जन्मदिन विशेष: जब सच्चाई के लिए अपने ही शिक्षक से भिड़ गए तिलक

महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक के बचपन की कुछ कहानियां दिलचस्प हैं. मसलन वो किस्सा जब उन्होंने सच के लिए अपने ही शिक्षक के सामने झुकने से इनकार कर दिया था.

News18Hindi
Updated: July 23, 2019, 11:54 AM IST
जन्मदिन विशेष: जब सच्चाई के लिए अपने ही शिक्षक से भिड़ गए तिलक
महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक
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Updated: July 23, 2019, 11:54 AM IST
बालमन में आसपास के माहौल के असर से ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है. ऐसे कई महान लोग हुए हैं, जिनके बचपन के किस्से जानकर हम उनके महान बनने की प्रक्रिया को समझ सकते हैं. बाल गंगाधर तिलक एक ऐसे ही व्यक्तित्व रहे. महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक के बचपन की कुछ कहानियां दिलचस्प हैं. मसलन वो किस्सा जब उन्होंने सच के लिए अपने ही शिक्षक के सामने झुकने से इनकार कर दिया था.

जब तिलक ने दंड स्वीकार करने से इनकार कर दिया

बाल गंगाधर तिलक उस वक्त विद्यालय में पढ़ा करते थे. एक बार उनकी क्लास के कुछ विद्यार्थियों ने मूंगफली खाकर उसके छिलके बिखेर दिए. मूंगफली के छिलकों से पूरा क्लास गंदा हो गया. जब टीचर ने क्लास का हाल देखा तो उन्होंने इस हरकत के लिए पूरी क्लास को दंडित करना शुरू कर दिया. तिलक के सामने पहुंचकर शिक्षक ने दंड देने के लिए उन्हें हाथ आगे करने को कहा. बाल गंगाधर तिलक ने दंड स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

उन्होंने अपने शिक्षक से कहा कि ‘जब मैंने क्लास को गंदा ही नहीं किया तो दंड क्यों स्वीकार करूं.’ शिक्षक ने इसे तिलक की उदंडता माना और इसकी सूचना उनके पिता को दी गई. स्कूल की सारी घटना सुनने के बाद पिता ने भी तिलक का ही साथ दिया. वो टीचर से बोले कि मैंने अपने बेटे को कुछ भी खरीदने के लिए पैसे नहीं दिए. मेरा बेटा झूठ नहीं बोलता और न ही बाजार की कोई चीज खाता है. शिक्षक को अपनी गलती का अहसास हुआ.

ये बड़ी ही साधारण घटना है. लेकिन इस घटना से तिलक के व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया को समझा जा सकता है. उन्होंने अपने बचपन में ही अन्याय के खिलाफ झुकने से मना कर दिया था. अगर शिक्षक के डर से वो झुक गए होते तो शायद उनके भीतर वो साहस पैदा नहीं होता. तिलक साहसी और निडर थे.

जिंदगी की कठिनाइयों से सीखने का जज्बा

तिलक पढ़ने में काफी तेज थे. उनके बचपन का एक और किस्सा दिलचस्प है. गणित तिलक का पसंदीदा विषय था. उन्हें गणित के कठिन सवालों को हल करने में मजा आता था. गणित की परीक्षा में वो पहले कठिन सवालों को ही हल किया करते थे. एक बार उनके किसी मित्र ने पूछा कि परीक्षा में तुम हमेशा पहले कठिन सवालों को ही हल क्यों करते हो. अगर तुम आसान सवालों को हल करोगे तो परीक्षा में तुम्हें ज्यादा नंबर मिलेंगे. तिलक ने जवाब दिया कि ‘मैं ज्यादा से ज्यादा सीखना चाहता हूं. इसलिए पहले कठिन सवालों को हल करता हूं. अगर हम हमेशा सरल ही सवाल हल करते रहेंगे तो हम कुछ भी नया नहीं सीख पाएंगे. यही बात हमारी जिंदगी पर भी लागू होती है. अगर हम हमेशा आसान विषय, सरल सवाल और साधारण काम की तलाश में लगे रहेंगे तो जिंदगी में कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे.’ तिलक के बचपन की ये कहानियां प्रेरणास्पद हैं.
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bal gangadhar tilak birthday special when tilak did not accept punishment from teacher for the sake of truth
तिलक ने स्वराज के उद्देश्य से होमरूल लीग की स्थापना की


1876 में तिलक ने बीए की डिग्री हासिल की. इसके बाद 1879 में उन्होंने एलएलबी की परीक्षा पास की. तिलक चाहते तो आसानी से सरकारी नौकरी कर सकते थे. लेकिन उन्होंने देशसेवा का मार्ग चुना. तिलक अपने सहयोगी आगरकर और समाजशास्त्री विष्णु शास्त्री चिपुलंकर के साथ मिलकर डेक्कन एजुकेशन सोसायटी शुरू की. इसके जरिए वो युवाओं को उच्च शिक्षा के मौके प्रदान करने लगे. उन्होंने कुछ प्रतिकाओं का प्रकाशन भी शुरू करवाया. तिलक के लेख देशभक्ति की भावना से भरे होते थे.

1890 में तिलक कांग्रेस के साथ जुड़े. तिलक ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने की दिशा में भी काम किया. महाराष्ट्र में गणेश उत्सव के भव्य तौर पर मनाए जाने के पीछे तिलक का ही हाथ बताया जाता है. उन्होंने सार्वजनिक उत्सवों के जरिए लोगों को एकदूसरे से जोड़ने का काम किया.
1916 में बाल गंगाधर तिलक ने होमरूल लीग की स्थापना की. इसका उद्देश्य स्वराज की स्थापना था. उन्होंने घर-घर जाकर लोगों को होमरूल लीग के उद्देश्यों को समझाया. 23 जुलाई 1856 को जन्मे बाल गंगाधर तिलक का 1 अगस्त 1920 में निधन हो गया.

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First published: July 23, 2019, 11:34 AM IST
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