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Ayodhya Verdict: राम जन्मभूमि विवाद पर ये है ASI रिपोर्ट, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अहम आधार माना

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Updated: November 9, 2019, 3:18 PM IST
Ayodhya Verdict: राम जन्मभूमि विवाद पर ये है ASI रिपोर्ट, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अहम आधार माना
सुप्रीम कोर्ट ने एएसआई की रिपोर्ट को एक आधार मान कर अपना फैसला दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में आई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) विभाग की रिपोर्ट को अपने फैसले का एक अहम आधार माना है. एएसआई ने 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशन पर राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद स्थल की खुदाई की थी.

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नई दिल्ली. अयोध्या (Ayodhya) में राम जन्मभूमि (Ram janam bhoomi)-बाबरी मस्जिद (Babri Masjid) विवाद पर बहु प्रतीक्षित फैसला आ गया है. सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि पर मंदिर बनाने का फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में आई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) विभाग की रिपोर्ट को अपने फैसले का एक अहम आधार माना है. दरअसल एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में विवादित भूमि के नीचे मंदिर के अवशेष होने की बात कही थी. जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी अपने फैसले का आधार माना था. आखिर 2003 में मंदिर को लेकर एएसआई की रिपोर्ट में क्या कहा गया था?

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशन पर राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवादित स्थल की खुदाई की थी. पुरातत्वविदों ने बाबरी मस्जिद के पहले से मौजूद एक बड़े ढांचे के प्रमाण को भी कोर्ट के सामने रखा है.  कोर्ट के आदेश के बाद एएसआई की खुदाई में 52 मुसलमानों सहित 131 मजदूरों की एक टीम लगी हुई थी. 11 जून 2003 को एएसआई ने एक अंतरिम रिपोर्ट जारी की जिसमें केवल 22 मई और 6 जून 2003 के बीच की अवधि के निष्कर्षों को सूचीबद्ध किया गया था.

पुरातत्वविदों ने बाबरी मस्जिद के पहले से मौजूद एक बड़े ढांचे के प्रमाण को भी कोर्ट के सामने रखा है.


2003 में एएसआई ने सौंपी थी रिपोर्ट

अगस्त 2003 में एएसआई ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ को 574 पृष्ठों की एक रिपोर्ट सौंपी. रिपोर्ट में सूचीबद्ध संरचनाओं में कई ईंट की दीवारें पूर्व-पश्चिम की ओर, कई उत्तर-दक्षिण की ओर, सजाए गए रंगीन फर्श, 1.64 मीटर ऊंची सजे हुए काले पत्थरों वाले कई खंभों की जानकारी दी गई है. साथ ही रिपोर्ट में चारों कोनों पर मूर्तियों के साथ स्तंभ और साथ ही अरबी भाषा में पत्थर पर पवित्र छंद के शिलालेख का भी उल्लेख दिया गया है.

एएसआई की रिपोर्ट में अन्य बातों के अलावा एक सीढ़ी और दो काले बेसाल्ट स्तंभों का भी उल्लेख किया गया है. जिसमें मोर के साथ खिलने वाले कमल बनाए गए थे. जिसको सजावटी नक्काशियों से बनाया गया है, जिसमें कमल के पंख ऊपर की ओर उठे हुए हैं. एएसआई की रिपोर्ट पर उत्खनन से प्राप्त निशान के आधार पर कहा गया है कि तीन गुंबदों वाली बाबरी संरचना के नीचे पहले से एक संरचना मौजूद थी.

एएसआई की रिपोर्ट में अन्य बातों के अलावा एक सीढ़ी और दो काले बेसाल्ट स्तंभों का भी उल्लेख किया गया है

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बाबरी ढांचे के नीचे प्राचीन अवशेष
बाबरी ढांचे के नीचे पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक की प्राचीन परिधि पाई गई हैं. कमल, कौस्तुभ गहना, मगरमच्छ मुखौटा, आदि जैसे नक्काशीदार हिंदू अलंकरणों वाले खूबसूरत पत्थर के टुकड़े इन दीवारों में इस्तेमाल किए गए थे. इन सजाए गए वास्तुशिल्प के टुकड़ों को दीवारों में विभिन्न स्थानों पर सटीकता के साथ डाला गया था. एक पत्थर के स्लैब का एक छोटा हिस्सा एक जगह पर 20 फीट नीचे गड्ढे में चिपका हुआ है. शेष स्लैब दीवार में ढका हुआ है.

बाहर निकले हुए भाग में पांच-अक्षर वाला देवनागरी शिलालेख है, जिस पर वीएचपी ने हिंदू नाम होने का दावा किया है. लेकिन इस पर विवाद है कि यह हिंदू नाम है या नहीं. एएसआई की खुदाई में 20 फीट से नीचे पाई जाने वाली वस्तुएं कम से कम 1,500 साल पुरानी हैं. पुरातत्वविदों के अनुसार प्रति सौ साल में दोमट की परत के एक पैर टोपोसिल पर इकट्ठा होते हैं. प्राथमिक मिट्टी 30 फीट की गहराई तक भी नहीं पाई गई. यह पिछले 2,500 वर्षों में उस स्थान पर कुछ संरचना के अस्तित्व का सुराग प्रदान करता है.

एएसआई की खुदाई में 20 फीट से नीचे पाई जाने वाली वस्तुएं कम से कम 1,500 साल पुरानी हैं.


एक ही समय में बनाए गए पिलर
एक ही अवधि में बनाए गए 30 से अधिक पिलर बेस पाए गए हैं. ये पिलर दो पंक्तियों में हैं और पंक्तियां समानांतर हैं. पिलर बेस पंक्तियां उत्तर-दक्षिण दिशा में हैं. एक दीवार को दूसरी दीवार पर लगाया गया है. फर्श की कम से कम तीन परतें दिखाई देती हैं. एक अष्टकोणीय पवित्र यज्ञ कुंड भी मिला है. ये तथ्य पहले से मौजूद संरचना की विशालता को साबित करते हैं.

सुरखी का उपयोग हमारे देश में 2,000 वर्षों से एक निर्माण सामग्री के रूप में किया जाता रहा है. जन्मभूमि के निर्माणों में सुरखी का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया है. गोल और अन्य आकृतियों और आकारों की ढली हुई ईंटें मध्य युग के दौरान न तो प्रचलन में थीं और न ही आज उपयोग में हैं. यह 2,000 साल पहले ही प्रचलन में थीं. उत्खनन में टचस्टोन (कसौटी पत्थर) के कई अलंकृत टुकड़े मिले हैं.

एएसआई की खुदाई में 20 फीट से नीचे पाई जाने वाली वस्तुएं कम से कम 1,500 साल पुरानी हैं.


टेराकोटा की आकृतियों का उपयोग
टेराकोटा धार्मिक आकृतियां, सर्प, हाथी, घोड़ा-सवार, संत, आदि पाए गए हैं. इससे साबित होता है कि उन दिनों भी दीपावली समारोह के दौरान पूजा में टेराकोटा की आकृतियों का उपयोग किया जाता रहा है. बाद में इन्हें दिव्य आशीर्वादों के आह्वान के लिए मंदिर के गर्भगृह में लगाया जाता था. गुप्त साम्राज्य और कुषाण साम्राज्य काल की ईंटें मिली हैं. गढ़वाल काल की ईंट की दीवारें भी उत्खनन में मिली हैं.

उल्लेखनीय है कि यहां से आवासीय बस्ती के अस्तित्व को साबित करने के लिए कुछ भी नहीं मिला है. उत्खनन से पता चलता है कि एक विशाल परिसर के आवास में एक दिव्य प्रयोजनों के लिए उपयोग की जाने वाली एकमात्र प्रतिष्ठित और बहुत ही प्रसिद्ध संरचना है. यह एक असामान्य और अत्यधिक प्रसिद्ध जगह थी और आम लोगों के लिए निवास स्थान नहीं था.

हिंदू तीर्थयात्रियों का हजारों वर्षों का है इतिहास
हिंदू तीर्थयात्रियों ने हजारों वर्षों से उस स्थान का दौरा किया है. आज भी उस स्थान के आसपास कई मंदिर हैं. खुदाई में मिली वस्तुएं उस स्थान पर उत्तर भारतीय स्थापत्य शैली की एक पवित्र संरचना के अस्तित्व की ओर इशारा करती हैं. गौरतलब है कि विवाद भूमि पर 2003 की एएसआई रिपोर्ट अयोध्या की ऐतिहासिक स्थलाकृति को लेकर पांचवीं रिपोर्ट है.

इससे पहले अयोध्या का सर्वेक्षण अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा 1862-63 में किया गया था. इसके बाद 1889-91 ए फ्यूहर द्वारा 1889-91 में, प्रोफेसर ए. के. नारायण ने 1969-70 में और चौथी बार प्रोफेसर बी.बी. लाल ने 1975-76 में अयोध्या की खुदाई करके इसकी ऐतिहासिकता पर प्रकाश डाला था.

सुप्रीम कोर्ट ने एएसआई की रिपोर्ट और प्राचीन यात्रियों के यात्रा वृतांतों को फैसले का आधार बनाया.


कनिंघम के सर्वेक्षण का उद्देश्य बौद्ध स्थल
कनिंघम के सर्वेक्षण का उद्देश्य बौद्ध स्थलों के बारे में जानकारी प्राप्त करना था. हालांकि सर्वेक्षण के दौरान उन्होंने अयोध्या में राम के अस्तित्व को भी स्वीकार किया था. उन्होंने कहा था कि वर्तमान अयोध्या रामायण की अयोध्या से गहराई से जुड़ी हुई है. 1889-91 में आई फ्यूहरर की रिपोर्ट वास्तव में कनिंघम के अध्ययन का विस्तार था.

उन्होंने 11वीं और 12वीं शताब्दी ईस्वी में अयोध्या में राजपूत राजाओं के शासन की पुष्टि की थी.
नारायण ने 5 शताब्दी में अयोध्या में एक मजबूत बौद्ध उपस्थिति से संबंधित प्रमाण दिये थे. बी.बी. लाल ने स्टडी में ईसाई युग की शुरुआती शताब्दियों में अयोध्या में बड़े पैमाने पर व्यापार और वाणिज्य के बारे में कई दिलचस्प जानकारियों का पता लगाया था.

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First published: November 9, 2019, 1:37 PM IST
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