लाइव टीवी

वो दो बातें जिनसे दबंग बाल ठाकरे को भी लगता था डर

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: November 29, 2019, 6:06 PM IST
वो दो बातें जिनसे दबंग बाल ठाकरे को भी लगता था डर
बाल ठाकरे 1969 में तीन महीने के लिए जेल गए थे, जब वो बाहर आए तो उन्होंने ये नौबत दोबारा नहीं आने की बात सोची थी. हालांकि उनकी ताकत बढ़ने के साथ ये करना किसी के लिए संभव भी नहीं रहा. हालांकि वर्ष 2000 में उन्हीं के अनुयायी रहे छगन भुजबल ने उन्हें जेल भेजने के लिए सारे घोड़े खोल लिये थे. उनकी गिरफ्तारी का आदेश भी हो गया था

बाल ठाकरे 1969 में तीन महीने के लिए जेल गए थे, जब वो बाहर आए तो उन्होंने ये नौबत दोबारा नहीं आने की बात सोची थी. हालांकि उनकी ताकत बढ़ने के साथ ये करना किसी के लिए संभव भी नहीं रहा. हालांकि वर्ष 2000 में उन्हीं के अनुयायी रहे छगन भुजबल ने उन्हें जेल भेजने के लिए सारे घोड़े खोल लिये थे. उनकी गिरफ्तारी का आदेश भी हो गया था

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 29, 2019, 6:06 PM IST
  • Share this:
60 के दशक में जब बाला साहेब ठाकरे (Bala Saheb thackeray)  यानि बाल ठाकरे अपने भाई के साथ मिलकर शिवसेना (Shivsena) की नींव रख रहे थे तो उन्हें शायद ही अंदाज रहा हो कि उनका ये सांस्कृतिक संगठन एक दिन बड़ी सियासी ताकत बन जाएगी. हालांकि उस दौर में शिवसेना सुप्रीमो को दो बातों से डर लगता था. हालांकि उनकी पब्लिक इमेज एक दुस्साहसी नेता की थी. बाद में शिवसेना के ताकत में आने के बाद उनका ये डर भी खत्म हो गया.

अब जबकि बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे (Uddhav thackeray) महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन गए हैं. शिवसेना ने राज्य की सत्ता में आने के लिए चिर दुश्मन माने जाने वाली दो पार्टियों एनसीपी और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया. उससे लगता है कि शिवसेना की पॉलिटिक्स अब उस दौर से काफी आगे निकल आई है. जहां बाल ठाकरे उसे छोड़कर वर्ष 2012 में दुनिया से रवाना हो गए थे.

जानी-मानी पत्रकार सुजाता आनंदन ने वर्ष 2014 में एक किताब लिखी थी, हिंदू हृदय सम्राट-हाउ द सेना चेंज्ड मुंबई फारएवर. ये किताब अपने आपमें खासी बोल्ड कही जा सकती है. क्योंकि किताब में ठाकरे के व्यक्तित्व के उन पहलुओं पर बेबाकी से लिखा गया है, जिसे पढ़कर शिवसैनिक आगबबूला हो जाते हैं. लेकिन इस किताब के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ.

किताब में हालांकि बाल ठाकरे की 60 के दशक से अगले 50 तक चली सियासी यात्रा, बदलते विचार, सुविधा के अनुसार मुद्दों को छोड़ना और पकड़ना शामिल रहा है. किताब बाला साहेब ठाकरे के उन दो डर के बारे में बताती है, जिससे वो वाकई लंबे समय तक ग्रस्त रहे.

पहला डर
60 के दशक में शिवसेना मुंबई में ऐसे संगठन के तौर पर उभर रही थी, जिसकी भूमिका वहां आमतौर पर हड़तालों में भी काफी रहती थी. इससे ट्रेड यूनियन से जुड़े कम्युनिस्टों से उनकी ठनी रहती थी. उन्हें हमेशा ये डर रहता था कि उन पर कहीं हमला ना हो जाए.


Loading...

उन्हें महसूस होता था कम्युनिस्ट उनकी हत्या की साजिश रचने में लगे हुए हैं. कभी भी उनकी जान जा सकती है. कई ट्रेड यूनियन से उनके बहुत तीखे रिश्ते बन चुके थे. उनके नेताओं को लगता था कि ठाकरे उन्हें कमजोर कर रहे हैं.

दूसरा डर 
दूसरा डर उन्हें जेल से लगता था. किताब में लिखा है कि जीवन भर वो लगातार जेल जाने से डरते रहे. इसकी वजह भी शायद 1969 में उनका तीन महीने के लिए जेल जाना ही था.

दरअसल तत्कालीन उप प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई मुंबई आए हुए थे. तब शिव सैनिकों ने उनके काफिले पर हमला कर दिया. काफी तोड़फोड़ भी की. इसके बाद बाल ठाकरे की गिरफ्तारी हुई. वो अदालत में पेश हुए. उन्हें तीन महीने के लिए जेल भेज दिया गया.

इसके बाद वो लगातार जेल जाने से डरते रहे. हालांकि इसके बाद जैसे जैसे शिवसेना एक ताकत के तौर पर उभरती गई, वैसे वैसे मुंबई में लार्जर देन लाइफ बनते गए. कोई सरकार तब उन पर हाथ डालने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी, क्योंकि बाला साहेब ठाकरे शिव सैनिकों के जरिए कभी भी किसी भी समय तांडव करने की अपार ताकत हासिल कर चुके थे. उनके घर में महाराष्ट्र और मुंबई की सियासी से लेकर मनोरंजन जगत तक की हस्तियां हाजिरी मारने आया करती थीं.

बाल ठाकरे 1969 में तीन महीने के लिए जेल में गए थे, उसके बाद फिर ये नौबत नहीं आई


मुंबई के कई बलवों को शिवसेना से जोड़ा गया. ठाकरे 1989 में शुरू हुए अपने अखबार सामना में एक से बड़े एक भड़काऊ संपादकीय लिखते थे. जिसकी तीव्र प्रतिक्रिया भी होती थी. यानि वो इतनी ताकत जुटा चुके थे कि कोई सपने में नहीं सोच सकता था कि उन्हें जेल में भेजा जा सकता है.

दोबारा जेल जाने की नौबत भी आई
हालांकि जीवन में फिर ऐसे हालात बन गए थे, जब उन्हें गिरफ्तार किया गया और उन्हें जेल भेजे जाने के आसार बन गए. अगर कोर्ट ने उन्हें बरी नहीं किया होता तो वो दोबारा भी जेल जाते. हालांकि तब ये सोचकर पूरी मुंबई दहशत में थी कि अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा.

दरअसल एक जमाने में उनके खास सिपहसालार रहे छगन भुजबल ने ठान लिया था कि वो बाल ठाकरे को जेल पहुंचाकर ही मानेंगे. मुंबई में एक इलाके में सब्जी बेचने वाले से शिव सैनिक बने छगन भुजबल उनसे तब नाराज हो गए थे, जब उन्होंने उनकी जगह मनोहर जोशी को तरजीह देते हुए महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष का नेता बना दिया था.

वर्ष 2000 में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल ने उनकी गिरफ्तारी के लिए आदेश कर दिये थे लेकिन तब ठाकरे को कोर्ट से राहत मिल गई


छगन ने 1989 में शिवसेना छोड़ी और कांग्रेस में शामिल हो गए. उन्होंने ठान लिया था कि वो बाल ठाकरे से बदला लेकर रहेंगे. ये मौका उन्हें वर्ष 2000 में मिला जबकि वो महाराष्ट्र में उप मुख्यमंत्री बने. उन्होंंने 92-93 में मुंबई में दंगों में सामना अखबार के संपादकीय को भड़काऊ माना और ठाकरे को गिरफ्तार करने के आदेश जारी हो गए. हालांकि भुजबल अपनी ये इच्छा पूरी नहीं कर पाए क्योंकि कोर्ट ने तुरंत शिवसेना प्रमुख को राहत दे दी.

उनकी एक खास छवि जनता के बीच गढ़ी गई
इस किताब में एक जमाने में ठाकरे के विश्वस्त सहयोगी रहे माधव देशपांडे कहते हैं, हमने उनकी एक छवि लोगों के बीच गढ़ी, जिसमें वो दुस्साहसी, बेधड़क और ताकतवर नेता के तौर पर उभारे गए.

बेशक ठाकरे के अंदर भी कुछ डर रहे हों लेकिन सियासत का आधार भी डर और भय पैदा करने पर ज्यादा टिका था. उन्होंने बड़ी कुशलता के साथ मुंबई के पिछड़ों, स्लम्स में रहने वाले गरीबों और चाल के बाशिंदों को इस्तेमाल किया. उन्हें बखूबी जय महाराष्ट्र, हिंदुत्व, एंटी मुस्लिम, एंटी पाकिस्तान, एंटी नार्थ और एंटी साउथ के तत्वों को घोलकर पिलाया गया.

बाद में जैसे जैसे शिव सैनिकों की संख्या बढ़ती गई, वैसे वैसे बाल ठाकरे खासे मजबूत होते गए


उनके शिवसैनिक हमेशा उनके खून देने और कहीं भी, कभी भी हिंसा करने के लिए तैयार रहते थे और यही बात शिवसेना के लिए बड़ी ताकत बन गई. हालांकि 90 के दशक में उनके शिव सैनिक अराजक होने लगे. मुंबई में लगातार उनके द्वारा बिल्डर्स से लेकर व्यापारियों और प्रोफेशनल्स से फिरौती मांगने की खबरें आने लगीं. तब बाल ठाकरे को खुद ही सामने आकर शिव सैनिकों से ये सब बंद करने को कहना पड़ा.

मराठियों में जय महाराष्ट्र का अहसास कराया
हालांकि महाराष्ट्र और मुंबई में उन्होंने तब शिवसेना को खड़ा किया था जब वहां दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीयों की तूती बोलने लगी थी, कहना चाहिए कि उनकी सेना इससे लड़ी. मराठियों के बीच गर्व अहसास कराने का काम भी किया. माना जाता है कि इस राज्य में 80 फीसदी नौकरियों में अब मराठी ही हैं, इसका श्रेय भी बाल ठाकरे को दिया जाना चाहिए.

सुविधा के हिसाब से स्टैंड भी बदले
किताब ये भी कहती है कि उन्होंने अपनी सुविधा के हिसाब से जिंदगीभर अपने सियासी स्टैंड बदले. शरद पवार उनके जबरदस्त दोस्त थे लेकिन सियासी तौर पर सबसे बड़े दुश्मन. इंदिरा गांधी की आलोचना कि तो आपातकाल लगते ही उसकी तारीफ करने वालों में वो सबसे आगे थे. पारिवारिक तौर पर वो बेटों के बीच उलझे.

लेखिका ने ये दावा भी किया कि उनकी जिस शिवसेना ने जिंदगी भर एंटी मुस्लिम का रुख अपनाया, वो उससे उलट भी दिखे. कहा जाता है कि आखिरी दिनों में उनका डॉक्टर एक मुस्लिम था तो जब उनके बड़े बेटे बिंदूमाधव की बेटी ने कथित तौर एक मुस्लिम से शादी की तो उनका परिवार इस पर चुप रहा.

ये भी पढ़ें -
अपने बेटे के बारे में बाल ठाकरे ने क्यों लिखा था-वो लड़का एक त्रासदी है
जब PAK से उड़ी अफवाह, उद्धव ठाकरे की भतीजी नेहा ने मुस्लिम से कर ली है शादी
जिस मर्डर से तय हो गया कि बाल ठाकरे की गद्दी राज नहीं उद्धव ही संभालेंगे
रश्मि-उद्धव की शादी का राज ठाकरे से क्या है कनेक्शन!
क्या राज ठाकरे के लिए संजीवनी साबित होगा उद्धव का ये राजनीतिक कदम?

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए Mumbai से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: November 28, 2019, 9:11 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...