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केवल नमाज़ के तौर तरीके ही नहीं, शिया और सुन्नियों की अज़ान भी अलग हैं

News18Hindi
Updated: October 16, 2018, 12:06 PM IST
केवल नमाज़ के तौर तरीके ही नहीं, शिया और सुन्नियों की अज़ान भी अलग हैं
प्रतीकात्मक तस्वीर

अज़ान, मस्जिदों के लाउडस्पीकर से आने वाली वही आवाज़ है, जिसका मकसद नमाज़ के लिए बुलाना है.

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  • Last Updated: October 16, 2018, 12:06 PM IST
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मुसलमान मौटे तौर पर शिया और सुन्नी दो समुदायों में बंटे हैं. ये दोनों समुदाय बुनियादी उसूलों यानी कुरआन और अल्लाह के पैगंबर मुहम्मद तक एक राय रखते हैं. दोनों में अलग राय पैगंबर के बाद उनके वारिस पर है. जिस वजह से दोनों के नमाज़ के तौर तरीकों में ही नहीं बल्कि अज़ान में भी फर्क है.  जानिए दोनों की अज़ान का बुनियादी फर्क.

शिया अज़ान-
अल्लाहु अकबर (4 बार)- अल्लाह सबसे बड़ा है.
अशहदो अन ला इलाहा इल्लल ला (2 बार)- मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के अलावा कोई खुदा नहीं है.



अशहदो अनना मुहम्मदर-रसूल-उल्लाह (2 बार)- मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं.
अशहदो अनना अलियन वली-युल्लाह (2 बार)- मैं गवाही देता हूं कि अली अल्लाह के नुमाइंदे (प्रतिनिधि) हैं.


हय्या अलस्सलाह (2 बार)- इबादत के लिए चलो.
हय्या अलल फलाह (2 बार)- समृद्धि, सौभाग्य, सफलता की ओर चलो.
हय्या अला खैरिल अमल (2 बार)- दुनिया के सबसे बेहतरीन अमल की ओर चलो.
अल्लाहु अकबर (2 बार)- अल्लाह सबसे बड़ा है.
ला इलाहा इल्लल ला (2 बार)- अल्लाह के अलावा कोई खुदा नहीं है.

सुन्नी अज़ान-
अल्लाहु अकबर (4 बार)- अल्लाह सबसे बड़ा है.
अशहदो अन ला इलाहा इल्लल ला (2 बार)- मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के अलावा कोई खुदा नहीं है.
अशहदो अनना मुहम्मदर-रसूल-उल्लाह (2 बार)- मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं.
हय्या अलस्सलाह (2 बार)- इबादत के लिए चलो.
हय्या अलल फलाह (2 बार)- समृद्धि, सौभाग्य, सफलता की ओर चलो.
अस सलातु ख़ैर अल-मिन अन-नौम (2 बार- सुबह की अजान में)- इबादत सोने के बेहतर है.
अल्लाहु अकबर (2 बार)- अल्लाह सबसे बड़ा है.
ला इलाहा इल्लल ला- अल्लाह के अलावा कोई खुदा नहीं है.

सुन्नी अजान, सुबह की-


पैगंबर के बाद उनके वारिस पर अलग राय का फर्क दोनों समुदायों की अजान के बुनियादी फर्क में नजर आता है. शिया अज़ान में सुन्नी अज़ान से दो लाइनें अलग हैं.

शिया अजान की पहली अलग लाइन- अशहदो अनना अलियन वली-युल्लाह.
दूसरी लाइन- हय्या अला खैरिल अमल.

पहली लाइन, अशहदो अनना अलियन वली-युल्लाह का अर्थ है, मैं गवाही देता हूं कि अली अल्लाह के नुमाइंदे (प्रतिनिधि) हैं. 'अली' वह किरदार है जिसे सुन्नी समुदाय ने पैगंबर के बाद उनका वारिस नहीं माना.

(सुन्नी समुदाय के मुताबिक, पैगंबर के बाद मुसलमानों के नेता हज़रत अबु-बकर बने. अबु-बकर के बाद हज़रत उमर, उमर के बाद हज़रत उस्मान और उस्मान के बाद हज़रत अली. ये चारों लोग खलीफा कहलाए. शिया, सुन्नियों के मुताबिक पैगम्बर के बाद माने गए तीनों खलीफाओं अबु-बकर, उमर और उस्मान को राजनीतिक रूप से मुसलमानों के नेता कहलाए जाने से इनकार नहीं करते, लेकिन धार्मिक रहबर के नजरिए से इन तीनों को खलीफा नहीं मानते. वे पैगंबर के बाद 'खलीफा' नहीं 'इमाम' को मानताे हैं. उनके मुताबिक, हजरत अली  (रसूल के दामाद) पैगंबर के बाद पहले इमाम और दीन के रहबर बने.)

शिया अजान की दूसरी लाइन, हय्या अला खैरिल अमल का अर्थ है, दुनिया के सबसे बेहतरीन अमल की ओर चलो. यानी वे नमाज अदा करने को दुनिया का सबसे बेहतरीन अमल ( best of action) कहते हैं. वे हर दिन की अजान में इस कहकर पुख्ता करते हैं कि नमाज दुनिया का सबसे बेहतरीन अमल है.



सुन्नियों की सुबह की अज़ान में शिया अजान की दूसरी लाइन से अलग वाक्य है- अस सलातु ख़ैर अल-मिन अन-नौम. जिसका मतलब है, इबादत सोने के बेहतर है.

शिया अजान की लाइन का मतलब है- नमाज दुनिया का सबसे बेहतरीन अमल है.
सुन्नी अजान की लाइन का मतलब है- नमाज, नींद से बेहतर है.

सुन्नी अजान की लाइन, 'अस सलातु ख़ैर अल-मिन अन-नौम' को उनके धर्म गुरू उमर बिन अल-खत्तब ने 'हय्या अला खैरिल अमल' से बदला था. जिसे सुन्नी समुदाय की इन किताबों में लिखा है.



1. मिशकत अल-मसाबीह, वॉल्यून 1. पेज नं-142, मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह.

2. मुवत्ता ऑफ मलिक, किताब 3, हदीथ नंबर 3.1.8

3. किताब अल-फारूक़. अल्लमा शिबली नो-मानी द्वारा लिखित. पेज नंबर-295, करांची में पब्लिश.

4. किताब इज़ालातुल ख़िफा, वॉल्यूम 3, पेज नंबर- 328, सुनान-ए-अधान.

5. किताब कन्ज- अल उम्मल वॉल्यूम 4, पेज नंबर- 270, धिकार ए अधन.

6. सीरत अल हलाबियाह, वॉल्यूम 2, पेज नंबर-303, धिकार ए अधन.

7. नेल अल अवतार, वॉल्यूम 2, पेज नंबर- 43.

8. सुनन अल कुबरा, पेज नंबर- 425, अल-बैयहक़्क़ी द्वारा लिखित.

9. तारीख बगदाद, वॉल्यूम 9, पेज नंबर- 409.

शिया अज़ान-


अज़ान, हर दिन मस्जिदों के लाउडस्पीकर से आने वाली वही आवाज़ है, जिसका मकसद नमाज़ के लिए बुलावा देना है. हर दिन की नमाज को पांच हिस्सों में तकसीम किया गया है. जिनके नाम इस तरह हैं- फजर, ज़ौहर, असर, मग़रिब, इशां.

फजर- सुबह (morning)
ज़ौहर- दोपहर (noon)
असर- शाम (afternoon)
मग़रिब- सूरज डूबने के तुरंत बाद (dusk)
इशां- रात (night)

दोनों की नमाज़ में फर्क-
शिया, सुन्नी दोनों फर्ज नमाज बराबर रकात (तादाद) में ही अदा करते हैं. शिया नमाज पढ़ते वक्त जब खड़े होते हैं तो दोनों हाथों को खोलकर नमाज़ पढ़ते हैं. सुन्नी समुदाय के ज्यादातर फिरके हाथ बांधकर नमाज़ अदा करते हैं.

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First published: October 16, 2018, 11:17 AM IST
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