जानिए ISS के बाहर निर्वात और माइक्रोग्रेविटी में कैसे जिंदा रह सके बैक्टीरिया

वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया कि बैक्टीरिया (Bacteria) में बचाव के लिए क्या बदलाव आए. (तस्वीर: Pixabay)
वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया कि बैक्टीरिया (Bacteria) में बचाव के लिए क्या बदलाव आए. (तस्वीर: Pixabay)

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) में एक साल के लिए छोड़े गए बैक्टीरिया (Bacteria) के बचे रहने का कारण वैज्ञानिकों ने पता लगा लिया है.

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  • Last Updated: November 12, 2020, 10:02 AM IST
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इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) के बाहर वैज्ञानिकों ने कुछ बैक्टीरिया (Bacteria) छोड़े थे. एक साल बाद भी ये बैक्टीरीया अंतरिक्ष (Space) में विपरीत हालातों में जिंदा रहे. इससे वैज्ञानिकों में उम्मीद जागी थी. इंसान भी लंबे समय तक अंतरिक्ष में जिंदा रह सकता है और वह लंबी दूरी के अंतरिक्ष अभियानों में शामिल हो सकता है. अब शोधकर्ताओं ने इस बात का पता लगाया है कि ये सूक्ष्मजीवी (microorganisms) एक साल तक खुद को जिंदा कैसे रख सके.

बहुत ही खतरनाक वातावरण
शोधकर्ताओं को पता चला है कि कुछ असामान्य प्रतिरोधी सूक्ष्मजीव बाह्य्अंतरिक्ष के खतरनाक हालातों में जीवित रह सकते हैं. वे कॉस्मिक और सौर पराबैंगनी विकिरणों, अति निर्वात, तापमान में अत्याधिक बदलाव, माइक्रोग्रैविटी जैसे विपरीत हालातों में भी अपना जीवन बनाए रखने में सक्षम रह सकते हैं.

कौन सा सूक्ष्मजीव
पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के बाहर एक साल तक बाहर रखने पर शोधकर्ताओंने पाया है कि एक्सट्रीमोफिलिक बैक्टीरियम डेनोकोकस रेडियोड्यूरान्स खुद को खत्म होने से बचाने में कामयाब रहा और उनसे कई बाहरी फफोले जैसी परत भी विकसित कर ली.



क्या हुए बदलाव
माइक्रोबायोम जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक बैक्टीरिया में कोशिका तनाव को बढ़ाने के लिए एक बहुआयामी प्रोटीन और जीनोमिक प्रतिक्रिया शुरू हो गई थी. इससे बैक्टिरिया को तेज प्रतिक्रिया करने वाली ऑक्सीजन प्रजातियों के से हुई DNA की खराबी को ठीक करने और बचाव करने में मदद मिली. स्पेस के ऐसे हालातों की प्रतिक्रिया स्वरूप बैक्टीरिया अंदर आवाजाही और ऊर्जा के स्तर में बदलाव आ गया.

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वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया (Bacteria) को साल 2015 में एक साल के लिए ISS के बाहर छोड़ा था.


यह बड़ी सीख
ऑस्ट्रिया में यूनिवर्सिटी ऑफ विएना की करेस्पॉन्डिग लेखिका ततियाना मिलोजेविच ने बताया, “इन पड़तालों से हमें उन प्रक्रियाओं को समझने में मिली है जिनसे पृथ्वी के बाहर जीवन कायम रह सकता है. इससे हमें यह जानकारी भी मिली है कि गैसे बाह्यअंतरिक्ष के खतरनाक हालातों में जीवित रह कर खुद को ढाला जा सकता है.”

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यह भी होगा संभव
मिलोजेविच ने बताया, “ये नतीजे सुझाते हैं कि लंबे समय तक पृथ्वी की निचली कक्षा में  रेडियोड्यूरन्स का जिंदा रहना संभव है और इसकी वजह उसकी सक्षम आणविक प्रतिक्रिया व्यवस्था (Molecular response system) है. इससे यह भी पता चला है कि जीवों के लिए इन क्षमताओं के साथ और ज्यादा लंबे समय और लंबी दूरी की यात्रा भी मुमकिन है.”

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मंगल (Mars) जैसे ग्रहों की लंबी यात्रा के लिए इस प्रयोग के नतीजे बहुत उपयोगी होंगे. . (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


कैसे रखा गया था ISS के बाहर
इस बैक्टीरिया के लंबे समय में अंतरिक्ष में रहने से उसके डीएनए, टेलोमेर्स  और गट माइक्रोबायोम में बदलाव आया. इस बैक्टरिया की ‘बोन डेंसिटी’ कम हो गई थी. पहले इसे डीहाइड्रेट किया गया और ISS के एक खास प्रेशर वाले मॉड्यूल में रखा गया था. इस मॉड्यूल में कांच की खिड़की थी जिसमें केवल 190 नैनोमीटर वेवलेंथ वाली पराबैंगनी किरणें प्रवेश नहीं कर पाती थी.

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शोधकर्ताओं की टीम का कहना है कि इस अध्ययन में बताए गए नतीजे ग्रहों में सुरक्षा संबंधी जागरुकता बढ़ा सकते हैं. मिसाल के तौर पर मंगल का वायुमंडल 190-200 नौनोमीटर की वेवलेंथ से कम के विकिरण को अवशोषित करता है. इस तरह का अध्ययन यह जानने में मदद करता है कि क्या बैक्टीरिया दूसरे संसारों में जिंदा रह सकते हैं और क्या वे उनके बीच में सफर कर सकते हैं या नहीं.  यह इंसान और उसके अंदर के सूक्ष्मजीवों के लिए और ज्यादा अहम है खासतौर पर तब जब इंसान लंबे समय के लिए चंद्रमा पर रहने की और लंबी दूरी पर जाकर मंगल पर पहुंचकर लौटने की तैयारी कर रहा है.
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