू कहें कि अंग्रेजों के पहले से इस जगह के मालिकाना हक को लेकर विवाद था. आजादी के बाद के करीब 40 साल में फैजाबाद की अदालत में एक दर्जन से ज्यादा जिला जज आए और स्‍थानांतरित होकर चले गए. ये मुकदमा लगभग सभी जजों के सामने आया, लेकिन किसी ने फैसला नहीं लिया. सभी ने सिर्फ तारिख लगाई और अपना कार्यकाल पूरा किया. लेकिन, केएम पांडे ने फैजाबाद (Faizabad) के जिला जज का कार्यभार संभालने के एक साल के भीतर इस पर फैसला सुना दिया. तत्कालीन सीजेएम सीडी राय (CJM CD Rai) जिला जज पांडे के इस पर फैसला लेने के पीछे एक दिलचस्प किस्सा बताते हैं.

क्या न्यायापालिका पर उठे सवाल ने जिला जज को किया मजबूर
अयोध्या में जिला जज की कुर्सी संभालने के बाद केएम पांडे रामलला के दर्शन करने गए थे. दर्शन के बाद जब जज साहब वहां से निकले तो बाहर खड़े एक साधु ने रामलला के बंद दरवाजे के बारे में पूछा. साधु की बात जज साहब को परेशान करने वाली थी. साधु ने रामलला के बंद दरवाजे के लिए अदालत (Judiciary) और राजनेताओं (Politicians) को जिम्मेदार बता दिया. जज साहब के कुछ बोलने से पहले ही साधु ने जज साहब को विवादित स्थल का दरवाजा खोलने की चुनौती (Challenge) दे डाली. जिला जज पांडे को ललकारते हुए उस साधु ने कहा कि हिम्मत है तो इस मामले में फैसला सुना दो. उस साधु की बात ने जज साहब को अंदर तक झकझोर दिया. उन्होंने तय किया कि वह जल्द इस मामले की सुनवाई पूरी करेंगे. इसके बाद जज साहब ने इस मामले की सुनवाई करीब एक महीने में पूरी कर ली और 1 फरवरी, 1986 को ताला खोलने का फैसला सुना दिया.

जस्टिस केएम पांडे को फैसले के बाद आने लगे धमकी भरे खत
अयोध्या विवाद (Ayodhya Land Dispute) वर्षों पुराना था. आजादी (Independence) के बाद से ये मामला तेजी से सुलग रहा था. ये एक ऐसा विवाद था, जिसका फैसला देश का सांप्रदायिक सौहार्द (Communal harmony) बिगाड़ सकता था. ऐसे में तत्कालीन जिला जज केएम पांडे ने भले ही जिलाधिकारी (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) से फैजाबाद जिले में शांति व्यस्था के हालात की रिपोर्ट ले ली हो, लेकिन ये मामला सिर्फ फैजाबाद का नहीं था. ये मामला था पूरी दुनिया में बसे हिंदू (Hindu) और मुसलमानों (Muslims) का. जज साहब भी इससे अछूते नहीं थे. फैसले के बाद जिला जज पांडे को धमकियां (Threats) मिलना शुरू हो गईं. जस्टिस पांडे के साथ सीजेएम रहे सीडी राय बताते हैं कि फैसला देने के करीब एक सप्ताह बाद पांडे जी को धमकी भरे खत मिलने शुरू हो गए.

अफगानिस्‍तान और सऊदी अरब से भी आईं धमकी वाली चिट्ठियां
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तत्‍कालीन सीजेएम राय बताते हैं कि जिला जज को औसतन 30-35 खत रोज आने लगे. इनमें 2-3 पत्रों को छोड़कर बाकि सभी धमकी के होते थे. अफगानिस्तान (Afghanistan), सऊदी अरब (Saudi Arabia) समेत तमाम देशों और तमाम अलग-अलग भाषाओं में धमकी भरे पत्र आ रहे थे. ऐसे में उनकी सुरक्षा (Security) को लेकर जिला प्रशासन (District Administration) के साथ-साथ उनके साथी अफसर भी चिंतित होने लगे. ये वो दौर था, जब जिला जज के पास सुरक्षा तो छोडि़ए ऑफिस आने जाने के लिए वाहन भी नहीं होते थे. फैसले वाले दिन तो जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने खुद उन्हें घर तक छोड़ा, लेकिन इतनी बड़ी संख्‍या में धमकी भरे खत मिलने के बाद जिला प्रशासन से लेकर लखनऊ में बैठे गृह विभाग (Home Department) के अफसरों को उनकी सुरक्षा की चिंता सताने लगी.

नियमावली में संशोधन कर जस्टिस पांडे को मुहैया कराई गई सुरक्षा
सरकार ने जस्टिस पांडे की सुरक्षा के लिए नियमावली में संशोधन (Manual Amendment) किया और तत्काल उन्हें सरकारी वाहन (Vehicle) उपलब्ध कराया गया. घर से लेकर ऑफिस तक उनकी सुरक्षा कड़ी कर दी गई. स्थानीय लोग भी उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे. कई बार तो जिला अदालत में संदिग्ध (Doubtful) दिखने पर स्थानीय लोग भी उसके पीछे पड़ जाते थे, लेकिन धीरे-धीरे खतों का आना कम हो गया और करीब 6 महीने बाद जज पांडे को धमकी भरे खत आने बंद हो गए. हालांकि, उसके बाद भी उनके साथ सुरक्षा लगातार बनी रही.



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First published: November 9, 2019, 10:24 AM IST
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